Sunday, 18 December 2011

बताये कोई तो

 बताये कोई तो ये क्यूँ  इन्सां   का  दिल,    दिन     बदिन      छोटा       हुआ      जाता     है
खुदा ने  बनाया तो  खरे  सोने  का था,मिलावट  तुम ने की है, जो   ये खोटा  हुआ    जाता है 

ये तेरा   ये  मेरा ,  ये   अपना     पराया,   बच्चों    को    हम     ने    बस     ये    ही  सिखाया
बचपन में फ़रिश्ते सा था,   उम्र   बढ़ते-2 , वो  वहशी   हुआ  जाता है ,दरिंदा   हुआ   जाता  है 


अब मेरे    शहर की   गलियाँ  सूनी  हो  जाती    है शाम ढलती  ही,खामोशी सी   छा जाती है
कभी अंगीठियाँ जला के तापते थे देर रात तक गलियों में,वो सब,अब    सपना हुआ जाता है  

सांझे चूल्हे  ,  कुवे,  तालाब,आम के बाग़,  हम ने देखे है, उन्हें रूह से   महसूस   भी   किया  है
बच्चों को किस्से भी सुनाये तो, ये सब क्या चीजे होती है ये समझाना , मुश्किल हुआ  जाता है  



ठहर जा  ऐ  इन्सां  रुक जा ,   बस कर ,   इतनी    तरक्की   तो   काफी  है   ना    जीने    के लिए 
ऐसा ना हो तू इतना पा जाये के घुटे दम,कहे इन सब के बीच सांस ले पाना मुश्किल हुआ  जाता है 

(अवन्ती सिंह )
 

Friday, 16 December 2011

अत्याचार

जब मैं ने रचनाये लिखना शुरू नहीं किया था ,उससे पहले भी मन में कविताये नृत्य किया करती थी पर काम में इतना व्यस्त रहती थी के खुद के लिए भी वक्त नहीं निकाल पाती थी ,फिर कविताये लिखना तो बड़ी दूर की कोडी थी,पर जब ये अहसास हुआ के इन्हें यूँ ही बेकार नहीं जाने देना चाहिए लिखना शुरू करना चाहिए तो उस वक्त की अपनी भावनाओ को आप सब के साथ एक कविता के माध्यम से बाँट रही हूँ ......

                      
अब मैं इन कविताओ पर अत्याचार नहीं कर सकती हूँ 
इन को ऐसे व्यर्थ  और  बेकार नहीं  कर  सकती  हूँ
कई वर्षो तक मैं ने इन्हें कागज़ नसीब होने न दिया
क्रमबद्ध इन्हें किया नहीं,सपना कोई संजोने न दिया 
लेकिन अब मैं ये सौतेला व्यवहार नहीं कर सकती हूँ 
अब मैं इन  कविताओ पर.................
नव जीवन के अंकुर अब इन कविताओ से फुटेगे
छंद -बंध की परिधि में,शब्दों का नृत्य चलेगा अब 
भावनाओ के रंगों  से  हर पन्ना   खूब   सजेगा     अब 
इन्तजार कुछ दिन तो क्या,पल दो चार नहीं कर सकती हूँ  
अब मैं इन  कविताओ पर................
हृदय -वीणा की  धुन  पर अब   कविता  मल्हार    सुनायेंगी
गीत  ख़ुशी  से  नाचेगे, गजले  थम    थम    मुस्कायेगीं 
अब अपने मन  से,  मैं  अधिक तकरार नहीं कर सकती हूँ 
अब मैं इन कविताओ पर ...............

Thursday, 15 December 2011

इन गीली गीली राहों पर, मैं कभी-2 यूँ ही दूर तलक चला जाता हूँ

बीते वक्त के पन्नों  को,   खोलता हूँ,   पढ़ता   हूँ,   मुस्कराता   हूँ


जब तुम मेरे साथ इन राहों पर चली थी, तो हवाएँ, फिजायँ अलग
थी, भली थी.............


वो मेरे  साथ   तुम्हारा   यूँ   ही चलते जाना, हँसना  ,खिलखिलाना
रूठ जाना और फिर से मुस्कराना....


वो पेड़ों की डाली  से   अठखेलियाँ    करना, कुछ   कलियाँ   चुनना
बालों में सजाना....


लगती हो सुंदर   अगर   मैं   ये   कह   दूं     तो   हया   की लाली का
गालों पर आना.....


वो सारे    पल,     इन    राहों   ने   अपने   दिल  मे   छुपा कर रखे हैं


सुकून     और    शांति के वो   पल,  कुछ और   नहीं,  आलेख रखे हैं


मैं दूर    तक    जाकर      उन   पन्नों    को    पढ़    कर     आता   हूँ


आश्चर्य     है!   उन   पन्नों   की   स्याही      को        मैं   आज    भी
गीली और ताज़ा पाता हूँ.......


(avanti singh )

Sunday, 11 December 2011

मिल कर ढूंढे

मिल कर ढूंढे  वो   सूरज   जो,   अंतस     में     उजियारा     भर   दे 
अँधियारा  मन का  हर ले  जो,   आत्मा  को  पूर्ण   प्रकाशित  कर दे 


लायें   ढूंढ़  कर   वो   बहारें   जो ,हर  एक   डाली    को      हरित  करें
हर डाली पर सुख  की कलियाँ  हो,   हर   पेड़    संतोष    के    फल  दे 


सागर से कहें ,वो बादल गढ़,  जो   स्नेह    का   जल    बरसा     जाये 
वो स्नेह  बहें   हर  एक  मन में  और   कटुता    को    पिघला    जाये


एक नया चाँद   भी    लाना   है   जो, नव-रश्मियाँ   हम  तक  पहुचाये 
हर मन   में   प्रीत   का   ज्वार   उठे , जग   प्रीत   भवर   में  खो  जाये 













Friday, 9 December 2011

ग़ज़ल



ज़िन्दगी तेरी तल्खी गर शराब जैसी है ,
प्यास मेरी कब कम है, बेहिसाब जैसी है .

सच तो ये है जानेमन हम भी एक हस्ती हैं ,
हाँ मगर यह हस्ती भी बस हबाब  जैसी  है .

होश में या नश्शे में कर तो ली थी कल तौबा,
आज फिर मेरी नीयत  क्यूं  खराब जैसी है ?

प्यास है या बेजारी क्या है जो उन आँखों में
अब सवाल  जैसी है , अब  जवाब  जैसी  है .

फिर वह आग सी ख्वाहिश , फिर तड़प वह मीठी सी
वह    जो   रेग   लगती   है ,वह   जो   आब   जैसी  है .
    
सर्वक़द      इरादे    भी       इससे     हार     जाते    हैं
प्यास   मेरी    आँखों   की       शहरेख्वाब    जैसी   है
              ( हबाब = बुलबुला )    .
            
                ( रेग = गर्म   रेत)
                    ( आब = शीतल  पानी ) 
   (सर्व्काद = बहुत ऊंचे ; शःरेख्वाब =सपनों का नगर )

                  अखतर किदवई

Wednesday, 7 December 2011

नव गीत का निर्माण

तुम   यूँ     ही   मुस्कराते     रहो     मेरे     सामने    बैठ कर 
मैं   प्रीत    से   भरे     नव    गीत      का       निर्माण      करूँ  

तुम  अपने   मन   की    मधुरता    बिखरते   रहो       यूँ    ही
मैं   उस    मधुरता    से     अपने     गीतों    में      प्रेम     भरूं

अपनी आँखों  की  चमक   मुझ      तक    ऐसे   ही   पहुचने  दो
समेट कर उसे ,उस से मैं शब्दों   के  लिए    कुछ      गहने   गढ़ूं   


तुम्हारे  प्रेम   की   महक,  जो घेर रही  है  मुझे   चारों   और  से 
इस से   ही  तो   महकेगी   मेरी   ये बिना   सुगंध   की   कविता

अभी मत उठो यहाँ  से, रुको  क्या   तुम     अब   तक   नहीं समझे , 
तुम्हारे होने से ही तो बह रही है मुझ में से छन्द और बंधों की सरिता  


लो तुम हो जाने को  बेकरार  इतना ,तो   मैं   कविता   को   पूर्ण   करती   हूँ
तुम्हारे होने से इसे लिख पाई हूँ सो इस का पूरा श्रेय तुम्हे समर्पित करती हूँ 










खुदा ने जब तुम्हे बनाया होगा ...

चाँद   से  नूर    थोडा,  खुदा   ने     उठाया   होगा 
जब तुम्हारे जिस्म की   रंगत  को  बनाया होगा  

टिमटिमाते दो तारे  रख दिए  आँखों में तुम्हारी 
और काली घटाओं से, बालों को   बनाया   होगा 


होठ  ऐसे  के,  लगे   नाजुक  पंखुड़ी कमल  की हो 
कमल की पखुडिया वो    कैसे   तराश  पाया होगा 


इतने  तीखे  नयन -नक्श  बनाये   होगे   जिससे 
उस  औजार को वो जाने  कहाँ    से    लाया   होगा 


जिस्म   ऐसा,  जैसे   नदी  गिरती हो उठ जाती हो 
नदी   को   सांचे   में,  वो   कैसे ढाल   पाया   होगा


चाँद   से     नूर    थोडा,    खुदा   ने   उठाया   होगा 

जब तुम्हारे जिस्म की रंगत   को   बनाया   होगा 



( चित्र साभार -गूगल इमैज )