Tuesday, 20 December 2011

जश्ने बहार


फूलों से भर गयी है डालियाँ सारी
कोयलें  कुहुक   कुहुक   जाती  है 

भंवरों  ने  डेरे  डाले  कलियों पर
कोपलें  , देख  ये  जल  जाती  है

नदी में थिरकती है मछलियां खूब 
कौन   सा   नृत्य    ये   दिखाती है

घटाए बावरी हुई देखो ,बिन मौसम 
भी    उमड़ी      घुमड़ी     आती   है 


बजाके तालियाँ ,ये पत्तियाँ शरारती 
क्यूँ  दांतों  तले  उंगलियाँ   दबती  है 


पेड़ों    से   लिपटी   है    लताये   जो
पलक  क्यूँ   शर्म  से  वो झुकाती   है

तितलियाँ  पहन  के   लिबास   नए
आज कुछ    अलग   ही   इतराती है 

उन  के आने  से   जश्न   हुआ   है ये  
बहारें    ऐसी    कम    ही    आती   है






 


 

8 comments:

  1. वाह अवंती जी ..
    बहुत सुन्दर....

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  2. बहुत रोचक शब्द चित्र...

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  3. उन के आने से जश्न हुआ है ये
    बहारें ऐसी कम ही आती है
    vah bahut sundar panktiyan Awanti ji . Ap ne to paristhitiyon ka badi khoobsoorti ke sath rekhankan kiya hai badhai ...

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  4. बजा के तालियाँ ,ये पत्तियाँ शरारती
    क्यूँ दांतों तले उंगलियाँ दबाती है.

    बहुत मनोरम प्रकृति चित्रण, वाह !!!

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  5. बजा के तालियाँ ,ये पत्तियाँ शरारती
    क्यूँ दांतों तले उंगलियाँ दबाती है.

    बहुत मनोरम प्रकृति चित्रण, वाह !!!

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  6. बहुत सुन्दर प्रकृति के सौंदर्य को मनोभावों में बिम्बित करती कब्यांजलि....शुभकामनाएं !!

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