Friday, 23 December 2011

जीवन चक्र

बहारों के आने  मे   वक़्त  तो लगता है
खिज़ाओं के जाने मे वक़्त तो लगता है
मगर अब   तो ज़िंदगी गुलज़ार है  मेरी
सारे जहाँ   की  खुशियाँ ताबेदार है मेरी
ना जाए यह  खुशिया ,यहीं थम सी जाए
अब तो यही  चाहत,लगातार   है     मेरी
मगर यह है चाहत ,नियम तो  नही यह
बहारों को एक दिन तो जाना    ही  होगा
खिज़ाओं को वापस तो आना ही    होगा
यह चक्र तो    यूँ    ही    चलता   है सदा
एक    आता    है    तो एक लेता है विदा
तो फिर क्यू ना खुद को नियती चक्र के लायक बना लूँ मैं
दुख और    सुख    के   मध्य    की   अवस्था  को पा लूँ मैं 



(एक पुरानी रचना)
          

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