Tuesday, 8 November 2011

ये कविता आज कल के माहौल पर लिखने की कोशिश की है ,अजब तमाशा देखने को मिलता है ,जो भी आवाज़ उठता है ,उसे दबाने के लिए कुछ दिन बाद उस इंसान को ही गलत साबित करने की पुरजोर कोशिश की जाती है,कुछ पंक्तियाँ लिखी है उम्मीद है आप सब को पसंद आयेंगी ..... 

किस ओर से चले हम ,किस ओर जा रहे है?
हीरे को छोड़ कर  हम  पत्थर  उठा   रहे  है  

हद पागलपन की भी तो हम पार कर चुके है
हीरे  को   पत्थरों की   कीमत    बता  रहे  है

आदर्श , समझ, सोच , सब धुल में मिले है 
और धुल को उठा कर ,चेहरे  सजा    रहे   है 

दोष और को न देना हम खुद ही खुद के दुश्मन 
जिस ड़ाल  पर  है  बैठे  , उसे  खुद जला  रहे  है

किस ओर से चले हम ,किस ओर जा रहे है?
हीरे को छोड़ कर  हम  पत्थर  उठा   रहे  है

( अवन्ती सिंह )


 






Monday, 7 November 2011

मेरी दास्ताँ ऐ हसरत  वो सुना सुना के रोये 
मुझे आजमाने वाले मुझे  आजमा  के  रोये

जो सुनाई अंजुमन ने शबे गम की आप बीती
कई रो के मुस्कराए ,कई  मुस्करा  के  रोये

कोई ऐसा अहले दिल हो जो, फसाना ऐ मोहोब्बत
मैं उसे सुना के रोऊँ  वो मुझे  सुना  के  रोये  

मैं हूँ बे वतन मुसाफिर, मेरा नाम बेबसी है 
मेरा कौन  है जहां में,जो गले लगा  के  रोये 

मेरी दास्ताँ ऐ हसरत  वो सुना सुना के रोये 
मुझे आजमाने वाले मुझे  आजमा  के  रोये

(अनजान शायर )
 

Sunday, 6 November 2011

आज २ नवंबर २०११ दोपहर २.१९ मिनट पर. मेरे पुत्र चि: रितेश के घर लक्ष्मी रूपेण कन्या ने जन्म लिया है, मेरी एक भावना

 

 

मेरा जीवन दीप जलाने आयी,
मेरे उत्सुक मन की आशावरी,
प्रभा-मुख सजाये,
सुखद अनुभूति धारित,
हरित-मन-प्रसारित,
चन्दन-शीतल-आनन्दित,
तन हर्षित,
मन हर्षित,
मेरे जीवन की  विभावरी |

आयी तू लिए,
आकांक्षाएं,
हो रही,
ह्रदय-स्थल पर
अदभुत अनुभूतियाँ ,
जलने लगा अब,
आशाओं का नया दिया,
तू साक्षात् विष्णु-प्रिया,

अभिलाषाओं की संचित
जीवन-शृंगार प्रभावारी,
मानस-पटल पर शीतल-जल-बावरी,
मेरे जीवन की  विभावरी |
=====0====

सुरेश चौधरी
तुम जो कहना  चाहो वो मेरे    लब   पे   पहले आता है 
हमारे    विचारो    का    मेल   मुझे   बहुत    भाता   है  

कितने   लोगों   का   दिल   इस    तरह   मिल  पाता  है?
तुम   से  जुदाई     का  ख्याल    भी   मुझे   सताता   है 

तुम्हारी  आँखों   में , मेरे  लिए जब    प्यार   झिलमिलाता है  
लगे ऐसा के जैसे चाँद को देख कर ,चकोर कोई कसमसाता है 

कभी ,     कहीं   जब  कोई   प्रीत    के   गीत    गुनगुनाता     है
लगे के   हमारी   दास्ताँ     दुनिया   को     वो   सुनाता    है 


तुम जो   कहना  चाहो वो  मेरे    लब   पे   पहले  आता  है 
हमारे    विचारो    का    मेल   मुझे   बहुत    भाता     है











   







Saturday, 5 November 2011

एक वृक्ष को माध्यम बना कर मैं उन लोगों का दर्द आप सब तक पहुचाना चाहती हूँ जिनकी उंगली पकड़ कर हम चलते है और जब उन्हें हमारे सहारे की जरूरत होती है तो हम अपनी अलग दुनिया बना उस में खो जाते है ,अपनी जड़ों को भूल जाते है हम........


 मैं एक सुखा वृक्ष  हूँ,कई जगह से टुटा वृक्ष  हूँ
लेकिन मेरी शाखाएं  इतनी विशाल है के अभी भी 
 कई राहगीरों को  धुप से बचाता हूँ , छुपाता  हूँ   

मैं तडपता हूँ, रोता हूँ खून के आंसू  लेकिन जला  कर खुद को 
दुनिया वालो को अभी भी  ठण्ड  से  बचाता  हूँ  ,हंसाता  हूँ 

मुझ में अब एक भी अंकुर न फूटेगा ये  तय  है  लेकिन
कई नए  पौधों  के  अभी   भी  मैं घर- बार   चलाता    हूँ 

हुजूम चारों  तरफ  है मेरे, घिरा   हूँ वृक्षों   से  लेकिन,  
अकेला हूँ अभी भी ,अकेलेपन से मैं आज भी घबराता हूँ 

Friday, 4 November 2011

दिल के करीब

ये कविता मैं ने लगभग २ महीने पहले लिखी थी पर अभी तक मैं ने इसे किसी को सुनाया या लिखा  नहीं है,
ये कविता मेरे दिल के बहुत करीब है, अजीज है मुझे ,उम्मीद है  आप सब  को  भी पसंद आएगी..... 

अब मैं  कविताओ  के  प्रकार  बदलने   लगी  हूँ 
आकर  बदलने  लगी  हूँ,  व्यव्हार  बदले  लगी हूँ  

कब तक कवितायेँ सावन की   फुहारें  लाती जाएगी 
कब तक मेघा  बन  बरसेगी,मल्हार  गाती  जाएगी
इन भीगी कविताओ के वस्त्र ,इस बार बदलने लगी हूँ 
अब   मैं  कविताओं  के  प्रकार   बदलने    लगी   हूँ 

कब तक श्रृंगार -रस  में डूबी  रास रचाएगी   कवितायें  
कब तक नृत्य करेगीं  कब तक मन बहलाएगी कवितायेँ 
मैं  अब  इनके  सारे  हार   श्रृंगार  बदलने   लगी   हूँ 
अब  मैं  कविताओं   के   प्रकार   बदलने   लगी   हूँ   

कब तक वीर-रस के  ढोल  नगाड़े   पीटेगी कवितायेँ 
कब तक इन्कलाब के नारे ,चिल्लाएगी , चीखेगी कविताये
अब  इनके  हाथों  की  मैं,  तलवार    बदलने  लगी   हूँ   
अब  मैं   कविताओं  के   प्रकार  बदलने   लगी   हूँ 

कब तक सब की आँखों में अश्रु-जल छलकाएगी कविताये 
कब  तक  रोयेगीं,    तरसेगीं,    तड़पायेगी   कवितायेँ 
इन की  सृष्टी  और  इनका   संसार  बदलने  लगी   हूँ
अब   मैं   कविताओ   के  प्रकार   बदलने     लगी     हूँ 

Thursday, 3 November 2011

सूरज ,सितारे,चाँद मेरे  साथ  में रहे !
जब तक तुमारे हाथ  मेरे हाथ  में रहे!!

शाखों से टूट जाये वो पत्ते नहीं है हम!
आंधी से कोई कह दे  के औकात  में रहे!!

कभी महक की तरह हम गुलो से उड़ते है!
कभी  धुएं  की तरह  पर्वतों से  उड़ते है!!

ये कैचियां हमे उड़ने से  खाक  रोकेगी !
हम परों  से नहीं,  हौसलों  से  उड़ते है !!

( राहत इन्दोरी )