Wednesday, 1 February 2012

नादान फूल





फूलदान   में  मुरझाने   ही  वाले  है  जो, वो  फूल

वो मुझे कह रहे है  बार-२,  के  तुम  चले   गए हो

मैं उन्हें झिड़क देती हूँ पागल और नादान कह कर

अगर   तुम  चले   गए  होते   मुझ   से  दूर   कहीं 

तो    मेरी   पलकें     झपकना    ना   भूल    जाती

बंद ना  हो  गयी  होती  मेरी  आँखों  की  हलचल?


मेरे होठों  की  गुलाबी  रंगत  पर  गम  की स्याही

ने   कब्ज़ा  ना   कर  लिया   होता     अब   तक ?

दिल   धडकने   से   मना   ना   कर   चुका होता 

साँसें      थम     के   खड़ी   ना   हो   गयी   होती 

तुम्हारे   जाने   की    गवाही    देने    के   लिए ?

ऐसा     तो   कुछ      भी     नहीं    हुआ    है ना  ?

फिर कैसे सच मान लूँ मैं इन नादान फूलों की बात 

मेरा  होना  ही सुबूत है  तुम्हारे   ना   जाने  का ......






(अवन्ती सिंह )

Sunday, 29 January 2012

सख्त मना है

 कविताए दिमाग़ मे कभी भी अंकुरित होने लगती है
मेरे मन मे ये विचार कई बार आता है के जब मैं ही कविताओं के असमय प्रकट
होने से परेशानी मे पड़ जाती हूँ तो फिर उनका क्या हाल होता होगा जो निरन्तर
लिखते रहते है,उन के हालत की   कल्पना   करके   मैं    ने   ये   कविता लिखी है
इस रचना मे  कविताओं को बेवक्त  दिमाग़   मे ना  आने की   हिदायत   देते हुए

 उनके बेवक्त आने के कारण होने वाली परेशानी से रूबरू करवाने की कोशिश की
है ताकि वे वक्त देखकर  दिमाग में  आया करें  ...........


                सख्त मना है 

 

बाद  शाम  के,  मेरे   घर  मे    आना    सख़्त   मना  है


ग़ज़लो और कविताओ तुम को   गाना   सख़्त मना  है


बाद शाम के तो मैं गीत पिया-मिलन के गाने लगती हूँ


आँखे   राह   पर    होती   है,  श्रृंगार  सजाने   लगती  हूँ


लिखने मे कविता देर हुई ये बहाना बनाना सख़्त मना है!


बाद शाम के,   मन-पंछी   उड़   उड़   खिड़की  पर जाता है


आएगे   वो   अब   आएगे,   ये   मधुर   संदेश   दोहराता है


इस संदेश को सुनकर भी, ना   सुन   पाना   सख़्त  मना है


बाद शाम के........


बाद शाम के कान   हर  एक  आहट  सुनते  रहते  है


पिया-मिलन नज़दीक है,पल पल ये मुझ से कहते है


उस आहट को सुन कर भी,ना सुन पाना सख़्त मना है


बाद शाम के.........


बाद    शाम    के   जब   साहब   थक   कर वापस   आते  है


हम भी     आख़िर   इंसान   है,   हंसते       है   मुस्काते    है


उस हास्य-विनोद का,किसी को भी सुन पाना सख़्त मना है


बाद     शाम    कें   मेरे  घर    मे    आना    सख़्त    मना  है.




पुरानी रचना 
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अवन्ती  सिंह 
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आप सब नए ब्लॉग पर सादर आमंत्रित है 
 गौ वंश रक्षा मंच gauvanshrakshamanch.blogspot.com

इलायची

काफी वक्त पहले एक परिचित ने ये बात मुझे बताई थी,मैं अक्सर इस का प्रयोग करती हूँ,खुद पर और जिन्हें भी उदास देखती हूँ उसे जरुर कहती हूँ तो  आज आप सब के साथ भी ये राम बाण नुस्खा शेयर कर रही हूँ ,जब भी उदासी लगे इलायची चबाना शुरू कीजिये ,कई लोगों को ज्यादा उदासी हो जाती है तो वो एक के बाद एक इलायची चबाये ,और जब भी ऐसे लगे इस क्रम को दोहराए ... उदासी भाग जाएगी और मन में नई उर्जा का संचार  होगा .आजमा कर  देखिये ......



Saturday, 28 January 2012

कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्रकार थी....हरियाणा के मेवात में गौ हत्या रोकने के अभियान के अंतर्गत मुस्लिम समुदाय द्वारा 'संकल्प इण्डिया' के सहयोग से १५० ,००० गाय पाली जा रही है .........

कितना सराहनीय कार्य है ये हमे उन सब मुस्लिम  भाइयों का दिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए ..... 

तथा अन्य मुस्लिम भाइयों से भी अपील करनी  चाहिए के  आप हमारे साथी/मित्र  और एक ही देश के वासी होने के नाते हमारी माँ (गौ माता) को अपनी माँ की नज़र से देखे ,यदि ऐसा न कर पाए तो ये ही सोच ले के ये मेरे किसी हिन्दू मित्र की माँ के समान है ,तो फिर आप कभी गौ मॉस का सेवन नहीं कर पायेगे .... आप से करबद्ध विनती .....हमारी माँ के प्रति अपनी संवेदनाये जगाए ..........http://gauvanshrakshamanch.blogspot.com/

गौ वंश रक्षा मंच: कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्र...

गौ वंश रक्षा मंच: कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्र...: कई दिन पुरानी एक खबर पढ़ कर ख़ुशी हुई....खबर इस प्रकार थी....हरियाणा के मेवात में गौ हत्या रोकने के अभियान के अंतर्गत मुस्लिम समुदाय द्वारा '...

Friday, 27 January 2012

गौ वंश रक्षा मंच:  गौ रक्षा मंच गौ रक्षा एक ऐसा विषय है जिस के साथ ...

गौ वंश रक्षा मंच: गौ रक्षा मंच
गौ रक्षा एक ऐसा विषय है जिस के साथ ...
: गौ रक्षा मंच गौ रक्षा एक ऐसा विषय है जिस के साथ गम्भीरता से जुड़ने की ,कुछ करने की बहुत आवश्यकता है ,ये ही सोच कर इस मंच का निर्माण किया गय...

Tuesday, 24 January 2012

सिवा तुम्हारे

तुम कब तक नकारते रहोगे मुझे 
मेरे उस अस्तित्व को ,जो कब का 
तुम में विलीन हो चूका है ......
और तुम मेरे होने ,न होने को सिर्फ
मेरे जिस्म की उपस्तिथि से आँक रहे हो 
झांको खुद में ,और देखो ,मैं तो तुम्हारे 
हृदय के सिघासन पर विराजमान हूँ 
और तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व ने स्वीकार 
कर लिया है मेरे साम्राज्य को ....
सिवा तुम्हारे..........

(अवन्ती सिंह)