Friday, 13 January 2012

मेरे हरीफ़ों ने कोशिश तो लाख की मगर 
 मैं एक दीया था खुदा का जलाया हुआ 

कितने उठाये तूफ़ान ,पर मेरी लौ भी ना हिली 
मुझ में था नूर  किसी  और  का  समाया  हुआ 

हरीफ़ों =विरोधियों 
=============




(अवन्ती सिंह) 

11 comments:

  1. bahut hi sundar likhti hai aap ...aur gahara bhi ...bahut accha laga pad kar ....badhaiya

    ReplyDelete
  2. Wah!!! mujhme tha noor kisi aur ka samaya hua.....

    excellent....

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छी सुंदर प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति रचना अच्छी लगी.....
    new post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....
    बहुत दिनों से मरे पोस्ट पर नही आई,..क्या बात है

    ReplyDelete
  4. badhiyaa bahut khoob
    meraa honslaa meree himmat mere saath thee
    usse jyaadaa uskee duaayein mere saath thee

    ReplyDelete
  5. कितने उठाये तूफ़ान ,पर मेरी लौ भी ना हिली
    मुझ में था नूर किसी और का समाया हुआ

    वाह लाजबाब। मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  6. भावों से नाजुक शब्‍द......

    ReplyDelete
  7. वाह! खूबसूरत अशआर

    ReplyDelete
  8. मेरे हरीफ़ों ने कोशिश तो लाख की मगर
    मैं एक दीया था खुदा का जलाया हुआ

    कितने उठाये तूफ़ान ,पर मेरी लौ भी ना हिली
    मुझ में था नूर किसी और का समाया हुआ


    Awanti ji ...kya khoob likha hai apne ....bilkul lajabab rachana.

    ReplyDelete