Thursday, 16 February 2012

रिश्ता


 



आंसूओसे यह अजीबसा रिश्ता कैसा -
मेरी हर आह्से बेसाख्ता जुड़े रहते हैं
ज़रा सी टीस दरीचोंसे झांकती है जब

मरहम बनकर उसे ढकने को निकल पड़ते हैं...
जब कभी चाहूं मैं रोकना पीना उनको-
हर हरी चोट को नासूर बना देते हैं -
जमकर बर्फ हो गए उन लम्होंको -
अपनी बेबाक तपिशसे जिला देते हैं ...
फिर तड़प का वही सिलसिला रवां करके
किसी मासूम की आँखों से ताकते मुझको-
मानो मेरा दर्द, मेरी तक्लीफ देखकर वह -
कुछ शर्मसार से निगाहोंको झुका लेते हैं.

============================ 


सरस दरबारी 
--------------- 
merehissekidhoop-saras.blogspot.com


20 comments:

  1. बहुत खूबसूरत रचना.
    सांझा करने का शुक्रिया अवंति जी..

    ReplyDelete
  2. बहुत खूबसूरत रचना............
    सांझा करने का शुक्रिया अवंति जी|

    ReplyDelete
  3. गहरे भाव।
    सुंदर रचना।

    ReplyDelete
  4. मानो मेरा दर्द, मेरी तक्लीफ देखकर वह -
    कुछ शर्मसार से निगाहोंको झुका लेते हैं.

    शर्मसार निगाहों का झुकना कविता में चमत्कार पैदा कर गया ...!

    ReplyDelete
  5. अनुपम भाव संयोजन के साथ उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ।

    ReplyDelete
  6. ज़रा सी टीस दरीचोंसे झांकती है जब
    मरहम बनकर उसे ढकने को निकल पड़ते हैं...

    behad prabhavshali rachna...........

    ReplyDelete
  7. दिल की गहराई तक उतरती रचना !
    बहुत सुन्दर ...!
    आभार !

    ReplyDelete
  8. बहुत ही खूबसूरत कविता।


    सादर

    ReplyDelete
  9. कल 18/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  10. बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल है....शानदार ।

    ReplyDelete
  11. मानो मेरा दर्द, मेरी तक्लीफ देखकर वह -
    कुछ शर्मसार से निगाहोंको झुका लेते हैं.

    ... बहुत सुंदर पंक्तियाँ...रचना दिल को छू जाती है..बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  12. जिंदगी का संदेश लिये हुए है आपकी रचना....अवंति जी|

    ReplyDelete
  13. शानदार रचना के लिए बधाई.

    ReplyDelete
  14. अतिसुन्दर.....बेहतरीन प्रस्तुति.....
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2)

    ReplyDelete
  15. ज़रा सी टीस दरीचोंसे झांकती है जब
    मरहम बनकर उसे ढकने को निकल पड़ते हैं...

    वाह ॥सुंदर पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  16. आंसुओं की प्रवृति ही ऐसी है ... हर हाल में साथ देते हैं ...
    लाजवाब लिखा है ...

    ReplyDelete
  17. अवन्तिजी को रचना साझा करने के लिए और आप सबको उसे सराहनेके लिए बहुत बहुत आभार !!!!
    मेरे नए ब्लॉग पर आप आमंत्रित हैं http://merehissekidhoop-saras.blogspot.in

    ReplyDelete