Wednesday, 28 September 2011

Tuesday, 27 September 2011

इन गीली गीली राहों पर, मैं कभी-2 यूँ ही दूर तलक चला जाता हूँ
बीते वक्त के पन्नों को, खोलता हूँ, पढ़ता हूँ, मुस्कराता हूँ
जब तुम मेरे साथ इन राहों पर चली थी, तो हवाएँ, फिजायँ अलग
थी, भली थी.............
वो मेरे साथ तुम्हारा यूँ ही चलते जाना, हँसना,खिलखिलाना
रूठ जाना और फिर से मुस्कराना....
वो पेड़ों की डाली से अठखेलियाँ करना, कुछ कलियाँ चुनना
बालों में सजाना....
लगती हो सुंदर अगर मैं ये कह दूं तो हया की लाली का
गालों पर आना.....
वो सारे पल, इन राहों ने अपने दिल मे छुपा कर रखे हैं
सुकून और शांति के वो पल, कुछ नहीं, आलेख रखे हैं
मैं दूर तक जाकर उन पन्नों को पढ़ कर आता हूँ
आश्चर्य है! उन पन्नों की स्याही को मैं आज भी
गीली और ताज़ा पाता हूँ.......
फेली शितिज पर गहरी लाली सूर्य प्रकाश अब होने को है
चला अंधेरा बाँध के गठरी सूर्य राज्य अब होने को है
कुछ ही देर मे सूर्य अपनी रशमीयों की चादर फेलाएगा
सारा जाग ज्ञानमय प्रकाशमय हो जाएगा
पक्षी दाना लाएगे,कोयल अब गीत सुनाएगी
आलसय दूर भगेगा प्राणों मे उर्ज़ा आएगी
इस ज्ञान प्रकाश का मिल जुल कर ,आओ लाभ उठाए हम
घनघोर रात्रि आने से पहले,आतमप्रकाशित हो जाए हम

Monday, 26 September 2011

मन चंचल है अधैर्य है चलायमान है अधीर है !
जीत जाता अधिकाँश युद्ध, ये ऐसा रणवीर है!!
रोज नया कुछ पाने की इच्छाए इसकी बदती जाती है!
बुध्धि इसकी देख हरकते,कसमसाती है,चिल्लाती है !!
पर ये है स्वार्थ का पुतला, इसको किसी की पीर नहीं है !
जीत इसे काबू में रख ले , कोई ऐसा वीर नहीं है!!
बड़े बड़े योगी जन को ये ऊँगली पर नाच नचाता है!
तोड़ के लोगों के संकल्प/ व्रत ये अट्टहास लगाता है!!
जो कहे के मन को जीत लिया, ये उस को मुहं की खिलाता है!
महा विजय्यी, महा योद्धाओं को, चारों खाने चित कर जाता है!!
मनु (मन) से सृष्टि शुरू हुई और मनुष्य इस धरा पर आया !
कभी कोई स्वनिर्माता को भी है पराजित कर पाया?
इसे पराजित कर लेने का कभी भी करो गुमान नहीं !
ये कार्य बड़ा ही दुष्कर है और हम इन्सां है,भगवान् नहीं!!
जीत नहीं सकते हम इसको पर परिवर्तित कर दें हम इस की राहें!
इच्छायें मारे से मरे ना, तो आओ बदल दे हम अपनी चाहें !!
हे! मन तो ईश्वर में खो जा, तू उसका रूप निहारा कर!
तू उस के आगे नाचा कर और हर दम उसे पुकारा कर!!
करके पुण्य कार्य/ सद्कार्य तू ,दुखियों के दुःख निवारा कर!
सब व्यसन त्याग दे आज/अभी,बस प्रभु प्रेम का नशा गवारां कर!!

Sunday, 25 September 2011

हे! प्रियतम तुम कब आओगे?
बाट निहारत उम्र गुजारी
तुम कब आवाज़ लगाओगे
हे! प्रियतम तुम कब आओगे
पलक बिछाए दीपजलाए  खड़ी हूँ
कब से द्वारे पर,बरसों बीत गये साजन
तुम कब आवाज़ लगाओगे?
हे! प्रियतम.........
उम्मीदे सब टूट चली है,विरहनी विरह मे
डूब चली है,कब गीत मिलन  के गाओगे?
हे! प्रियतम.........
शृंगार मुझे भाते नहीं अब, त्योहार खुशी
लाते नहीं अब ,कब जीवन को उत्सव
बनाओगे,हे! प्रियतम................


 
कल आधी रात के बाद
कल आधी रात के बाद एक कविता ने मुझे झन्झोर कर जगा दिया
पहले तुम मुझे लिख तो तब ही तुम्हे सोने दूँगी
ये कह कर मुझे डरा दिया ...................
समझाया मैं ने उसे ,तुम क्यूँ हो रही  हो बेकरार
ज़रा तो करो सुबह होने का इंतजार
तुम कयूं हो रही हो इतनी बेकरार?
उठते ही सबसे पहले मैं करूँगी तुम्हारा शृंगार
सज़ा-धजा,नव वस्त्र पहनाकर, दूँगी तुम्हे काग़ज़ पे उतार
हंस कर बोली कविता,पागल नहीं हूँ,मुझे है सब पता
२ गीत और १ ग़ज़ल मुझ से आगे वाली पंक्ति मे खड़े है
उतरेगे काग़ज़ पर मुझ से पहले,इस ज़िद्द पर अड़े है
अगर मैं सो गई,या मश्तिश्क की गलियों मे कहीं खो गई
मुझे आने मे देर हुई ज़रा भी तो बाज़ी मार ले जाएगे वो ज़िद्दी
नहीं पता मुझे कुछ भी,अभी करो मेरा शृंगार ...............
पहनाओ मोतियन के हार,सज़ा-धज़ा कर,दो मुझे काग़ज़ पे उतार
फिर तुम भी  सो जाना  पल दो चार....................
आख़िर मैं गई कविता से हार,शीघ्र किया उसका शृंगार
किया नया  कलेवर तैयार,दिया उसे काग़ज़ पे उतार
काश! मेरी नींद ना करने लगे अब कोई ज़िद्द बेकार
वो आ ही जाए पल दो चार.
AAJ FIR TERE EK SHUSHAK PAHLON KO DEKHA ZINDGI
ASHRU KAN AANKHON ME AAYE,BAHNE SE ROKA ZINDGI
KYUN TO HAR INSAAN KI UMMID KO DETI HAI DHOKA ZINDGI
TUjHE KYUN HAR iNSAAN,ACHA LGTA HAI ROTA ,ZINDGI
AAJ FIR TERE EK ............
KYUN TU ITNI KATHOR HAI,PATHAR SI LAGTI ZINDGI
KYUN KOI SANEH ANKUR TUJH ME NA FUTA ZINDGI
HAR CHAN,HAR PAL TU DARD SABKO DE RHI
KASH! KABHI KOI TERA APNA BHI ROTA ZINDGI
AAJ FIR TERE EK.........
BAN KE TU KAAL-KALIKA MRUTU KA NRTAN KARE
KOI SHIV AAKAR TO TUJH KO ROK DETA ZINDGI
AAJ FIR TERE EK.....
बहारों के आने मे वक़्त तो लगता है
खिज़ाओं के जाने मे वक़्त तो लगता है
मगर अब तो ज़िंदगी गुलज़ार है मेरी
सारे जहाँ की खुशियाँ ताबेदार है मेरी
ना जाए यह खुशिया ,यहीं थम सी जाए
अब तो यही चाहत,लगातार है मेरी
मगर यह है चाहत ,नियम तो नही यह
बहारों को एक दिन तो जाना ही होगा
खिज़ाओं को वापस तो आना ही होगा
यह चक्र तो यूँ ही चलता है सदा
एक आता है तो एक लेता है विदा
तो फिर क्यू ना खुद को नियती चक्र के लायक बना लूँ मैं
दुख और सुख के मध्य की अवस्था को पा लूँ मैं
मैं तो बहुत कम लिखती हूँ,पर कविताए दिमाग़ मे कभी भी अंकुरित होने लगती है
मेरे मन मे ये विचार कई बार आता है के जब मैं ही कविताओं के असमय प्रकट
होने से परेशानी मे पड़ जाती हूँ तो फिर उनका क्या हाल होता होगा जो निरन्तर
लिखते रहते है,उन के हालत की कल्पना करके मैं ने ये कविता लिखी है
इस कविता मे लेखिका अपनी कविताओं को बेवक्त उसके दिमाग़ मे ना आने की
हिदायत दे रही है,और उनके बेवक्त आने के कारण होने वाली परेशानी का
ब्यान कर रही है
कविता का शीर्षक है:- सख़्त मना है.

बाद शाम के,मेरे घर मे आना सख़्त मना है
ग़ज़लो और कविताओ तुम को गाना सख़्त मना है
बाद शाम के तो मैं गीत पिया-मिलन के गाने लगती हूँ
आँखे राह पर होती है,श्र्न्गार सजाने लगती हूँ
लिखने मे कविता देर हुई ये बहाना बनाना सख़्त मना है!
बाद शाम के, मन-पंछी उड़ उड़ खिड़की पर जाता है
आएगे वो अब आएगे,ये मधुर संदेश दोहराता है
इस संदेश को सुनकर भी, ना सुन पाना सख़्त मना है
बाद शाम के........
बाद शाम के कान हर एक आहट सुनते रहते है
पिया-मिलन नज़दीक है,पल पल ये मुझ से कहते है
उस आहट को सुन कर भी,ना सुन पाना सख़्त मना है
बाद शाम के.........
बाद शाम के जब साहब थक कर वापस आते है
हम भी आख़िर इंसान है,हंसते है मुस्काते है
उस हास्य-विनोद का,किसी को भी सुन पाना सख़्त मना है
बाद शाम कें एर घर मे आना सख़्त मना है.

कभी कोई कविता






कभी  कोई  कविता  जन्म  लेने  को  कितना  अकुलाति है!
कभी कोई कविता, सोच की गलियों  मे    ही  खो  जाती है!!


कभी कोई कविता,विचारों की तेज धार संग बह आती है!
कभी कोई कविता जीवन का सार,सम्पुर्ण  कह जाती है!!


कभी  कोई  चपला कविता,  देखो   तो  कैसे  इठलाती है!
कभी कोई मुस्काती कविता,मधुर फ़साने कह जाती है!!


कभी  कोई  वीरहनी  कविता,अश्क   आँख  मे  दे  जाती है!
कभी कोई प्रिया सी कविता,ह्रदय को झंकृत  कर जाती है!!


कभी कोई अति वाचक कविता,जाने क्या क्या  कह  जाती है!
कोई  शांत   मौनी   सी   कविता,  यूँ   ही  चुप से रह जाती है!!


कभी   कोई   घर-भेदी  कविता,  भेद  सभी  से  कह  जाती  है!
कभी कोई अति ग्यानि कविता, ग्यान बघार कर रह जाती है!!


कभी कोई सोती सी कविता,कुछ कहते  कहते  सो  जाती  है!
चुगलखोर  सी  कविता  कोई, चुगली  कान   मे पो  जाती  है!!


कभी  कोई  मेघा  सी  कविता,  रिमझिम   बूंदे   बरसाती  है!
ज्वालामुखी    सी कविता  कोई,  लावे  को  फैला   जाती  है!!


कभी कोई मोटी सी कविता,सम्पुर्ण पृष्ट ही  खा  जाती है!
और  कोई  नन्ही  सी  कविता  कोने  मे  ही  आ  जाती है!!


कविताओं  के  रूप है  कितने  ये  अब   तक मालूम नहीं!
हर कविता नव जीवन लेकर, नई  कहानी  कह जाती है!!



(अवन्ती सिंह)
ये वृक्ष गवाह रहा है कुछ बीती यादों का ,शिकवे/ शिकायतों का कसमे और वादों का
बचपन   की अटखेलिया   भी   इसने    देखी   है ,   देखी   है   जवानी  की दहलीज भी


देखे     है   इसने     कई   दशहरे,   दीवाली   और   देखी   है    इसने   कई   तीज   भी
देखा     है   रूठना    और    मनाना   भी    और   देखी   है    पवित्र   सच्ची   प्रीत   भी


इसके नीचे बैठ कर कई राही सुस्ताये है,बच्चे घर घर खेले है,रोए है   खिलखिलाए है
आकर   कभी   साधु   जनों   ने  रातों को अलख जगाए है,कभी पंछी आकर इस पर
चहके है , घरोंदे बनाए है .......


  मन   कहता   है  आज   अभी   यहीं   पर   धुनि   रमाऊं   मैं
मूंद के   आँखे ,  ध्यान   लगा   सर्वेश्वर   मे    खो   जाऊं    मैं
पितृ पक्ष
ये तुम्हारी तृप्ति के दिन है पितरों तुम्हे भूल ना जाए हम
करे श्रधा से तृप्त तुम्हे ,जीवन को सफल बनाए हम
लेकर श्रधा से सनेह-जल, मैं तुम को अर्पित करती हूँ
जो बन पाए उपहार मुझ से वो तुम्हे समर्पित करती हूँ
हे निराकरी,तुम परोपकारी,तुम सदा साहायक् हो, हो हितकारी
जो तुम ने दिए संस्कार . उन्हे भूल ना जाए हम
करे श्रधा से तृप्त तुम्हे,जीवन को सफ़ल बनाए हम
हे शूक्ष्म देह धारी,सद्बुध्धि देना हम को,हम रहे अह्न्कार से सदा परे
जो आदर्श-मूल्य दिए हम को,उन पर उतरे हम सदा खरे
रहे सदा निर्मल और शुद्ध-माना,सब बुराइयों से बच पाए हम
करे श्रधा.............
हे सृष्टि    के   रचेता   हे    जग    के   पालनहार


आई    मैं    तेरे     द्वार,    विनय  करो स्वीकार


स्द्बुधि   प्रदान    करके,  अहंगकार से करो पार


करूँ जब भी कार्य कोई विवेक हो, हो शुद्ध  विचार


क्षण भंगुर   तन   ये   मेरा   जाए   ना अब  बेकार


अतिश्त्रु   भी     यदि     आए, करुणा,  स्नेह    पाए

समस्त सृष्टि के प्रति हो   मन मे   स्नेह      अपार