Friday, 8 March 2013

प्रकृति और नारी




मैं हवा सी हूँ 

मुझे बाँध सके कोई 

इतनी बिसात कहाँ है किसी में 

बाँधने वाले को भी उड़ा  कर ले जा सकती हूँ 

किन्तु बंधी रहती हूँ सदा ,स्नेह की कच्ची डोरी से ....


मैं दहकती ज्वाला सी हूँ 

मेरा सम्मान करने वाले मुझे से जीवन पाते है !

करें जो अपमान, वो भस्म हो जाते है 

मेरे क्रोध की धधकती लपटों से .....


कल कल करते ,बहते नीर सी हूँ मैं ...

चाहु तो प्यास बुझा दूँ जग की 

अपने स्नेह ,अपनी ममता से 

चाहूँ तो ध्वस्त कर दूँ ,घर ,बस्ती ,सब  

किसी क्रोधित,उफनती  नदी की तरह ....


मैं धेर्य से टिकी धरा सी  हूँ ...

तुम्हारे हर कर्म को व्यवहार को 

चुपचाप सहती हूँ शांत रह कर 

पर जब टूट जाये बाँध धेर्य का 

तो मेरी जरा सी कसमसाहट 

भूकंप ला  सकती है,उथल -पुथल 

कर सकती है तुम्हारे मन को  ,जीवन को .....


अपनी विशालता में सब को समेटे 

असीमित आकाश सी भी हूँ मैं 

अपने स्नेह-जल को बरसा कर 

सब का जीवन पोषित करूँ 

नव-जीवन का संचार् करूँ 

पर यदि बढ़े  तुम्हारे मन का प्रदुषण 

तो हो कुपित ,बिजलियाँ गिरा  कर 

दुष्टों का संघार करूँ ........


(अवन्ती सिंह आशा )  











Thursday, 24 January 2013

सिर्फ चर्चा और बातें


आओ करें बाते राजनीति और मौसम  पर
चर्चा करें समाज में  हो  रहे  परिवर्तन पर! 

 बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर,आम के आचार पर 
बदलती नीतियाँ और बदलते संस्कार पर! 

रेल पर, खेल  पर,  महंगे  होते   तेल  पर 
कुश्ती के दंगल पर,खत्म होते जंगल पर !

बाघों के शिकार पर ,हिरणों की हत्या पर 
करें  खूब   चर्चा ,  झूठ  और   सत्य  पर !

सडक के किनारे ठिठुरते कुछ बच्चों पर 
कभी बुरे लोगों पर और कभी अच्छों पर !

गीता के ज्ञान पर, धर्म  और  विज्ञान पर 
वहशी और इंसान पर ,औरों के ईमान पर !

क्या इन  चर्चाओं   से   कुछ बदल पायेगा 
कुछ ठोस करने को कदम कब उठ पायेगा! 

कुछ ठोस काम करने की सरकार की जिम्मेदारी है 
हम करेगे  चर्चा ,   हमे   चर्चा     की    बीमारी  है !

Wednesday, 9 January 2013

एक पुरानी रचना



भेड़ की खाल  में  कुछ   भेड़िये   भी  बैठे  है 
लिबासे इंसान में कुछ  जानवर   भी  बैठे है  

शर्मो ह्या को बेच  आये  है जा  के  बाज़ार  में
और कुटिल मुस्कान चेहरे पर सजा कर बैठे है 


घर की बहन बेटियों को भी  आती  होगी  शर्म इन पर 
जो दिखावे को ,   कई राखियाँ  बंधा    कर   बैठे   है 

जायेगे जब दुनिया से ये, लेगी राहत की साँसे धरती भी 
जाने कब से उस के आंचल को, ये  पाँव तले दबा कर बैठे है



Wednesday, 19 December 2012


स्त्री होना ही सर्व नाश का कारण बना शायद
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उस बच्ची की आंते निकाल दी गयी आपरेशन  कर के
ताकि उन में फ़ैल चुका 'गैंगरीन ' न ले ले उस की जान
पर जान बची कहाँ है उस में ,वो तो लाश भर है बस अब
उन अरमानों की लाश ,जो उस के माता पिता ने देखे होगे
उसे पराये शहर में पढने भेजने से पहले .......
उस के खुद के सपनों की भी लाश है वो ,वो चाहती थी
कंधे से कन्धा मिला कर चलना इस पुरुष प्रधान समाज में !
किस बात की सजा मिली  है  उसे ,  एक   स्त्री   होने    की ?
कुछ नर पिशाचों ने उस की अस्मत को कुचल कर
उस के जिस्म को बेरहमी से खत्म करने की कोशिश की क्यूँ??
क्यूँ की उन के लिए वो महज़ एक भोग की वस्तु भर थी
नहीं वो भोग-वस्तु नहीं थी वो इस समाज का एक अहम हिस्सा थी
वो किसी की बहन थी बेटी थी वो एक पत्नी और माँ भी हो सकती थी
यदि उस के शरीर को यूँ कुचल न दिया गया होता बेरहमी से
कितना जी पायेगी वो आधे अधूरे शरीर के साथ?
जितना भी जिए पर उस का जीवन सिर्फ एक प्रश्न चिन्ह  पर ही अटका रहेगा सदा
के क्या गलती थी मेरी जो ये सब हुआ ?महज़ स्त्री होना ही तो इस सर्व नाश का कारण रहा है शायद
कन्या भ्रूण हत्या ,बलात्कार ,दहेज़ के लिए उत्पीडन ,क्या ये सब ही  स्त्री की नियति है ????
जरुर है आत्म मंथन की इस समाज को ,तलाशने होने इस प्रश्न -चिन्ह के जवाब
सिखाने होगे संस्कार अपने बेटों को भाइयों को ,संस्कार ही एक इंसान को इंसान बने रहने में मदद करते है
वरना पशुता की तरफ गया मनुष्य क्या कर  सकता है ये हम देख ही रहे है

Tuesday, 18 December 2012

फांसी दो बलात्कारियों को !


बलात्कार एक ऐसा अपराध है जिसकी जितनी भी सज़ा दी जाए कम है !
इस तरह की घटनाएँ किसी की भी बहन या बेटी के साथ हो सकती है 
दिल्ली में अभी हाल ही में फिर इस तरह की घटना का होना बताता है के 
इन लोगों पर कड़ी कारवाही जब तक नहीं की जाएगी तब तक ऐसे लोगों में 
भय उत्पन्न नहीं होगा और ऐसी घटनाएँ कम नहीं होगी ! सरकार को इस 
दिशा में कड़े कदम उठाने चाहिए और फांसी  से कम सज़ा नहीं होनी चाहिए 
ऐसे लोगों को, किन्तु हम सब समाज का एक हिस्सा है और इस नाते हमे 
अपने कर्तव्य को नहीं भूलना चाहिए इन लोगों को समाज से बाहर किया जाना चाहिए 
इन सब के परिवारों पर भी समाज का दबाव होना चाहिए के ऐसे लोगों के लिए परिवार 
खुद सज़ा की मांग करे ,मैं सब ही साथियों से अपील करती हूँ के आइये हम सब भी मिल कर 
बलात्कारियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करे ,पुरे एक सप्ताह तक सिर्फ इस विषय पर ही अपने लेख/कवितायेँ   या जो भी लिखना चाहे केवल इस ही विषय पर लिखे ,हम सब के घर में भी मासूम बेटियाँ और बहने है 
जो बहन इस दरिंदगी का शिकार हुई है क्या वो हमारी बहन या बेटी सी नहीं है ?यदि आप हो ऐसा लगता है तो जरुर इस अभियान में साथ देगें 

Sunday, 2 December 2012

जीवन                                

स्वार्थी लोग
मतलब के रिश्ते
ये ही है  जीवन?

चलायमान  मन
भटकता  फिरे
तकता  रहे औरों
का जीवन

कड़ी मेहनत
तन पे  चिथड़े
दो सुखी रोटी
ये कैसा जीवन ?

रेशम है  तन पर
थाली में पकवान
असंतुष्ट है फिर भी
मन बेईमान,चाहे हमेशा
और उम्दा जीवन !




अवन्ती सिंह















Thursday, 29 November 2012

मन के नाजुक और सुंदर पौधे पर ,कल्पना के अनोखे रंगों से सजे शब्द जब मनमोहिनी सुगंध में ओतप्रोत होकर खिलते है और उस के पश्चात विचारों के पंखों को लगा कर  मखमली कागज़ पर हौले से उतर जाते है तब एक कविता निर्मित होती है !