Friday, 6 January 2012

बैठे है

खुद को जाने कितने ही पर्दों में वो  छुपाये बैठे है 
और फिर चेहरे पर एक मुखौटा भी लगाये बैठे है  

कैसे समझेगे और कैसे जानेगे हम,के क्या है वो 
झांकती  हैं जो मुखौटे से,वो आँखें भी झुकाए बैठे है 

हाथों के  इशारे  से  भी  तो कुछ   समझाते  नहीं है 
और  होठों   पर    भी   चुप के  ताले  लगाये  बैठे है 

कब तलग न खोलेगे वो राज़ अपना ,कभी तो हद होगी 
उसी हद की आस में ,सर को उनके दर पे झुकाए बैठे है


13 comments:

  1. chehraa par chehraa lagaanaa
    unkee aadat ho gayaa
    mohabbat kaa dikhaavaa karnaa
    dastoor ho gayaa

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  2. हाथों के इशारे से भी तो कुछ समझाते नहीं है
    और होठों पर भी चुप के ताले लगाये बैठे है


    बेहतरीन।


    सादर

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  3. बहुत सुन्दरता से इंतज़ार लिखा है
    बधाई......
    मेरी नयी रचना चुप हूँ पर पढने के लिए इस लिंक पैर क्लिक करें
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  4. उसी हद की आस में ,सर को उनके दर पे झुकाए बैठे है

    vaah bahut khoob.

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  5. हाथों के इशारे से भी तो कुछ समझाते नहीं है
    और होठों पर भी चुप के ताले लगाये बैठे है
    कब तलग न खोलेगे वो राज़ अपना ,कभी तो हद होगी
    उसी हद की आस में ,सर को उनके दर पे झुकाए बैठे है
    .....har tale ka chhabi hoti hai.....kabhi na kabhi raj khulta lazimi hai..
    bahut hi khoob kahi aapne..
    sundar prastuti

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  6. मन की भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन प्रस्तुति ......
    WELCOME to--जिन्दगीं--

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  7. बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति...

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  8. अगला शेर मेरी ओर से आपकी भेंट -

    कब मिलेंगे वो जिनके दिलों में साफ़गोई
    हम उनके इंतज़ार में आँखें बिछाए बैठे हैं

    आपकी रचना दिल के इतने करीब लगी कि शब्द फूट ही तो पड़े !

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  9. बेजोड़ भावाभियक्ति....

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  10. आपके ब्लॉग पर पहली बार ए हैं ...............सभी रचनायें बहुत सुंदर हैं

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