Sunday, 2 December 2012

जीवन                                

स्वार्थी लोग
मतलब के रिश्ते
ये ही है  जीवन?

चलायमान  मन
भटकता  फिरे
तकता  रहे औरों
का जीवन

कड़ी मेहनत
तन पे  चिथड़े
दो सुखी रोटी
ये कैसा जीवन ?

रेशम है  तन पर
थाली में पकवान
असंतुष्ट है फिर भी
मन बेईमान,चाहे हमेशा
और उम्दा जीवन !




अवन्ती सिंह















Thursday, 29 November 2012

मन के नाजुक और सुंदर पौधे पर ,कल्पना के अनोखे रंगों से सजे शब्द जब मनमोहिनी सुगंध में ओतप्रोत होकर खिलते है और उस के पश्चात विचारों के पंखों को लगा कर  मखमली कागज़ पर हौले से उतर जाते है तब एक कविता निर्मित होती है !

Thursday, 6 September 2012

प्रेम और उपासना



एक पुरानी  रचना   (प्रेम और उपासना )

प्रेम और   उपासना   में   बहुत    अधिक  फर्क नहीं  है
बशर्ते के     दोनों      में   पावनता   हो,  पवित्रता  हो

प्रेम    को    उपासना     भी    बनाया   जा  सकता   है
और उपासना को प्रेम भी   बनाया    जा     सकता     है

जिस से प्रेम हो, मन से उस की उपासना भी की जाये 
प्रेम  की पराकाष्ठा   पर   पंहुचा   जा    सकता      है

और जिस की उपासना की जाये यदि उससे प्रेम भी किया जाये
  तो   परम     उपलब्धि      को  प्राप्त     किया    जा  सकता है

कितनी    मिलती     जुलती     है ना    दोनों     ही     बातें ?
प्रेम   में   अगर   वासना ना हो ,और   उपासना  में ईश्वर से
 कुछ   चाहना    ना    हो ,    कुछ    भी    मांगना     ना    हो

तो प्रेम ही     उपासना     है ,और उपासना    ही प्रेम है
नाम है   जुदा   जुदा    पर   अंततः     तो      एक     है  
( अवन्ती सिंह  )





 


Tuesday, 4 September 2012

अकेलापन

भटकती हुई रूहें है यहाँ,
अपने जिस्म को छोड़ कर
भटक रही है दर -बदर
तलाश रही है किसी साथी को
किसी अपने को ,जो दूर कर दे
अकेलेपन के अहसास को ....
पर हर साथी के भीतर पल रहा है
अकेलेपन का खौफनाक अहसास
वो अहसास कभी खत्म नहीं होता
न   भीड़ में  न   मेले में .....
क्या कोई राह नहीं जो खत्म कर सके
इस अकेलेपन के विषधर नाग को
है ,राह तो है पर उस पर हम चल ही नहीं पाते है
हम सदा अपने अकेलेपन को दूर करने की राह तलाशते है
पर हमे राह तलाशनी होगी औरों के एकाकीपन को दूर करने की
यदि हम कभी ऐसा कर पायें तो सच जानिए हमारा अकेलापन
स्वतः ही समाप्त हो जाएगा ,पर क्या हम कभी  इस राह पर चल पायेगे ???
कभी   खत्म   कर   पायेगे   किसी   के   अकेलेपन   को ?????

(अवन्ती सिंह )                             

Tuesday, 21 August 2012

वृक्ष आम का



सुना है तुम्हारे  कमरे की खिड़की के पास खड़ा है एक वृक्ष आम का
वो भर गया होगा अब तो बौर से
उस पर बैठ  कर कोयल भी कूका  करती होगी अक्सर
क्या उस की कूक  सुन कर कभी मेरी याद आती है?
कभी तेज हवाओं से उस वृक्ष के पत्ते  जब टकराते है आपस में
तो तुम्हे लगता नहीं के तुम्हारे कानों में मेरे बारे में कुछ बुदबुदा
रहे है ये पत्ते .....
और कभी बारिश में ,पत्तों पर पड़ी बूंदे  तुम्हे मेरी आँखों की चमक
की याद नहीं दिलाती ?
कभी तो उस वृक्ष की लहराती डालियाँ मेरी जुल्फों सी प्रतीत हुई होगी तुम्हे
कहो न ऐसा हुआ है कभी ? देखना आज उस वृक्ष को और बतलाना मुझे

Sunday, 10 June 2012

प्रेम गीत

जब भी कोई प्रेम गीत लिखना चाहती हूँ मैं
करके 2 पल आँखें बंद कल्पना में उतरती हूँ
तो एक स्त्री  और पुरुष की छवि उतर आती है आँखों में
एक दुसरे को प्रेम से देखते हुए ,पूर्ण समर्पण का भाव आँखों में भरे हुए
लगता है के इन की पूरी दुनिया सिर्फ एक दूजे से ही पूरी हो जाती है
किसी तीसरे का कोई स्थान नहीं है वहां ,और जरूरत भी नहीं
खुद में मग्न ,एक दूजे को सुख और स्नेह से भरने को सदा आतुर रहते है वो दोनों
इन दोनों को देखते ही मेरी कलम कसमसाने लगती है ,बेचैन हो उठती है प्रेम गीत लिखने को
मेरा हर प्रेम गीत के नायक और नायिका ये ही रहे है सदा 
और कैसा इतफाक है प्रिय ,के हम दोनों से काफी मिलती जुलती छवि है इन दोनों की
हुबहू हम से ही लगते है ये भी ...............

(अवन्ती सिंह )