Tuesday, 21 April 2015

हम आत्मा है ये मानने या जानने से क्या लाभ



ये मानने से हमारा पूरा जीवन बदल जाता है ,हमारा नज़रिया और मनुष्यों के लिए और जीवन के प्रति भी बदल जाता है ,हम खुश रहते है और ख़ुशी बाटते है ,हम अपने जीवन में शांति और ख़ुशी दो चीजे ही तो चाहते है और इस के लिए उम्र भर जद्दोजहद करते है पर सही राह नहीं चुनते और कुछ हाथ नहीं लगता ,पहले खुद को जाने समझे फिर जीवन को जीये !

कुछ सौ साल पहले हमारी शिक्षा की शुरुआत ही इस बात से की जाती थी की हम आत्मा है और इस पञ्च -भूत के शरीर में हमारा आना ,जीवन को जीना और शरीर की उम्र पूरी होने पर इसे त्याग नए शरीर की तरफ प्रस्थान करना ये सब ईश्वर द्वारा रचे इस सृष्टि मंच / रंग -मंच का एक कभी न रुकने वाला नाटक है ,हमे जो रोल मिला है जिस शरीर में जिस हालत में ,उसे पूरी ईमानदारी से  सब का ध्यान रखते हुए जीना ,ये ही हमारा धर्म है  ! धर्म की ये बड़ी ही सहज और सरल परिभाषा थी जो की समय के साथ बदलते हुए काफी विकृत हो चुकी है !


आत्मा क्या है ?
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आत्मा एक ऊर्जा पुंज है ,सकारात्मक ऊर्जा पुंज ( पॉजिटिव एनर्जी )

ये ऊर्जा पुंज एक असीमित और अनन्त ऊर्जा पुंज का अंश है अर्थात परम +आत्मा का अंश !

परमआत्मा हमारा निर्माता /रचेता /परम पिता है हम उसे अनेक नामों से पुकारते है !

परमात्मा की शक्ति असीमित है अनन्त है पर हमारी शक्ति सीमित है ,हमे खुद को रिचार्ज करते रहने की जरूरत होती है जैसे मोबाईल वगैरह को चार्ज किया जाता है ,हम चार्ज होते है पॉजिटिव एनर्जी से !

यदि हमे अपने आस पास के लोगों से पॉजिटिव एनर्जी मिलती रहे तो हम खुश ,सुखी और शांत रहते है !
सृष्टि चक्र के आरम्भ में जब सतयुग और त्रेता युग थे तब पॉजिटिव एनर्जी की कमी नहीं थी ,जब तक ये ज्ञान भी था के हम आत्मा है ,जैसे जैसे ये ज्ञान लुप्त होता गया हम देह -अभिमानी होते गए ,पंच -विकारों में फसते  गए और दुःख और अशांति के शिकार बनते गए भौतिक पदार्थों में सुख तलाशने लगे ,अगर उन में सुख शांति होते तो कलयुग में जितने भौतिक सुख है उतने किसी युग में नहीं होते पर मानव इस युग में ही सब से ज्यादा दुखी क्यूँ है ? 

भौतिक वस्तुएँ सुविधा तो दे सकती है सुख नहीं दे सकती ! शांति तो कभी नहीं दे सकती ! फिर सुख शांति हम कहाँ तलाशे ? उसके लिए अपने मूल में वापस जाना होगा ,हम परम आत्मा का अंश है आत्मा है पॉजिटिव एनर्जी है उसी से हम बने है उसी से हम चार्ज होते है हमारी शक्तियाँ उसी से बढ़ती है और सुख शांति भी हमे वहीं से मिलेगा ! 

क्या करें 
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जैसे हम आत्मा है वैसे ही अन्य सब को भी आत्मा जाने ,जिसे भी देखे याद करें ये भी आत्मा है मैं भी, हम एक परमात्मा का अंश है कोई छोटा नहीं बड़ा नहीं ,जब उसे अपना जानेंगे तो उसके लिए प्रेम और स्नेह के भाव मन में आयेगे ,पति पत्नी ,माँ बच्चे ,बहन भाई के लिए प्रेम आता है न ? जब वो भी हमारे है एक अंश है तो प्रेम /स्नेह मन में आएगा ही ,ये प्रेम /स्नेह /दया /करुणा  ये पॉजिटिव एनर्जी का काफी निर्माण करते है ,जैसे ही हम दूसरों के लिए पॉजिटिव सोचना शुरू करते है हमारी चार्जिंग भी साथ साथ शुरू हो जाती है ,किसी से स्नेह करें ,करुणा वश या दया से कुछ काम करें तो पहले ख़ुशी हम पते है और सामने वाला बाद में ख़ुशी पाता है ऐसा होता है न? 
तरीका हमे मिल गया ,पॉजिटिव रहें ,खुशियाँ बाँटें ,मुस्कान बाटें ,औरों की कमियों को नहीं खूबियों को देखें और खूब खूब पॉजिटिव एनर्जी औरों को दें साथ ही खुद भी पाएं !

आसपास के लोग बुरे है गलत है हमारी गलती निकलते है ,कमियां देखते है तब क्या करें और कहना आसान ऐ पॉजिटिव रहो पर अधिक देर रह ही नहीं पते तो क्या करें ? ये सब अगली पोस्ट में बात करेंगे !
इतना सब लिखा मेरा हौसला बढ़ाने के लिए क्या कुछ पॉजिटिव किया जा सकता है सोचियेगा :) सोचना क्या है पोस्ट शेयर करें ,अपनी राय दें ,सुझाव दें 

Monday, 16 March 2015

हमारे अन्नदाता की खराब हालत के कुछ जिम्मेदार हम भी है ?

हमारा जीवन किसानों के साथ परोक्ष रूप से ही नहीं प्रत्यक्ष में भी जुडा हुआ है ,हमारी रसोई में अन्न ,सब्जी फल पहुचता किसी भी माध्यम से हो किन्तु उसे जीवन देने वाला तो किसान ही है यदि किसान न हो तो हम कहाँ से लायेगे ये सब ? पर हम लोग क्या अपने अन्नदाता किसान के बारे में जरा भी सवेदन शील है?  आज का किसान कितना परेशान है क्या आप ये जानते है ? आइये पहले ये ही समझ लें
 किसान , अन्नदाता भी कहा जाता है उसकी हालत और इज्जत ५० और ६० के दशक में आज से बहुत बेहतर थी ,आज़ादी की लड़ाई में भी सब से  अधिक आर्थिक योगदान  भी किसानों का ही था ! आज़ादी के बाद सब के हालत सुधरे किन्तु किसान को तो मानो हाशिये पर ही धकेल दिया गया !  किसान जो फसल अपने खून पसीने से सींचता है उस का मूल्य वो स्वयं निर्धारित नहीं कर सकता ! उसे जो मूल्य मिलता है उसे से उसकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है के अगली फसल के लिए उसकी जेब में पैसे ही नहीं होते और उसे क़र्ज़ लेना पड़ता है ! उसके लिए निर्धारित यूरिया / खाद / कीटनाशक जिन पर सब्सिटी   मिलती है उस तक न पहुँच कर बाजार में ब्लैक में बेच दिया जाता है और किसान उसका दोगुना मूल्य चूका कर अपने खेतों में डालता है ,महंगे दाम पर बीज मिलते है ,जैसे तैसे बेचारा किसान अपनी फसल को बोता  है और जब उसे  लगता है अब कुछ ही दिनों में फसल पकने वाली है तो अक्सर बेमौसम बरसात /आंधी /तूफान /बाढ़ /और सूखे के कारण वो कभी आधी तो कभी पूरी फसल खो देता है ! सरकार की तरफ से घोषित  सहायता राशि उस तक पहुंच ही नहीं पाती ! वो असहाय है कुछ कर नहीं पाता ,  पर हम लोग लोग तो इतने असहाय नहीं है ,जिसके हाथ का अन्न खाकर जीवित है ,उसकी मुसीबत में हम उस के कभी काम आए है ? हम लोगों के पास माध्यम है सोशल मिडिया यदि हम लोग चाहें तो किसी भी मुद्दे को इतना उठा सकते है के सरकार मजबूर हो जाती है उस  मुद्दे पर काम करने के लिए ! हम कितना सोचते है इस विषय पर कितना लिखते है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता के इस विषय पर हम सब साथ मिलकर लिखें? कोई ब्लॉग या कोई पेज़ ऐसा बनाएं जिस पर गंभीरता से लिखा जाएँ और ऐसे लिखा जाये के सोई सरक़ार  की आँखें खुल जाएँ ,किसानों से उनकी मर्ज़ी के बिना ज़मीन लेना ये विषय भी उठाना चाहिए ,विकास इतना भी नहीं हो जाना चाहिए के खेती की ज़मीन खत्म हो जाएँ और हम और देशों से अनाज माँगा कर खाएं,प्लीज़ इस पर गंभीरता से सोचें


Monday, 2 March 2015

कर्पूर  या कपूर
हम भारतीय इस नाम से भली भांति परिचित है ,पूजा में कपूर का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान होता है
इसे कई तरह की दवाइयों में ,बाम इत्यादि में भी काफी   इस्तेमाल किया जाता है!

ये जीवाणुओं का नाश करने में काफी कारगर होता है ,जुकाम  या वायरल जो की हवा या छींकने -खाँसने से फैलते है उन्हें समाप्त करने में इसकी सहायता ली जा सकती है ! आज कल फैल रहे स्वाइन फ्लू में भी इसका उपयोग काफी हद तक उपयोगी है काफी लोग कर्पूर की छोटी से पोटली बनाकर साथ रखते है और भीड़भाड़ वाले इलाके में इसे सूंघते रहते है ,यदि  कीटाणु हमारी साँसों तक पहुंच भी जाता है तो इसकी गंघ उसे मार डालती है ,बच्चों के स्कुल बैग पर भी मलमल के कपड़े की पोटली बनाकर उसमे कुछ टुकड़े कर्पूर रख दें,जिससे के उसके आस-पास इसकी गन्ध फैलती रहे ,ऑफिस जाने वाले लोग भी अपने साथ ये छोटी से पोटली  लेकर जाये अपनी मेज़ पर या आस पास किसी भी स्थान पर रख दे  , अपने घर के दरवाजे पर भी ऐसी पोटली बंधने से घर में कीटाणु का प्रवेश  कम होगा !

मच्छर नाशक

मच्छर को भगाने में भी इसका उपयोग काफी सहायक होता है ,गर्म पानी में इसकी एक या २ टिकिया हर एक घंटे में डालते रहे मच्छर काफी कम आयेगे एयर इसकी महक नुकसान भी नहीं करेगी !

अधिक मात्रा में कर्पूर सूंघने से नींद या हलकी बेहोशी भी आ सकती है इसलिए इसका इस्तेमाल सावधानी से करें ! पूजा का कपूर या देशी कपूर ही सूंघने में इस्तेमाल करें कपड़ों में रखने वाला कपूर न सूंघे उसे घर में रखा जा सकता है

Friday, 27 February 2015

बचाव ही सावधानी है !

समाज में सोये हुए लोगों की भीड़ कुछ बढ़ सी गयी है !१००० लोगों का स्वाइन फ्लू से मर जाना इसका एक प्रमाण है ,थोड़ी सी जागरूकता इन लोगों को बचा सकती थी ,सोचिये यदि इन के चेहरे पर मास्क लगा होता,घर आकर ठीक से हाथ मुह धोये होते तो किसी बहन का भाई किसी माँ का बेटा आज उसके साथ होता,क्या हम भी इस गुनाह के भागीदार है ? क्या हम ने अपना योगदान दिया जागरूकता फ़ैलाने में ? यदि नहीं तो अभी भी इस कार्य को किया जा सकता है,ये खबरे टीवी चैनल अब काम दिखा रहें है ,पर जितनी भी खबरें इस विषय में आ रही है उससे ये ही समझ आ रहा है के बीमारी लगातार बढ़ती जा रही है ,हम लोगों की उदासीनता का ये असर न हो के गुजरात की तरह पुरे भारत में धारा 144 लगानी पड़े सरकार को ! इसे एक अभियान की तरह लें, कमर कस  लीजिये जागरूकता लाने में! सावधानी 


Thursday, 26 February 2015

भारत का राष्ट्रीय वृक्ष

भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद है ! बरगद को अक्षय वृक्ष भी कहा जाता है ,बरगद में एन्टीऑक्सीडेंट काफी पाये जाते है इस ही कारण वृद्धावस्था के कई रोगों में इसका उपयोग किया जाता है ,इस की कोमल जतए पीस कर चेहरे पर लगाने से झुर्रियां समाप्त होती है ,मूत्र विकार,दांतों का हिलना ,दर्द इत्यादि में इसका खूब इस्तेमाल होता है ,किसी भी प्रकार के घाव को भरने के लिए इसके पत्तों को गर्म करके बंधने से लाभ होता है इसकी पत्तीओं को सुख कर चूर्ण बना ले और शहद के साथ नित्य प्रति सेवन से याददाश्त बढ़ती है ,नित्य प्रति,इस पर जल चढ़ाने से हमारे अनेक संकट दूर होते है ,घर के आस पास या मंदिर में ,पार्क में इस  वृक्ष अवश्य लगाएं, तथा औरों को भी प्रेरित करें ! 

Monday, 23 February 2015

कुछ शेर

कुमार विश्वास की कलम से निकले चंद  शेर मुझे बहुत पसंद है ,आप भी इनका  लुत्फ़ उठायें
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तुम्हे जीने में आसानी बहुत है
तुम्हारे खून में पानी बहुत है !

जहर,सूली ने,गाली ,गोलियों ने
हमारी  ज़ात  पहचानी बहुत है

इरादा कर लिया गर खुदखुशी का
तो अपनी आँख का पानी बहुत है
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पुकारे आँख में चढ़कर, तो खु को  खु  समझता है
अँधेरा किस को कहते है ये बस जुगनू समझता है

हमे तो चाँद -तारों में भी तेरा  रूप दिखता  है
मोहब्ब्त में नुमाइश को अदाये तू समझता है !
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रूह -जिस्म का ठौर -ठिकाना चलता रहताहै
जीना मारना, खोना पाना चलता रहता है !

सुख दुःख वाली चादर ,बढ़ती घटती रहती है
मौला     तेरा    ताना   बाना  चलता रहता है !

इश्क करो तो जीते जी मर जाना पड़ता है
मर कर भी लेकिन जुर्माना चलता रहता है

जिन  नज़रों ने रोग  लगाया गज़लें कहने का
आज तलक उन को नज़राना चलता रहता है !
(कुमार विश्वास )

Wednesday, 18 February 2015

स्वाइन फ्लू


           
 जाग जाइये ! क्युकि सरकारे सो रही है !



 स्वाइन फ्लू 
इस बीमारी ने देश के कई राज्योँ में अपना आतंक फैलाया हुआ है , बिना जागरूकता के ये बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है ! चुनाव में पानी की तरह पैसे बहाने वाली सरकारे ,लोगों को बीमारी से बचने के बारे में कोई भी जानकारी या प्रचार  बिलकुल ध्यान नहीं दे रही है

लक्षण

यदि किसी व्यक्ति को सर्दी-खांसी है और उसके साथ उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही है या 101 डिग्री से ज़्यादा का बुखार है तो इसे बिलकुल नज़रंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये लक्षण स्वाइन फ़्लू के हो सकते हैं।
 हर बार सर्दी-खांसी स्वाइन फ़्लू का संकेत नहीं देती, फिर भी सर्दी-खांसी होने पर अतिरिक्त सावधानी रखना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि उसके साथ यदि सांस लेने में तकलीफ होने लगे या तेज़ बुखार आ जाए तो तुरंत किसी अस्पताल में जाकर जांच कराना चाहिए, क्योंकि ज़्यादातर मामलों में ऐसी स्थिति स्वाइन फ़्लू का संकेत देती है और इसका का इलाज जितनी जल्दी शुरू किया जाए इससे बचने की संभावनाएं उतनी ज़्यादा बढ़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में आराम करने के साथ पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए, ताकि डी-हाइड्रेशन ना हो। वर्ना मर्ज बढ़ सकता है।

सावधानी 

अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है के मेट्रो में यात्रा के दौरान ,बीमारी एक से लग जाने का खतरा काफी है,मेट्रो में काफी भीड़ के कारण लोग काफी आस पास खड़े होते है ,मैट्रो का दरवाजा बंद होता है ताज़ी हवा आने का कोई माध्यम नहीं रहता सब उस ही हवा में सांस ले रहे होते है ,अपने मुह पर मास्क जरूर लगाये और वापस अपने स्थान पर पहुंच कर अच्छे  से मुह-हाथ साफ़ करें !   

(1) इस बीमारी से बचने के लिए हाइजीन का खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए. खांसते समय और झींकते समय टीशू से कवर रखें. इसके बाद टीशू को नष्ट कर दें.
(2) बाहर से आकर हाथों को साबुन से अच्छे से धोएं और एल्कोहल बेस्ड सेनिटाइजर का इस्तेमाल करें.
(3) जिन लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण हों तो उन्हें मास्क पहनना चाहिए और घर में ही रहना चाहिए.
(4) स्वाइन फ्लू के लक्षण वाले मरीज से क्लोज कॉंटेक्ट से बचें. हाथ मिलाने से बचें. रेग्यूलर ब्रेक पर हाथ धोते रहें.
(5) जिन लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही हो और तीन-चार दिन से हाई फीवर हो, उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए.
(6) स्वाइन फ्लू के टेस्ट के लिए गले और नाक के द्रव्यों का टेस्ट होता है जिससे एच1एन1 वायरस की पहचान की जाती है. ऐसा कोई भी टेस्ट डॉक्टर की सलाह के बाद ही करवाएं.



स्वाइन फ्लू ,या अन्य किसी प्रकार के फ्लू के लिए ये काढ़ा सहायक औषधि के रूप में काफी कारगर है

एक टुकड़ा दालचीनी
एक इलायची
३,४, लौंग
जरा सी मुलेठी 
एक छोटा टुकड़ा अदरक
कुछ दाने काली मिर्च
तुलसी के कुछ पत्ते

इन सब को आधा लीटर पानी में उबाले , एक चौथाई रह पर छान कर,गुनगुना ही पीये ,ये सब आप चाय में भी डाल सकते है ,अगर बीमारी अधिक बड़ गयी हो तो थोड़ी नीम की छाल और गिलोय भी डाल ले किन्तु नीम की छाल और गिलोय को चाय में नहीं सिर्फ काढ़े में डाला जा सकता है,दिन में २ बार इस काढ़े का उपयोग करें !
जो लोग बीमार नहीं है वे भी ये काढ़ा दिन में एक बार पीये तो बीमारी से बचे रहेंगे

नोट :- इस काढ़े में मुलेठी की मात्रा सबसे अधिक रखें ये काढ़े को आसानी से पचने लायक बनती है किन्तु जिन्हे डायबटीज हो वे मुलेठी नहीं डाले
( प्याज के ४ टुकड़े करके घर में अपने आस पास रखें और बीमार को सूंघने को दें,किसी भी प्रकार के वायरस को इससे नियंत्रित किया जा सकता है )

कपूर को भी कीटाणुनाशक के रूप में आयुर्वेद में मान्यता प्राप्त है ,इसे किसी सूती कपड़े में रख कर सूंघे ,अपने घर में या जहाँ भी आप हों कुछ टुकड़े कपूर के अवश्य रखें व्,हवा में इसकी खुशब फैलने से कीटाणु खत्म होंगे