Tuesday, 22 May 2012

कुछ ख़ास हुए बिना

हम रोजाना सुबह उठते है अपनी सभी दिनचर्या निभाते है अपने कामों में रिश्तों ,दोस्तों में उलझे रहते है कब शाम होती है कब रात पता ही नहीं चलता और दुसरे दिन जागने के लिए हम फिर से सो जाते है सोने से पहले अनेक बार ये विचार हम से के मन में कभी न कभी जरुर  आता है के कुछ खास दिन नहीं था बस यूँ ही गुजर गया ,मैं भी अक्सर ऐसे सोचा करती हूँ पर शनिवार को हुई एक छोटी सी घटना ने मुझे इस पर सोचने को  मजबूर किया ,हुआ यूँ के मैं सुबह सब के लिए टिफिन बनाने की तैयारी में लगी हुई थी मेरी बेटी को करेले को चिप्स की शेप में घिस कर फिर उसे तल कर बनाई सब्जी बहुत पसंद है तो सोचा साथ में वो भी बना लेती  हूँ,काफी दिन से एक नया कद्दूकस खरीदा हुआ रखा था  काफी तेज 3 इंच का तेज ब्लेड उस में अटेच किया हुआ है  ,मैं पुराने कद्दूकस से ही काम किया करती थी,अचानक मन में आया के नए कद्दूकस को निकला जाए   बस इस एक विचार ने पुरे परिवार की दिन चर्या ही बदल डाली ,उसे इस्तेमाल करते हुए कई बार लगा भी के ब्लेड का एंगल  काफी खतरनाक है इस में सोचती रही  के किसी और को तो इसे कभी उसे नहीं करने दूंगी शायद खुद की समझदारी पर ज्यादा ही भरोसा था मुझे आखिरी करेले को घिस ही रही थे के एक पल को वहां से ध्यान हट गया और ब्लेड को अपनी तेजी बताने का पूरा मौका मिल गया ,साधारण कद्दूकस  इस मामले में काफी उदार होते है कुछ खरोच लगा कर बक्श देते है पर इस ब्लेड का एंगल  इतना गलत था और ब्लेड इतना तेज  के मेरी ऊँगली के आगे के लगभग आधे इंच के हिस्से को काफी  गहरे तक साफ़ कर दिया बस गनीमत ये रही के वो हिस्सा ऊँगली से अलग नहीं हुआ ,मुझे समझने में में कुछ पल लगे के ये क्या हुआ जख्म को दबाए हुए बाहर  आई सब को बताया तो सब घबरा उठे खून ने तो न रुकने की कसम खा ली मैं  ऊँगली  को जोर से दबाए हुए बर्फ के पानी में हाथ डालती  भी न थी के कुछ ही पल में डोंगे का सारा पानी खून से भरा हुआ लगता है ,मन काफी घबराने लगा के अब तो टाँके ही लगेगे ऊँगली में ,मैं ने सुना है  उस में काफी दर्द होता है , लगभग 3घंटे  मैं ऊँगली को बर्फ के पानी में रखे रही और जोर से दबाए रही ,बीच बीच में देखती रहती थी के खून रुका या नहीं आखिर खून रुक ही गया,डॉ. की दूकान खुलने का वक्त भी हो गया था वहां जाकर इंजेक्शन लगवाया,डॉ। की  ये बाद सुनकर जान में जान आई के अभी इसे ऐसे ही चिपके रहने देते है यदि फिर से खून बहना न शुरू हुआ तो टाँके की जरूरत नहीं पड़ेगी  ड्रेसिंग करवाई ,और दवाएं लेकर घर वापस आई,उस दिन से हाथ की उपियोगिता भी समझ में आ रही है और ये बात भी के यदि सुबह से शाम तक जिस दिन ऐसे लगे के आज का दिन ऐसे ही बीत गया उस दिन भगवान् को धन्यवाद  भी करना चाहिए के कुछ ख़ास हुए बिना ही बीत गया ये दिन :) :) :)
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9 comments:

  1. प्रशंसनीय

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  2. इस छोटी सी घटना ने बहुत बड़ी सीख देदी...

    नीरज

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  3. बहुत ही प्रेरणात्‍मक प्रस्‍तुति

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  4. दिन सामान्य बीतना भी ईश्वर को धन्यवाद देने का विषय है।

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