Friday, 14 October 2011

पतझड़

क्यूँ हर तरफ  अब पतझड़ ही पतझड़ है !
आवाजें सब खामोश है,हर पंछी अब बेपर है !! 
क्यूँ ये ज़मीं इतनी शुष्क और बंज़र है !
जाये नज़र जहाँ तक भी, वीरान सारा मंज़र है!!
कसमसा कर टहनियां, टूटती है,गिर जाती है!
देख कर भी ये तमाशा ,पेड़ खामोश  है,बेबस है !!
एक डगर से कोई राहगीर अब गुज़रता ही नहीं!
छावं बची नहीं जरा भी,बस तपिश है जैसे खंज़र है!!
एक हरा तिनका भी उम्मीद का दीखता नहीं!
करे कैसे सब्र जब छाया हर तरफ ही कहर है !!
ओ खुदा अब तो लौटा दो ,मौसम ऐ बहार को !
हर दर से मायूस है हम, बस अब तुझ पे नज़र है!!
अवन्ती सिंह

3 comments:

  1. har ek raat ke baad savera hai, ghane baadloke pichhe chhupa suraj hai, aashaoki nayee kirne leke aati ek nayee jindgi hai, wo subah kabhi to aayegi!

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  2. आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

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