Tuesday, 21 August 2012

वृक्ष आम का



सुना है तुम्हारे  कमरे की खिड़की के पास खड़ा है एक वृक्ष आम का
वो भर गया होगा अब तो बौर से
उस पर बैठ  कर कोयल भी कूका  करती होगी अक्सर
क्या उस की कूक  सुन कर कभी मेरी याद आती है?
कभी तेज हवाओं से उस वृक्ष के पत्ते  जब टकराते है आपस में
तो तुम्हे लगता नहीं के तुम्हारे कानों में मेरे बारे में कुछ बुदबुदा
रहे है ये पत्ते .....
और कभी बारिश में ,पत्तों पर पड़ी बूंदे  तुम्हे मेरी आँखों की चमक
की याद नहीं दिलाती ?
कभी तो उस वृक्ष की लहराती डालियाँ मेरी जुल्फों सी प्रतीत हुई होगी तुम्हे
कहो न ऐसा हुआ है कभी ? देखना आज उस वृक्ष को और बतलाना मुझे

Sunday, 10 June 2012

प्रेम गीत

जब भी कोई प्रेम गीत लिखना चाहती हूँ मैं
करके 2 पल आँखें बंद कल्पना में उतरती हूँ
तो एक स्त्री  और पुरुष की छवि उतर आती है आँखों में
एक दुसरे को प्रेम से देखते हुए ,पूर्ण समर्पण का भाव आँखों में भरे हुए
लगता है के इन की पूरी दुनिया सिर्फ एक दूजे से ही पूरी हो जाती है
किसी तीसरे का कोई स्थान नहीं है वहां ,और जरूरत भी नहीं
खुद में मग्न ,एक दूजे को सुख और स्नेह से भरने को सदा आतुर रहते है वो दोनों
इन दोनों को देखते ही मेरी कलम कसमसाने लगती है ,बेचैन हो उठती है प्रेम गीत लिखने को
मेरा हर प्रेम गीत के नायक और नायिका ये ही रहे है सदा 
और कैसा इतफाक है प्रिय ,के हम दोनों से काफी मिलती जुलती छवि है इन दोनों की
हुबहू हम से ही लगते है ये भी ...............

(अवन्ती सिंह )

Monday, 4 June 2012

लोथड़ा भर है बस

जिस्म में लहू की बुँदे भी है
और साँसों की धोकनी भी चल रही है निरंतर
धडक रहा है दिल भी ,तो लगता है के जिन्दा है इंसान
पर क्या बस इतने भर से जीवित कहलाया जा सकता है खुद को ?
संवेदनाये सुप्त हो चुकी ,मर चुकी है करुणा  और स्नेह की भावनाएं
सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोच रहा है ये पञ्च तत्वों से रचा खिलौना
तब जीवित होने के ये सब प्रमाण पत्र भी यकीन नहीं दिला पाते
के सच में जिन्दा है इंसान ,लगता है के मांस का चलता फिरता 
लोथड़ा भर है बस .......

Monday, 28 May 2012

मैं रहती हूँ इस देश की राजधानी में 
3 दिन से गन्दा बदबूदार पानी आ रहा है हमारे नल में ,शिकायत दर्ज़ करवाने पर पता चला के 7 दिन के अंदर आप की शिकायत पर अवश्य कार्यवाही की जायेगी , 7 दिन कोई बिना पानी के कैसे रह सकता है इस का जवाब किसी के पास नहीं ,दिल्ली का ये हाल है तो देश के बाकि हिस्सों का क्या होता होगा???

मेरा भारत महान .........

Friday, 25 May 2012

क्यूँ   रहती   है माथे पे शिकन    हर    वक्त     आप   के ?
थोडा    हँसा    कीजिये   जनाब थोडा   मुस्कराया कीजिये 

थाली में सजी है कई सब्जियों की कटोरियाँ और पकवान 
एक टुकड़ा किसी भूखे की तरफ   भी तो   बढ़ाया कीजिये 

आलिशान मकान में क्या रहने लगे भूल गए  गरीबी   का   दर्द 
कभी किसी की झोपडी पर फूस का छप्पर तो डलवाया कीजिये 

बच्चे आप के मुंह खोले तो खोल देते है पर्स ,  करते    है  हर  फरमाइश   पूरी   किसी मासूम के फैले हाथ पर एक सिक्का रखने में भी मत कतराया कीजिये 

हर गम हो   जायेगा   कौसों   दूर ,  सारी    फिक्रें     हो    जायेगी काफूर 
माँ   के   दुखते   पांवों    कभी     कभी        तो         दबाया      कीजिये 
(अवन्ती  सिंह )


 

Tuesday, 22 May 2012

कुछ ख़ास हुए बिना

हम रोजाना सुबह उठते है अपनी सभी दिनचर्या निभाते है अपने कामों में रिश्तों ,दोस्तों में उलझे रहते है कब शाम होती है कब रात पता ही नहीं चलता और दुसरे दिन जागने के लिए हम फिर से सो जाते है सोने से पहले अनेक बार ये विचार हम से के मन में कभी न कभी जरुर  आता है के कुछ खास दिन नहीं था बस यूँ ही गुजर गया ,मैं भी अक्सर ऐसे सोचा करती हूँ पर शनिवार को हुई एक छोटी सी घटना ने मुझे इस पर सोचने को  मजबूर किया ,हुआ यूँ के मैं सुबह सब के लिए टिफिन बनाने की तैयारी में लगी हुई थी मेरी बेटी को करेले को चिप्स की शेप में घिस कर फिर उसे तल कर बनाई सब्जी बहुत पसंद है तो सोचा साथ में वो भी बना लेती  हूँ,काफी दिन से एक नया कद्दूकस खरीदा हुआ रखा था  काफी तेज 3 इंच का तेज ब्लेड उस में अटेच किया हुआ है  ,मैं पुराने कद्दूकस से ही काम किया करती थी,अचानक मन में आया के नए कद्दूकस को निकला जाए   बस इस एक विचार ने पुरे परिवार की दिन चर्या ही बदल डाली ,उसे इस्तेमाल करते हुए कई बार लगा भी के ब्लेड का एंगल  काफी खतरनाक है इस में सोचती रही  के किसी और को तो इसे कभी उसे नहीं करने दूंगी शायद खुद की समझदारी पर ज्यादा ही भरोसा था मुझे आखिरी करेले को घिस ही रही थे के एक पल को वहां से ध्यान हट गया और ब्लेड को अपनी तेजी बताने का पूरा मौका मिल गया ,साधारण कद्दूकस  इस मामले में काफी उदार होते है कुछ खरोच लगा कर बक्श देते है पर इस ब्लेड का एंगल  इतना गलत था और ब्लेड इतना तेज  के मेरी ऊँगली के आगे के लगभग आधे इंच के हिस्से को काफी  गहरे तक साफ़ कर दिया बस गनीमत ये रही के वो हिस्सा ऊँगली से अलग नहीं हुआ ,मुझे समझने में में कुछ पल लगे के ये क्या हुआ जख्म को दबाए हुए बाहर  आई सब को बताया तो सब घबरा उठे खून ने तो न रुकने की कसम खा ली मैं  ऊँगली  को जोर से दबाए हुए बर्फ के पानी में हाथ डालती  भी न थी के कुछ ही पल में डोंगे का सारा पानी खून से भरा हुआ लगता है ,मन काफी घबराने लगा के अब तो टाँके ही लगेगे ऊँगली में ,मैं ने सुना है  उस में काफी दर्द होता है , लगभग 3घंटे  मैं ऊँगली को बर्फ के पानी में रखे रही और जोर से दबाए रही ,बीच बीच में देखती रहती थी के खून रुका या नहीं आखिर खून रुक ही गया,डॉ. की दूकान खुलने का वक्त भी हो गया था वहां जाकर इंजेक्शन लगवाया,डॉ। की  ये बाद सुनकर जान में जान आई के अभी इसे ऐसे ही चिपके रहने देते है यदि फिर से खून बहना न शुरू हुआ तो टाँके की जरूरत नहीं पड़ेगी  ड्रेसिंग करवाई ,और दवाएं लेकर घर वापस आई,उस दिन से हाथ की उपियोगिता भी समझ में आ रही है और ये बात भी के यदि सुबह से शाम तक जिस दिन ऐसे लगे के आज का दिन ऐसे ही बीत गया उस दिन भगवान् को धन्यवाद  भी करना चाहिए के कुछ ख़ास हुए बिना ही बीत गया ये दिन :) :) :)
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Thursday, 17 May 2012



जाने    कब    कागज़   की   प्यास      इतनी    बढ़ेगी 
के कलम आतुर हो उठेगी शब्दों की बरसात करने को 

जाने कब मन की    वेदनाएँ     होगी      इतनी     असहनीय ,के 
 मन ,मना कर पायेगा  समाज के उलझे-2 नियमों को  मानने से 

जाने कब करुणा का सागर ,सब तटबंधों को तोड़ कर खुद में समाहित कर पायेगा 
हर       दुखी ,     लाचार    को,    अपने     पराये     का     विचार     किये     बिना 

जाने कब ,प्रेम इतना उदार बन पायेगा ,के    हर    कमी    हर    गलती    को 
कर पायेगा नज़र अंदाज़ और खुद के अस्तित्व को रख पायेगा हर परिस्तिथि में बरकरार