Wednesday, 19 December 2012


स्त्री होना ही सर्व नाश का कारण बना शायद
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उस बच्ची की आंते निकाल दी गयी आपरेशन  कर के
ताकि उन में फ़ैल चुका 'गैंगरीन ' न ले ले उस की जान
पर जान बची कहाँ है उस में ,वो तो लाश भर है बस अब
उन अरमानों की लाश ,जो उस के माता पिता ने देखे होगे
उसे पराये शहर में पढने भेजने से पहले .......
उस के खुद के सपनों की भी लाश है वो ,वो चाहती थी
कंधे से कन्धा मिला कर चलना इस पुरुष प्रधान समाज में !
किस बात की सजा मिली  है  उसे ,  एक   स्त्री   होने    की ?
कुछ नर पिशाचों ने उस की अस्मत को कुचल कर
उस के जिस्म को बेरहमी से खत्म करने की कोशिश की क्यूँ??
क्यूँ की उन के लिए वो महज़ एक भोग की वस्तु भर थी
नहीं वो भोग-वस्तु नहीं थी वो इस समाज का एक अहम हिस्सा थी
वो किसी की बहन थी बेटी थी वो एक पत्नी और माँ भी हो सकती थी
यदि उस के शरीर को यूँ कुचल न दिया गया होता बेरहमी से
कितना जी पायेगी वो आधे अधूरे शरीर के साथ?
जितना भी जिए पर उस का जीवन सिर्फ एक प्रश्न चिन्ह  पर ही अटका रहेगा सदा
के क्या गलती थी मेरी जो ये सब हुआ ?महज़ स्त्री होना ही तो इस सर्व नाश का कारण रहा है शायद
कन्या भ्रूण हत्या ,बलात्कार ,दहेज़ के लिए उत्पीडन ,क्या ये सब ही  स्त्री की नियति है ????
जरुर है आत्म मंथन की इस समाज को ,तलाशने होने इस प्रश्न -चिन्ह के जवाब
सिखाने होगे संस्कार अपने बेटों को भाइयों को ,संस्कार ही एक इंसान को इंसान बने रहने में मदद करते है
वरना पशुता की तरफ गया मनुष्य क्या कर  सकता है ये हम देख ही रहे है

Tuesday, 18 December 2012

फांसी दो बलात्कारियों को !


बलात्कार एक ऐसा अपराध है जिसकी जितनी भी सज़ा दी जाए कम है !
इस तरह की घटनाएँ किसी की भी बहन या बेटी के साथ हो सकती है 
दिल्ली में अभी हाल ही में फिर इस तरह की घटना का होना बताता है के 
इन लोगों पर कड़ी कारवाही जब तक नहीं की जाएगी तब तक ऐसे लोगों में 
भय उत्पन्न नहीं होगा और ऐसी घटनाएँ कम नहीं होगी ! सरकार को इस 
दिशा में कड़े कदम उठाने चाहिए और फांसी  से कम सज़ा नहीं होनी चाहिए 
ऐसे लोगों को, किन्तु हम सब समाज का एक हिस्सा है और इस नाते हमे 
अपने कर्तव्य को नहीं भूलना चाहिए इन लोगों को समाज से बाहर किया जाना चाहिए 
इन सब के परिवारों पर भी समाज का दबाव होना चाहिए के ऐसे लोगों के लिए परिवार 
खुद सज़ा की मांग करे ,मैं सब ही साथियों से अपील करती हूँ के आइये हम सब भी मिल कर 
बलात्कारियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करे ,पुरे एक सप्ताह तक सिर्फ इस विषय पर ही अपने लेख/कवितायेँ   या जो भी लिखना चाहे केवल इस ही विषय पर लिखे ,हम सब के घर में भी मासूम बेटियाँ और बहने है 
जो बहन इस दरिंदगी का शिकार हुई है क्या वो हमारी बहन या बेटी सी नहीं है ?यदि आप हो ऐसा लगता है तो जरुर इस अभियान में साथ देगें 

Sunday, 2 December 2012

जीवन                                

स्वार्थी लोग
मतलब के रिश्ते
ये ही है  जीवन?

चलायमान  मन
भटकता  फिरे
तकता  रहे औरों
का जीवन

कड़ी मेहनत
तन पे  चिथड़े
दो सुखी रोटी
ये कैसा जीवन ?

रेशम है  तन पर
थाली में पकवान
असंतुष्ट है फिर भी
मन बेईमान,चाहे हमेशा
और उम्दा जीवन !




अवन्ती सिंह















Thursday, 29 November 2012

मन के नाजुक और सुंदर पौधे पर ,कल्पना के अनोखे रंगों से सजे शब्द जब मनमोहिनी सुगंध में ओतप्रोत होकर खिलते है और उस के पश्चात विचारों के पंखों को लगा कर  मखमली कागज़ पर हौले से उतर जाते है तब एक कविता निर्मित होती है !

Thursday, 6 September 2012

प्रेम और उपासना



एक पुरानी  रचना   (प्रेम और उपासना )

प्रेम और   उपासना   में   बहुत    अधिक  फर्क नहीं  है
बशर्ते के     दोनों      में   पावनता   हो,  पवित्रता  हो

प्रेम    को    उपासना     भी    बनाया   जा  सकता   है
और उपासना को प्रेम भी   बनाया    जा     सकता     है

जिस से प्रेम हो, मन से उस की उपासना भी की जाये 
प्रेम  की पराकाष्ठा   पर   पंहुचा   जा    सकता      है

और जिस की उपासना की जाये यदि उससे प्रेम भी किया जाये
  तो   परम     उपलब्धि      को  प्राप्त     किया    जा  सकता है

कितनी    मिलती     जुलती     है ना    दोनों     ही     बातें ?
प्रेम   में   अगर   वासना ना हो ,और   उपासना  में ईश्वर से
 कुछ   चाहना    ना    हो ,    कुछ    भी    मांगना     ना    हो

तो प्रेम ही     उपासना     है ,और उपासना    ही प्रेम है
नाम है   जुदा   जुदा    पर   अंततः     तो      एक     है  
( अवन्ती सिंह  )





 


Tuesday, 4 September 2012

अकेलापन

भटकती हुई रूहें है यहाँ,
अपने जिस्म को छोड़ कर
भटक रही है दर -बदर
तलाश रही है किसी साथी को
किसी अपने को ,जो दूर कर दे
अकेलेपन के अहसास को ....
पर हर साथी के भीतर पल रहा है
अकेलेपन का खौफनाक अहसास
वो अहसास कभी खत्म नहीं होता
न   भीड़ में  न   मेले में .....
क्या कोई राह नहीं जो खत्म कर सके
इस अकेलेपन के विषधर नाग को
है ,राह तो है पर उस पर हम चल ही नहीं पाते है
हम सदा अपने अकेलेपन को दूर करने की राह तलाशते है
पर हमे राह तलाशनी होगी औरों के एकाकीपन को दूर करने की
यदि हम कभी ऐसा कर पायें तो सच जानिए हमारा अकेलापन
स्वतः ही समाप्त हो जाएगा ,पर क्या हम कभी  इस राह पर चल पायेगे ???
कभी   खत्म   कर   पायेगे   किसी   के   अकेलेपन   को ?????

(अवन्ती सिंह )                             

Monday, 3 September 2012

Tuesday, 21 August 2012

वृक्ष आम का



सुना है तुम्हारे  कमरे की खिड़की के पास खड़ा है एक वृक्ष आम का
वो भर गया होगा अब तो बौर से
उस पर बैठ  कर कोयल भी कूका  करती होगी अक्सर
क्या उस की कूक  सुन कर कभी मेरी याद आती है?
कभी तेज हवाओं से उस वृक्ष के पत्ते  जब टकराते है आपस में
तो तुम्हे लगता नहीं के तुम्हारे कानों में मेरे बारे में कुछ बुदबुदा
रहे है ये पत्ते .....
और कभी बारिश में ,पत्तों पर पड़ी बूंदे  तुम्हे मेरी आँखों की चमक
की याद नहीं दिलाती ?
कभी तो उस वृक्ष की लहराती डालियाँ मेरी जुल्फों सी प्रतीत हुई होगी तुम्हे
कहो न ऐसा हुआ है कभी ? देखना आज उस वृक्ष को और बतलाना मुझे

Sunday, 10 June 2012

प्रेम गीत

जब भी कोई प्रेम गीत लिखना चाहती हूँ मैं
करके 2 पल आँखें बंद कल्पना में उतरती हूँ
तो एक स्त्री  और पुरुष की छवि उतर आती है आँखों में
एक दुसरे को प्रेम से देखते हुए ,पूर्ण समर्पण का भाव आँखों में भरे हुए
लगता है के इन की पूरी दुनिया सिर्फ एक दूजे से ही पूरी हो जाती है
किसी तीसरे का कोई स्थान नहीं है वहां ,और जरूरत भी नहीं
खुद में मग्न ,एक दूजे को सुख और स्नेह से भरने को सदा आतुर रहते है वो दोनों
इन दोनों को देखते ही मेरी कलम कसमसाने लगती है ,बेचैन हो उठती है प्रेम गीत लिखने को
मेरा हर प्रेम गीत के नायक और नायिका ये ही रहे है सदा 
और कैसा इतफाक है प्रिय ,के हम दोनों से काफी मिलती जुलती छवि है इन दोनों की
हुबहू हम से ही लगते है ये भी ...............

(अवन्ती सिंह )

Monday, 4 June 2012

लोथड़ा भर है बस

जिस्म में लहू की बुँदे भी है
और साँसों की धोकनी भी चल रही है निरंतर
धडक रहा है दिल भी ,तो लगता है के जिन्दा है इंसान
पर क्या बस इतने भर से जीवित कहलाया जा सकता है खुद को ?
संवेदनाये सुप्त हो चुकी ,मर चुकी है करुणा  और स्नेह की भावनाएं
सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोच रहा है ये पञ्च तत्वों से रचा खिलौना
तब जीवित होने के ये सब प्रमाण पत्र भी यकीन नहीं दिला पाते
के सच में जिन्दा है इंसान ,लगता है के मांस का चलता फिरता 
लोथड़ा भर है बस .......

Monday, 28 May 2012

मैं रहती हूँ इस देश की राजधानी में 
3 दिन से गन्दा बदबूदार पानी आ रहा है हमारे नल में ,शिकायत दर्ज़ करवाने पर पता चला के 7 दिन के अंदर आप की शिकायत पर अवश्य कार्यवाही की जायेगी , 7 दिन कोई बिना पानी के कैसे रह सकता है इस का जवाब किसी के पास नहीं ,दिल्ली का ये हाल है तो देश के बाकि हिस्सों का क्या होता होगा???

मेरा भारत महान .........

Friday, 25 May 2012

क्यूँ   रहती   है माथे पे शिकन    हर    वक्त     आप   के ?
थोडा    हँसा    कीजिये   जनाब थोडा   मुस्कराया कीजिये 

थाली में सजी है कई सब्जियों की कटोरियाँ और पकवान 
एक टुकड़ा किसी भूखे की तरफ   भी तो   बढ़ाया कीजिये 

आलिशान मकान में क्या रहने लगे भूल गए  गरीबी   का   दर्द 
कभी किसी की झोपडी पर फूस का छप्पर तो डलवाया कीजिये 

बच्चे आप के मुंह खोले तो खोल देते है पर्स ,  करते    है  हर  फरमाइश   पूरी   किसी मासूम के फैले हाथ पर एक सिक्का रखने में भी मत कतराया कीजिये 

हर गम हो   जायेगा   कौसों   दूर ,  सारी    फिक्रें     हो    जायेगी काफूर 
माँ   के   दुखते   पांवों    कभी     कभी        तो         दबाया      कीजिये 
(अवन्ती  सिंह )


 

Tuesday, 22 May 2012

कुछ ख़ास हुए बिना

हम रोजाना सुबह उठते है अपनी सभी दिनचर्या निभाते है अपने कामों में रिश्तों ,दोस्तों में उलझे रहते है कब शाम होती है कब रात पता ही नहीं चलता और दुसरे दिन जागने के लिए हम फिर से सो जाते है सोने से पहले अनेक बार ये विचार हम से के मन में कभी न कभी जरुर  आता है के कुछ खास दिन नहीं था बस यूँ ही गुजर गया ,मैं भी अक्सर ऐसे सोचा करती हूँ पर शनिवार को हुई एक छोटी सी घटना ने मुझे इस पर सोचने को  मजबूर किया ,हुआ यूँ के मैं सुबह सब के लिए टिफिन बनाने की तैयारी में लगी हुई थी मेरी बेटी को करेले को चिप्स की शेप में घिस कर फिर उसे तल कर बनाई सब्जी बहुत पसंद है तो सोचा साथ में वो भी बना लेती  हूँ,काफी दिन से एक नया कद्दूकस खरीदा हुआ रखा था  काफी तेज 3 इंच का तेज ब्लेड उस में अटेच किया हुआ है  ,मैं पुराने कद्दूकस से ही काम किया करती थी,अचानक मन में आया के नए कद्दूकस को निकला जाए   बस इस एक विचार ने पुरे परिवार की दिन चर्या ही बदल डाली ,उसे इस्तेमाल करते हुए कई बार लगा भी के ब्लेड का एंगल  काफी खतरनाक है इस में सोचती रही  के किसी और को तो इसे कभी उसे नहीं करने दूंगी शायद खुद की समझदारी पर ज्यादा ही भरोसा था मुझे आखिरी करेले को घिस ही रही थे के एक पल को वहां से ध्यान हट गया और ब्लेड को अपनी तेजी बताने का पूरा मौका मिल गया ,साधारण कद्दूकस  इस मामले में काफी उदार होते है कुछ खरोच लगा कर बक्श देते है पर इस ब्लेड का एंगल  इतना गलत था और ब्लेड इतना तेज  के मेरी ऊँगली के आगे के लगभग आधे इंच के हिस्से को काफी  गहरे तक साफ़ कर दिया बस गनीमत ये रही के वो हिस्सा ऊँगली से अलग नहीं हुआ ,मुझे समझने में में कुछ पल लगे के ये क्या हुआ जख्म को दबाए हुए बाहर  आई सब को बताया तो सब घबरा उठे खून ने तो न रुकने की कसम खा ली मैं  ऊँगली  को जोर से दबाए हुए बर्फ के पानी में हाथ डालती  भी न थी के कुछ ही पल में डोंगे का सारा पानी खून से भरा हुआ लगता है ,मन काफी घबराने लगा के अब तो टाँके ही लगेगे ऊँगली में ,मैं ने सुना है  उस में काफी दर्द होता है , लगभग 3घंटे  मैं ऊँगली को बर्फ के पानी में रखे रही और जोर से दबाए रही ,बीच बीच में देखती रहती थी के खून रुका या नहीं आखिर खून रुक ही गया,डॉ. की दूकान खुलने का वक्त भी हो गया था वहां जाकर इंजेक्शन लगवाया,डॉ। की  ये बाद सुनकर जान में जान आई के अभी इसे ऐसे ही चिपके रहने देते है यदि फिर से खून बहना न शुरू हुआ तो टाँके की जरूरत नहीं पड़ेगी  ड्रेसिंग करवाई ,और दवाएं लेकर घर वापस आई,उस दिन से हाथ की उपियोगिता भी समझ में आ रही है और ये बात भी के यदि सुबह से शाम तक जिस दिन ऐसे लगे के आज का दिन ऐसे ही बीत गया उस दिन भगवान् को धन्यवाद  भी करना चाहिए के कुछ ख़ास हुए बिना ही बीत गया ये दिन :) :) :)
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Thursday, 17 May 2012



जाने    कब    कागज़   की   प्यास      इतनी    बढ़ेगी 
के कलम आतुर हो उठेगी शब्दों की बरसात करने को 

जाने कब मन की    वेदनाएँ     होगी      इतनी     असहनीय ,के 
 मन ,मना कर पायेगा  समाज के उलझे-2 नियमों को  मानने से 

जाने कब करुणा का सागर ,सब तटबंधों को तोड़ कर खुद में समाहित कर पायेगा 
हर       दुखी ,     लाचार    को,    अपने     पराये     का     विचार     किये     बिना 

जाने कब ,प्रेम इतना उदार बन पायेगा ,के    हर    कमी    हर    गलती    को 
कर पायेगा नज़र अंदाज़ और खुद के अस्तित्व को रख पायेगा हर परिस्तिथि में बरकरार 



Sunday, 13 May 2012

दिल से ........
हमेशा सुनती आई हूँ के बेटियों को लोग नहीं चाहते ,उन्हें कोख में ही मार देने के प्रयास किये जाते है 
पर  इस मामले में मैं खुशकिस्मतों  हूँ ,मुझ से बड़े मेरे दो भाई थे और मेरी मम्मी की इच्छा थी की उन को अब एक बेटी भी हो ,वे दिन रात इश्वर से प्रार्थना  किया करती थी एक बेटी के लिए,मेरे जन्म पर खुशियाँ मनाई गयी और मुझे हमेशा ही दोनों भाइयों से अधिक प्यार मिला ,मुझे गर्व है अपनी माँ पर जिन्होंने बेटी के लिए दुआए मांगी और मुझे हमेशा खूब प्यार दिया।......

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  अवन्ती सिंह 











Saturday, 12 May 2012

ऐ पहेली ,तुम खुद ही सुलझ जाओ 
हल हो जाओ ना  खुद ही
अगर तुम ने ऐसा ना किया तो अनबुझे रह जाने 
तैयारी रखना ,क्यूंकि उलझी हुई चीजे मेरे स्वभाव से मेल नहीं खाती है 
मैं अक्सर इस तरह की चीजों को स्टोर रूम के उस कोने में रख 
दिया करती हूँ जहां कभी कोई नहीं जाया करता 
(अवन्ती सिंह )
 

Friday, 27 April 2012

सोन चिड़िया

तुम्हारे जन्म के बाद जब तुम्हे पहली बार देखा तो 
मैं फूट-२ के रो पड़ी थी ,तुम्हे देखते ही ख़ुशी के साथ 
एक डर ने भी जन्म लिया था,के एक दिन तुम मुझे 
छोड़ कर चली जाओगी .........
किसी और के घर की रौनक बन जाओगी 
मैं कैसे अपने जिगर के टुकड़े को किसी और को सौप पाऊँगी 
तुम कुछ दिन और कुछ महीनों की हुई तो मैं तुम्हारी मधुर मुस्कान में 
भूल गयी के तुम किसी और की अमानत हो ........
हंसते खेलते सालों गुज़र गए ,और एक दिन अचानक तुम ने स्कूल से 
घर आ कर कहा ,मम्मी अपनी अच्छी सी साड़ी  दो टीचर डे पर पह्नुगी 
और तुम ने जिस दिन साड़ी पहनी ,अपनी उम्र से काफी बड़ी लग रही थी तुम 
मेरा सोया डर फिर जाग गया अरे बस कुछ ही साल और है मेरे घर से तुम्हारी विदाई के 
दिल में एक दर्द सा उठा पर मैं ने झट से सोचा मैं भी कितनी पागल हूँ अभी तो बच्ची स्कूल में 
अभी तो बहुत पढना है कुछ बनना है,जाने कितने साल पड़े है अभी तो 
पर जाने क्यूँ ये साल कुछ ज्यादा ही जल्दी गुजर जाते है 
बस कुछ ही दिनों में तुम बी.ऐ .भी कर लोगी 
और कुछ ही सालों में तुम्हे विदा करना ही पड़ेगा 
ये कैसी अजीब सी कशमकश होती है ना
बिटिया के ब्याह के अरमान भी हर माँ संजोती है 
और उस की जुदाई के असहनीय दर्द को भी साथ साथ सहती है 
तुम्हारे जाने के अहसास से तो कलेजा काँप उठता है 
मेरे घर की रौनक तो तुम से ही है मेरी सोन चिड़िया 
तुम्हारे बिना ये आंगन तो बिराना सा हो जाएगा 
पर उस वक्त के आने से पहले में जी भर के जी लेना चाहती हूँ 
तुम्हारे साथ को ,अपने इस दर्द के अहसास को खुद में समेटे हुए 
तुम्हे खूब खुशियाँ  देना चाहती हूँ ..........    
 

Saturday, 21 April 2012

मरुआ




मरुआ 
ये एक पौधा होता है जो तुलसी से काफी मिलता जुलता होता है इस में अनंत गुण होते है पर अभी सिर्फ इस के एक गुण के बारे में बात करते है,ये जहां भी लगा होता है आस पास के लोगों को डेंगू और मलेरिया होने का खतरा नहीं रहता इस की खुशबु से इन बिमारियों के मच्छर भाग जाते है सामान्य मच्छर तो रहेगे पर बीमारी फ़ैलाने वाले मच्छर नहीं आयेगे , इन बिमारियों के आने से पहले ही अपने घर के आस पास इस पौधे को अवश्य लगाये ,एक बार पौधा लगा लिया तो इस के इतने बीज हो जाते है के आप अपने सब मित्रों को इस के बीज वितरित कर सकते हैया फिर मेरी तरह उन बीजों को गमलों  में डाल दें ,कुछ ही दिन में पौधे निकल आते है ,फिर उन पौधों को उपहार में दें अपने मित्रों को ,सच जानिए बड़ी ख़ुशी मिलती है

Tuesday, 17 April 2012

 
आज कल काफी लोगों को नज़र का चश्मा लग जाता है आँखों की उचित देख भाल से आप चश्मे से बच सकते है यदि चश्मा लग ही गया है तो नम्बर आगे न बढ़े इस के लिए कुछ उपाय 



मुलेठी का एक टुकड़ा एक गिलास पानी में भिगोकर रखें और उस पानी को पीते रहे पानी खत्म होने पर उस में और पानी भर दें एक लकड़ी का टुकड़ा सारा दिन इस्तेमाल हो जायेगा रात को उसे फेंक दें



दोनों पाँव के अंगूठों में सरसों के तेल से नियमित मालिश करें !

खाना खाने के तुरंत बाद आखें अवश्य धोये !

बाज़ार में आई वाश करने का एक छोटा सा बर्तन मिलता है {चित्र में देखे ) सुबह और रात को सोते वक्त इस में पानी भरके अपनी आँखों पर इस प्रकार लगायें के आप की आँखों में पानी भर जाये ,१ मिनट   तक अपनी आँखे पानी के सम्पर्क में रहने दें और उन्हें खोलें और बंद करें यदि हम इस विधि का रोजाना उपयोग करें तो ताउम्र हमे चश्मा नहीं लगेगा और यदि लग गया है तो नम्बर नहीं बढ़ेगा

Thursday, 5 April 2012

एक पुरानी कविता

करके  अहसान  किसी  पर,  अगर  जता  भी   दिया
तो फिर वो अहसान  कैसा, किया, किया,  ना  किया

रहो   खामोश,   अगर        दर्द   किसी    का     बांटो 
करोगे चर्चे तो फिर गम हल्का,किया,किया ना किया 


तजुर्बे,    जिन्दगी   की   राह   में   गर  काम  ना  आये 
तो फिर वो खाक तजुर्बा   था,किया,  किया,   ना किया

तुम्हारी    हसरतों    पर  गर   पकड रही   ना तुम्हारी
जिया तो जीवन तुम ने,मगर जिया, जिया,  ना जिया


किसी   की   आँख   के आंसू ,  अगर  तुम पौंछ ना पाए 
सजदे   में  सर   खुदा   के ,   दिया,   दिया,    ना   दिया 


सफाई    दिल   की कालिख की अगर तुम कर नहीं पाए
स्नान  गंगा      में   जाकर,  किया,   किया,   ना   किया 


तुम्हारे    घर   में   ही   गर  तुम  पे  उठ  रही है उंगलियाँ
सलाम  दुनिया   ने   तुम   को,  किया,   किया,  ना किया 


पुकारे  जब   भी   धरती   माँ,  तो   उठ  चलना   हुंकार  के
कहेगी  वरना  ये धरा,  जन्म इस ने लिया,लिया,ना लिया 
(अवन्ती सिंह )

Tuesday, 3 April 2012

ब्रह्म अस्त्र हमारे पास


समाज में बुराई फ़ैलाने वाले हर सीरियल और हर  विज्ञापन का दिखाया जाना या न दिखाया  जाना हमारे और सिर्फ हमारे हाथ में है ,ब्रह्म अस्त्र हमारे पास है और हम कहते है ,हम कर ही क्या सकते है

इन सब के खिलाफ आवाज़ उठने का सब से सार्थक और सरल  तरीका यदि हम सब सीख जाए तो किसी भी
अर्थहीन और समाज का भ्रमित करने वाले और परिवारों को गलत संस्कार देने वाले सीरियल और विज्ञापन
बंद हो सकते है और वो ताकत हम सब के पास होते हुए भी हम अनजान है उस से ,आवश्कता है जागरूक होने की,कोई भी विज्ञापन  या सीरियल या कोई भी अन्य कार्यक्रम उस की TRP बढने या घटने से सफल या
असफल होता है और TRP बढती है उस कार्यक्रम के देखे जाने से ,हम लोग कहते है ये सब गलत दिखाया जा
रहा है पर उसे देखते है ,बस गलती हम से यहीं होती है ,जो हमारे समाज और परिवार के लिए सही नहीं उसे
देखना बंद कीजिये,जब भी ऐसी कोई चीज दिखाई दे फौरन चैनल बदल दीजिये ,इससे उस कार्यक्रम या
विज्ञापन की TRP गिरेगी और उसे बनाने वाले समझ जायेगे के जो वो दिखा रहे है वो पसंद नहीं किया जा रहा.
 कितने घरों में कौन सा कार्यक्रम देखा जा रहा है इस सब की खबर आधुनिक तकनीक से इन्हें बनाने वालों तक
आसानी से पहुच जाती है और इस के ही आधार पर (TV Ratings Points.) TRP तय की जाती है . 
  अच्छे और  समाज को सही दिशा देने वाले कार्यक्रम को देखिये उस की TRP बढाइये ,  फिर देखिये कैसे बदलता है ये माहौल  .

Friday, 30 March 2012

फितरत

एक व्यंग 
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कुछ लोगों को   गम  सहने की इतनी आदत होती है
खुशियाँ आकर दस्तक दें तो उनको दिक्कत होती है

आँसूं   आहें   और   तड़प   ये   उनके    साथी होते है 
इन को पाल पोस कर रखना उनकी फितरत होती है

खुशियों  के  चंद  पल  भी  उनको  होते  बर्दाश्त  नहीं 
ये सोच  के  भी  वो  रो लेते,  के हम  क्यूँ  उदास  नहीं

ऐसे लोगों  के  संग  रहना  किसी  के बस की बात नहीं 
वो  जीवन  बस  काटा  करते ,जीने   में  विश्वास  नहीं 

खुशियों   की   अमृत   वर्षा ,   ईश्वर   तो   हर दम करते है
समझदार उसे पीते रहते और मुर्ख कहते, अभी प्यास नहीं.



   

Saturday, 24 March 2012

सृष्टि का कारोबार





कभी हम ध्यान से क्षितिज  की तरफ देखे तो धरती आकाश
मिलते हुए प्रतीत होते है और कवि-मन तो उनके बीच के
वार्तालाप को सुन  भी पाता है,........



रोज सुबह की तरह मैं आज भी उगते सुरज को निहार रही थी!

अचानक लगा   ऐसे   जैसे   धरती आकाश को पुकार रही थी!!

हे! गगन हे! आकाश,फिर से अपनी बादल रुपी बाहें फैलाओ ना!

कई दिन से    हो   दूर   दूर,  आज   फिर   हृदय   से लगाओ ना!!

जब     तुम    अपना   स्नेह,   जल    के   रूप    मे    बरसते   हो!

तब   तुम   नव   जीवन    का    मुझ   मे    संचार   कर जाते हो!!

फिर   मैं   हरीतिमा   की   चुनर   औड   कर,करके फूलों से शृंगार!

अपने बालक रुपी जीवों मे बाँट देती हूँ, तुम्हारे सनेह से उपजे उपहार!!

हमारे इसी मिलन से तो  निरंतर,चलता  रहता   है   सृष्टि   का कारोबार!!!

(पुरानी रचना  )

Wednesday, 21 March 2012

कहीं दूर क्षितिज से


निशा कुलश्रेष्ठ
मुझको अपनी आज़ादी चाहिए
किससे? कैसे ?क्यों भला ?
नहीं जानती ,
आज़ादी किस से......

" अपनों" से .?
अपने "स्वप्नों" से ?
,अपने "विचारो" से ,?
जो गाहे बगाहे
चले ही आते हैं ।
और न चाहते हुए भी
इन्हें देख कर,
मुस्कराना तो पड़ता ही है।।

छोड़ते हैं "अपने" तो ,
दिल टूटता है ।
टूटते हैं" सपने" तो
जान जाती है ।
और विचारहीन होती हूँ तो
जीवन ही व्यर्थ चला जाता है ।

क्या करूँ मैं फिर ?
किस ओर जाना है अभी ?
क्या कोई और नयी राह,,,,,,,,,???
मुझे खोजती है ,,,,,???
क्या कोई और जहाँ मुझे बुलाता है ,,,,,???
क्या कोई और दुआ,,,,,???
मेरी राहों में खडी है ,,,,,,,,??? ,
कोई जमीन ...
कोई असमान, ...
क्या कुछ और मुझे कहीं खोज रहा है ....
क्या मेरे वास्ते नया
जो मुझे पुकारता है ,
कही दूर क्षितिज से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,निशा कुलश्रेष्ठ {१५. ३. १२. }

(मेरी सखी निशा जी कुछ बीमार चल रही है ,उन के चेहरे पर एक मुस्कान आये इस के लिए उन की एक रचना यहाँ रख रही हूँ ,वो देखेगी तो जरुर खुश होगीं  )

ऊर्जा का महत्व हम सब के जीवन में

इस विषय में इतना कुछ लिखा जा सकता है के मेरे गीत अंतरात्मा के कहीं खो जायेगे :):)

ये ही सोच कर मैं ने इस विषय के लिए एक अलग ब्लॉग बना दिया है ,उर्जा के विषय में समय समय पर उस ही ब्लॉग पर लिखूंगी ,इस विषय में रूचि रखने वाले मेरे सब ही मित्रगण सादर आमंत्रित है नए ब्लॉग ऊर्जा पर, ऊपर लिखी  लिंक सूचि में ऊर्जा को शामिल कर दिया है ताकि आसानी से ऊर्जा पर पंहुचा जा सके ! शुक्रिया.......

 http://praanurza.blogspot.in/

Thursday, 15 March 2012

अबोला वादा



बहुत साल पहले ,एक ढलती हुई शाम में
मेरे हाथों को थाम कर अपने हाथों में ,
अपनी अमृत छलकाती हुई आँखों से
मेरी शर्माती हुई आँखों में झांकते हुए 
तुम ने नहीं कहा ,के तोड़ लाओगे 
सितारे मेरे लिए .........
तुम ने नहीं खाईं कसमें सात जन्मों की 
बस आँखों ही आँखों में किया था एक 
बिना शब्दों का अबोला वादा, के
मेरी हर सांस को  तुम महकाओगे 
खुशियों की अनोखी महक से ......


उस के बाद, हम ने ना जाने कितने 
पतझड़ ,सावन ,बसंत, बहार के 
मौसम देखे ,आंधी और तूफानों
ख़ुशी और गम को जीया है साथ -२

पर मुझे तुम्हारी आँखों में हमेशा अडिग 
नज़र आता रहा है वो अबोला वादा 
तुम ने अपनी हर सांस में जीया है 
और   निभाया   है  उस  वादे  को 
जो तुम ने कभी कहा ही नहीं .....
===========================
अवन्ती सिंह





  

Saturday, 10 March 2012

तस्वीरों में खुशियाँ

खुशियों के पल इंसान के जीवन में कम ही आते है 
ये बहुत बार सुना था ,इसलिए जब भी खुशियाँ मिली 
उनकी तस्वीर बना कर रख दी मैं ने .......
के जब ना रहेगी ये खुशियाँ तो इन की देख कर तस्वीरें 
दिल को कुछ पल सुकून मिल जायेगा .....
खुशियाँ आती गयी ,जाती गयी,मैं तस्वीरें बनती गयी....
पर एक दिन जब निकाल कर देखा उन सब तस्वीरों को 
तो मैं हैरान रह गयी ,मेरी आँखे तो उन तस्वीरों को देख 
कर इस कद्र बहने लगी जैसे किसी पुराने  बाँध में दरार 
पड़ गयी हो ,  मैं कितनी नादाँ हूँ,   गयी   हुई     खुशियाँ, 
 तस्वीर      में कहाँ    बांध   कर    रखी   जा सकती है ,
वो तो और गहरा कर देती है ,उन खुशियों के गुज़र जाने 
के अहसास को........



(अवन्ती सिंह )   

Tuesday, 6 March 2012

आओ होली आई है!



सखियों ने भेजा सन्देश 
आओ   होली   आई  है!
 
खिले है  पलाश   चटकीले 
टेसू की कली मुस्काई है!


रंग  लिए है  पक्के  वाले 
पिचकारी     मंगवाई  है !


आकर हम संग  खेलो होरी 
ऋतू फागुन  की    आई है !


नहीं   चलेगा   कोई    बहाना 
पिया को संग में लेकर आना 


आकर  गले  लगाना   हम को 
हम संग हँसना और बतियाना !

गाकर गीत होली के "रसिया"
तुम महफ़िल की शान बढ़ाना!  


करेगे    गाल   तुम्हारे   लाल 
देखना  सखी  हमारा कमाल !


कब से तकते  राह   तुम्हारी
क्यूँ तुमने   देर    लगाई  है  !


सखियों  ने  भेजा   सन्देश 
आओ    होली      आई  है! 

(अवन्ती सिंह)



  

Thursday, 1 March 2012

आशा


मैं एक आशा हूँ 
मेरे टूट जाने का तो सवाल ही नहीं होता 
मैं बनी रहती हूँ हर एक मन में 
ताकि हर मन जीवित रह सके 

मुझे खुद को बचाए ही रखना है हर हाल में 
यदि मेरा अस्तित्व मिटा, तो मुश्किल हो जायेगा  
किसी के भी अस्तित्व का कायम रहना 

यदि मेरा कोई एक रूप टूट भी गया बिखर भी गया 
तो झट से एक नए कलेवर को धारण करके 
मैं पुनः मन में प्रकट हो जाउंगी 
मैं रहूँगी, सदा रहूँगी..... 

Saturday, 25 February 2012

गौ रक्षा सिर्फ हिन्दुओं की जिम्मेदारी नहीं ये सभी भारतियों की जिम्मेदारी है ,गौ हमारी माँ होने के साथ ही हमारे पर्यावरण के लिए ,लोगों के स्वास्थ से लिए भी बहुत महत्व रखती है ,खेती में भी उस के गोबर का और मूत्र का बहुत ज्यादा महत्व है,क्या आप इस विषय से खुद को जुदा पाते है या जोड़ना चाहते है ??गौ सेवा  रक्षा मंच पर राजेंद्र जी की एक पोस्ट पढ़ी (केंद्र सरकार ने बारहवें पंचवर्षीय योजना के तहत गौमाता के मांस के निर्यात में लगे प्रतिबंध को हटाने, नए और आधुनिक कतलखाने स्थापित करने , गोवंश के मांस के खुले एक्सपोर्ट की अनुमति लेने, भारत को मांस निर्यात में विश्व का सबसे बड़ा देश बनाने का घटिय और नीच षड़यंत्र रचा गया है) क्या अभी भी वो वक्त नहीं आया है के हमे इस विषय पर एक होकर गम्भीरता से विचार करना चाहिए ,क्या फेसबुक और ब्लॉग पर हम कुछ लुभावनी कवितायेँ ही लिख और पढ़कर सकते है , या इस विषय में लिखे गए लेख की तारीफ़ भर कर देना ही काफी है ,हम ये क्यूँ नहीं कह पाते के हम साथ है इस विषय में और जमीनी स्तर पर कुछ करना चाहते है, कुछ भी करने की सामर्थ क्या हम में नहीं?खुद के कर्तव्य से नज़रें चुराते रहेगे ,आखिर कब तक ??

Wednesday, 22 February 2012

कभी कोई कविता



कभी  कोई  कविता  जन्म  लेने  को  कितना  अकुलाति है!
कभी कोई कविता, सोच की गलियों  मे    ही  खो  जाती है!!


कभी कोई कविता,विचारों की  तेज  धार संग बह आती  है!
कभी कोई कविता जीवन का  सार, सम्पुर्ण  कह  जाती  है!!


कभी  कोई  चपला कविता,  देखो   तो  कैसे  इठलाती है!
कभी कोई मुस्काती कविता,मधुर फ़साने  कह  जाती  है!!


कभी  कोई  विरहनी  कविता, अश्क   आँख  मे  दे  जाती है!
कभी कोई प्रिया सी कविता, ह्रदय को झंकृत   कर जाती है!!


कभी कोई अति वाचक कविता,जाने क्या क्या  कह   जाती है!
कोई  शांत   मौनी   सी   कविता,  यूँ   ही  चुप से रह जाती है!!


कभी   कोई   घर-भेदी  कविता,  भेद  सभी  से  कह  जाती  है!
कभी कोई अति ज्ञानी कविता, ज्ञान  बघार  कर रह  जाती है!!


कभी कोई सोती सी कविता,कुछ कहते  कहते  सो  जाती  है!
चुगलखोर  सी  कविता  कोई, चुगली  कान   मे पो  जाती  है!!


कभी  कोई  मेघा  सी  कविता,  रिमझिम   बूंदे   बरसाती  है!
ज्वालामुखी    सी कविता  कोई,  लावे  को  फैला    जाती  है!!


कभी कोई मोटी सी कविता,सम्पुर्ण पृष्ठ ही  खा  जाती है!
और  कोई  नन्ही  सी  कविता  कोने  मे  ही  आ  जाती है!!


कविताओं  के  रूप है  कितने  ये  अब   तक मालूम नहीं!
हर कविता नव जीवन लेकर, नई  कहानी  कह जाती  है!!



(अवन्ती सिंह)

Saturday, 18 February 2012

पता नहीं

एक गीत लिखने का मन है 
ढूँढ़ रही हूँ कुछ नए शब्द
जो बिलकुल अनछुए हो 
न कभी पढ़े ,ना कभी सुने हों 
मन की असीम गहराई में जा कर 
बहुत कोशिश की मोतियों से शब्द पाने की
पर नाकाम रही ,मन की असीम गहराई में 
उतरने के बाद जो संगीत सुना ,वो बिलकुल नया 
और अनसुना था,पर उन शब्दों  को कागज़ पर किस तरह 
उकेरा जायेगा ,ये बोध अभी नहीं हुआ है ,जाने कब सीख
पाऊँगी उन शब्दों को लिख पाना ,और कब बनेगा  नए शब्दों 
से सजा नया गीत,कुछ दिनों में,कुछ साल में या किसी नए जन्म 
तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी पता नहीं ................

(अवन्ती सिंह)



Thursday, 16 February 2012

रिश्ता


 



आंसूओसे यह अजीबसा रिश्ता कैसा -
मेरी हर आह्से बेसाख्ता जुड़े रहते हैं
ज़रा सी टीस दरीचोंसे झांकती है जब

मरहम बनकर उसे ढकने को निकल पड़ते हैं...
जब कभी चाहूं मैं रोकना पीना उनको-
हर हरी चोट को नासूर बना देते हैं -
जमकर बर्फ हो गए उन लम्होंको -
अपनी बेबाक तपिशसे जिला देते हैं ...
फिर तड़प का वही सिलसिला रवां करके
किसी मासूम की आँखों से ताकते मुझको-
मानो मेरा दर्द, मेरी तक्लीफ देखकर वह -
कुछ शर्मसार से निगाहोंको झुका लेते हैं.

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सरस दरबारी 
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merehissekidhoop-saras.blogspot.com


Tuesday, 14 February 2012

जिंदगी

 

आज फिर तेरे एक शुष्क पहलु को  देखा  जिंदगी!
अश्रु जल आँखों में  था,  बहने  से  रोका  जिंदगी !!

क्यूँ हर इन्सान तुझे अच्छा लगे है रोता,  जिंदगी !
देती क्यूँ हर इंसा की उम्मीद को तू धोखा ,जिंदगी!!

क्यों तू इतनी कठोर है ,पत्थर  सी  है  तू   जिंदगी!
क्यों कोई सनेह अंकुर तुझ में ना फुटा    जिंदगी!! 

हर पल   हर  छन  दर्द  तू  सबको ही देती जा रही!
काश के   तेरा   कोई   अपना  भी  रोता,  जिंदगी!! 

बन  कर  कराल  कालिका, तू  मौत का नृत्य करे!
कोई  शिव  आकर , काश तुझे रोक लेता जिंदगी !! 

Sunday, 12 February 2012

मन चंचल है

मन चंचल है ,  चपल है,   चलायमान है,   अधीर है 
जीत जाता अधिकाँश  युद्ध ,  ये   ऐसा   रणवीर  है 

रोज नया कुछ पाने की इच्छाए इसकी बढती जाती है 
बुद्धि, इसकी  देख हरकतें ,कसमसाती है  चिल्लाती है

पर ये है स्वार्थ का पुतला,इस को किसी की पीर नहीं है 
जीत इसे काबू में  कर ले ,  कोई भी  ऐसा  वीर  नहीं  है 

बड़े बड़े योगी  जनों   को ये ऊँगली   पर  नाच नचाता है 
तोड़  के   लोगों   के  व्रत -संकल्प  ये अट्टहास लगता है 

जो कहे के मन को जीत लिया, ये उसी  को  मुंह की खिलाता है 
महाविजय्यी ,महा योद्धाओं को ये चारों खाने चित कर जाता है 

इसे पराजित  कर   लेने   का   कभी   भी   करो   गुमान   नहीं 
ये काम असम्भव है बिलकुल ,   हम   इन्सां है,  भगवान नहीं 

जीत नहीं सकते गर इस को, तो परिवर्तित कर दें इसकी  राहें 
इच्छाएं मारे से मरे ना तो आओ बदल दें हम   मन  की   चाहें 

हे मन तू   ईश्वर   में खो जा,    तू    उस   का   रूप निहारा कर 
तू उस के आगे    नाचा  कर,    और  हर  दम  उसे   पुकारा  कर 

कर के पुण्य कार्य,सद्कार्य तू ,   दुखियों   के   दुःख   निवारा   कर 
सब व्यसन त्याग दे,आज अभी ,बस प्रभु प्रेम का नशा गवांरा कर.

पुरानी कविता
========= 

(अवन्ती सिंह)


Friday, 10 February 2012

वो कभी






वो कभी अपना ,कभी अजनबी सा लगा 
लगा ख्वाब कभी,तो कभी यकीं सा लगा

उस को  देखते  ही  मर  मिटे  थे  हम तो 
हद है के वो  फिर  भी  जिंदगी  सा  लगा

कभी लगा के सागर हो वो गम्भीरता का 
और   कभी    सिर्फ  दिल्लगी  सा   लगा  

कभी    तो     सांस    सांस    जीया   उसे 
और    कभी    बीती  जिंदगी   सा   लगा  

उस   के  साए  में  सो   गए    हम  कभी 
और   कभी  धुप  वो  तीखी   सा    लगा 

कभी पाकर लगा उसे, पा ली कायनात सारी
और कभी वो हाथ से रेत फिसलती सा लगा

उस की आँखों में उतर कर गुम हो गए हम 
कभी वो झील सा  तो  कभी  नदी  सा लगा

(अवन्ती सिंह)


Wednesday, 8 February 2012

प्रेम जब अनंत हो गया,रोम रोम संत हो गया ...







                                                         (  माँ आनन्दमयी )


माँ आनन्दमयी का व्यक्तित्व मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा ,मेरा मानना है उन की तस्वीर को कोई कुछ देर निहार ले तो आनन्द से भर जाता है ,सच्चे संत की ये ही पहचान होती है ,उन को देखने भर से शान्ति मिल जाती है !
माँ का जन्म,  त्रिपूरा के खेडा नाम के गाँव में एक बंगाली परिवार में  ३० अप्रैल १८९६ को हुआ था ,१२ वर्ष की आयु में उनका विवाह भोलानाथ जी के साथ हुआ,बचपन से ही कृष्ण की आराधना  में  लीन रहने  वाली माँ आनन्दमयी की भक्ति  ,उम्र के साथ -२ परवान चढने लगी ,कृष्ण प्रेम में आकंठ डूब जाने के बाद २६ वर्ष की उम्र में उन्होंने प्रवचन के माध्यम से ये प्रेम रस  जन सामान्य  में वितरित करना शुरू किया , उन का शरीर 
१९८३ में पञ्च तत्व में विलीन हो गया पर माँ का प्रेम आज भी महसूस किया जा सकता है .

Tuesday, 7 February 2012


एक अंतराल के बाद देखा...
मांग के करीब सफेदी उभर आई है
आँखें गहरा गयी हैं,
दिखाई भी कम देने लगा है...
कल अचानक हाथ कापें ..
दाल का दोना बिखर गया-
थोड़ी दूर चली ,
और पैर थक गए .
अब तो तुम भी देर से आने लगे हो..
देहलीज़ से पुकारना ,अक्सर भूल जाते हो
याद है पहले हम हर  रात पान दबाये,
घंटों घूमते रहते...
..अब तुम यूहीं टाल जाते हो...
कुछ चटख उठता है-
आवाज़ नहीं होती ...
पर कुछ साबुत  नहीं रह जाता.....
और यह कमजोरी,
यह गड्ढे,
यह अवशेष
जब सतह पर उभरे ...
एक चटखन उस शीशे में बिंध गयी ..
..और तुम उस शीशे को...
.. फिर कभी न देख सके!




(Saras Darbari )

Sunday, 5 February 2012






क्या कहिये ऐसी हालत में कौन समझने वाला है 
सब की आँखों  पे  पर्दा है हर एक जुबां पर ताला है 

किस के आगे सर पटकें और चिल्लाये किस के आगे 
एक हाथ में छुपा है खंज़र ,   एक   से  जपते माला है 


करनी और कथनी में अंतर ,आसमाँ और ज़मीं का है 
कहते थे क्या क्या कर देगें,पर बस बातों   में  टाला है 





 (इस रचना की पहली पंक्ति किसी ब्लॉग पर मुशायरे में  ग़ज़ल लिखने
के लिए रखी गयी ,मैं ने कोशिश की पर क्यूकि मुझे ग़ज़ल के नियम पता नहीं 
है के कैसे लिखते है ,तो ये उस मुशायरे के नाकाबिल साबित हुई,यहाँ में इसे ग़ज़ल 
के रूप में नहीं सिर्फ अपनी एक रचना के रूप में रख रही हूँ )
(अवन्ती सिंह)

Friday, 3 February 2012




अबके आना तो चराग़ों की हंसी ले आना
 लान की घास से थोड़ी सी नमी ले आना
                       ----
होंट शीरीं के बहुत खुश्क हैं मुरझाए भी हैं
तुम पहाड़ों से कोई शोख नदी ले आना
                          ---
वक़्त पर मिल सके जो चीज़ वही काम की है
जो भी हो ज़हर या अक्सीर अभी ले आना
           ---
मुद्दतें गुजरी हैं शबखाने में साग़र में खनके
किसी तौबा से मेरी प्यास कोई ले आना
           ---
आज वोह आएँगे खुश दिखने की सूरत कर लें
शब को बाज़ार से कुछ खंदालबी ले आना
    खंदा लबी = मुस्कराहट 
   ================
                   
       ( अखतर किदवई )

Wednesday, 1 February 2012

नादान फूल





फूलदान   में  मुरझाने   ही  वाले  है  जो, वो  फूल

वो मुझे कह रहे है  बार-२,  के  तुम  चले   गए हो

मैं उन्हें झिड़क देती हूँ पागल और नादान कह कर

अगर   तुम  चले   गए  होते   मुझ   से  दूर   कहीं 

तो    मेरी   पलकें     झपकना    ना   भूल    जाती

बंद ना  हो  गयी  होती  मेरी  आँखों  की  हलचल?


मेरे होठों  की  गुलाबी  रंगत  पर  गम  की स्याही

ने   कब्ज़ा  ना   कर  लिया   होता     अब   तक ?

दिल   धडकने   से   मना   ना   कर   चुका होता 

साँसें      थम     के   खड़ी   ना   हो   गयी   होती 

तुम्हारे   जाने   की    गवाही    देने    के   लिए ?

ऐसा     तो   कुछ      भी     नहीं    हुआ    है ना  ?

फिर कैसे सच मान लूँ मैं इन नादान फूलों की बात 

मेरा  होना  ही सुबूत है  तुम्हारे   ना   जाने  का ......






(अवन्ती सिंह )

Sunday, 29 January 2012

सख्त मना है

 कविताए दिमाग़ मे कभी भी अंकुरित होने लगती है
मेरे मन मे ये विचार कई बार आता है के जब मैं ही कविताओं के असमय प्रकट
होने से परेशानी मे पड़ जाती हूँ तो फिर उनका क्या हाल होता होगा जो निरन्तर
लिखते रहते है,उन के हालत की   कल्पना   करके   मैं    ने   ये   कविता लिखी है
इस रचना मे  कविताओं को बेवक्त  दिमाग़   मे ना  आने की   हिदायत   देते हुए

 उनके बेवक्त आने के कारण होने वाली परेशानी से रूबरू करवाने की कोशिश की
है ताकि वे वक्त देखकर  दिमाग में  आया करें  ...........


                सख्त मना है 

 

बाद  शाम  के,  मेरे   घर  मे    आना    सख़्त   मना  है


ग़ज़लो और कविताओ तुम को   गाना   सख़्त मना  है


बाद शाम के तो मैं गीत पिया-मिलन के गाने लगती हूँ


आँखे   राह   पर    होती   है,  श्रृंगार  सजाने   लगती  हूँ


लिखने मे कविता देर हुई ये बहाना बनाना सख़्त मना है!


बाद शाम के,   मन-पंछी   उड़   उड़   खिड़की  पर जाता है


आएगे   वो   अब   आएगे,   ये   मधुर   संदेश   दोहराता है


इस संदेश को सुनकर भी, ना   सुन   पाना   सख़्त  मना है


बाद शाम के........


बाद शाम के कान   हर  एक  आहट  सुनते  रहते  है


पिया-मिलन नज़दीक है,पल पल ये मुझ से कहते है


उस आहट को सुन कर भी,ना सुन पाना सख़्त मना है


बाद शाम के.........


बाद    शाम    के   जब   साहब   थक   कर वापस   आते  है


हम भी     आख़िर   इंसान   है,   हंसते       है   मुस्काते    है


उस हास्य-विनोद का,किसी को भी सुन पाना सख़्त मना है


बाद     शाम    कें   मेरे  घर    मे    आना    सख़्त    मना  है.




पुरानी रचना 
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अवन्ती  सिंह 
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आप सब नए ब्लॉग पर सादर आमंत्रित है 
 गौ वंश रक्षा मंच gauvanshrakshamanch.blogspot.com

इलायची

काफी वक्त पहले एक परिचित ने ये बात मुझे बताई थी,मैं अक्सर इस का प्रयोग करती हूँ,खुद पर और जिन्हें भी उदास देखती हूँ उसे जरुर कहती हूँ तो  आज आप सब के साथ भी ये राम बाण नुस्खा शेयर कर रही हूँ ,जब भी उदासी लगे इलायची चबाना शुरू कीजिये ,कई लोगों को ज्यादा उदासी हो जाती है तो वो एक के बाद एक इलायची चबाये ,और जब भी ऐसे लगे इस क्रम को दोहराए ... उदासी भाग जाएगी और मन में नई उर्जा का संचार  होगा .आजमा कर  देखिये ......



Saturday, 28 January 2012

कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्रकार थी....हरियाणा के मेवात में गौ हत्या रोकने के अभियान के अंतर्गत मुस्लिम समुदाय द्वारा 'संकल्प इण्डिया' के सहयोग से १५० ,००० गाय पाली जा रही है .........

कितना सराहनीय कार्य है ये हमे उन सब मुस्लिम  भाइयों का दिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए ..... 

तथा अन्य मुस्लिम भाइयों से भी अपील करनी  चाहिए के  आप हमारे साथी/मित्र  और एक ही देश के वासी होने के नाते हमारी माँ (गौ माता) को अपनी माँ की नज़र से देखे ,यदि ऐसा न कर पाए तो ये ही सोच ले के ये मेरे किसी हिन्दू मित्र की माँ के समान है ,तो फिर आप कभी गौ मॉस का सेवन नहीं कर पायेगे .... आप से करबद्ध विनती .....हमारी माँ के प्रति अपनी संवेदनाये जगाए ..........http://gauvanshrakshamanch.blogspot.com/

गौ वंश रक्षा मंच: कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्र...

गौ वंश रक्षा मंच: कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्र...: कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्रकार थी....हरियाणा के मेवात में गौ हत्या रोकने के अभियान के अंतर्गत मुस्लिम समुदाय द्वारा '...

Friday, 27 January 2012

गौ वंश रक्षा मंच:  गौ रक्षा मंच गौ रक्षा एक ऐसा विषय है जिस के साथ ...

गौ वंश रक्षा मंच: गौ रक्षा मंच
गौ रक्षा एक ऐसा विषय है जिस के साथ ...
: गौ रक्षा मंच गौ रक्षा एक ऐसा विषय है जिस के साथ गम्भीरता से जुड़ने की ,कुछ करने की बहुत आवश्यकता है ,ये ही सोच कर इस मंच का निर्माण किया गय...

Tuesday, 24 January 2012

सिवा तुम्हारे

तुम कब तक नकारते रहोगे मुझे 
मेरे उस अस्तित्व को ,जो कब का 
तुम में विलीन हो चूका है ......
और तुम मेरे होने ,न होने को सिर्फ
मेरे जिस्म की उपस्तिथि से आँक रहे हो 
झांको खुद में ,और देखो ,मैं तो तुम्हारे 
हृदय के सिघासन पर विराजमान हूँ 
और तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व ने स्वीकार 
कर लिया है मेरे साम्राज्य को ....
सिवा तुम्हारे..........

(अवन्ती सिंह)

Sunday, 22 January 2012

ऐ जिंदगी

अभी  तीर और चला ऐ जिंदगी 
अभी   सांस   मेरी   थमी   नहीं 

लडखडा तो गए है कदम मगर 
अभी  पाँव  ने छोड़ी जमी नहीं

अभी मेरी पीठ में, खंज़र कुछ 
और समा   सकते है,  ना  रुक 

कहर  और   बरपा  ऐ जिंदगी 
मुझ में हौसलों की  कमी नहीं 

(अवन्ती सिंह)


Tuesday, 17 January 2012

जिंदगी आ तुझे शब्दों में आज ढाला जाये

जिंदगी आ तुझे शब्दों   में   आज   ढाला  जाये 
दिल की हसरतों को सभी, आज निकला जाये 


आसूं पौंछ  दिए  जाएँ   हर  नम आँख से और 
हर एक भूखे के पेट तक आज  निवाला  जाये 

दिल और जिस्म के हर ज़ख्म पर लगे मरहम आज 
दुःख और दर्द को दे दिया आज   देश निकला जाये 

दी जाये एक मुस्कान ,तोहफे में किसी मायूस को 
बन के   हमदर्द,  किसी   बेबस को सम्भाला जाये 

कभी ना देखी हो खुशियों की रौशनी जिस ने ,उस के लिए 
सूरज  की   किरणों से  आज लिया   छीन,  उजाला  जाये 

 आओ खोलें आज   मिल कर ,  हम सब   मधुशाला  स्नेह की 
जहाँ से हर एक प्यासे के होठो तक, पंहुचा दिया एक प्याला जाये 
(अवन्ती सिंह)

Sunday, 15 January 2012

तमाम उम्र ढूंढे उसके कदमो के निशां,दश्त -ओ-सहरा में
पर वक्त की तेज  आंधी ने तो  वो सब मिटा दिए थे ......

मर ही जाते हम,मगर बड़ा हौसला दिया उन्होंने
तेरे दिए कुछ फूल जो किताबों में छुपा दिए थे .........


(दश्त   -ओ-सहरा= मैदान और मरुस्थल )


         (अवन्ती सिंह )