Thursday, 16 February 2012

रिश्ता


 



आंसूओसे यह अजीबसा रिश्ता कैसा -
मेरी हर आह्से बेसाख्ता जुड़े रहते हैं
ज़रा सी टीस दरीचोंसे झांकती है जब

मरहम बनकर उसे ढकने को निकल पड़ते हैं...
जब कभी चाहूं मैं रोकना पीना उनको-
हर हरी चोट को नासूर बना देते हैं -
जमकर बर्फ हो गए उन लम्होंको -
अपनी बेबाक तपिशसे जिला देते हैं ...
फिर तड़प का वही सिलसिला रवां करके
किसी मासूम की आँखों से ताकते मुझको-
मानो मेरा दर्द, मेरी तक्लीफ देखकर वह -
कुछ शर्मसार से निगाहोंको झुका लेते हैं.

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सरस दरबारी 
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Tuesday, 14 February 2012

जिंदगी

 

आज फिर तेरे एक शुष्क पहलु को  देखा  जिंदगी!
अश्रु जल आँखों में  था,  बहने  से  रोका  जिंदगी !!

क्यूँ हर इन्सान तुझे अच्छा लगे है रोता,  जिंदगी !
देती क्यूँ हर इंसा की उम्मीद को तू धोखा ,जिंदगी!!

क्यों तू इतनी कठोर है ,पत्थर  सी  है  तू   जिंदगी!
क्यों कोई सनेह अंकुर तुझ में ना फुटा    जिंदगी!! 

हर पल   हर  छन  दर्द  तू  सबको ही देती जा रही!
काश के   तेरा   कोई   अपना  भी  रोता,  जिंदगी!! 

बन  कर  कराल  कालिका, तू  मौत का नृत्य करे!
कोई  शिव  आकर , काश तुझे रोक लेता जिंदगी !! 

Sunday, 12 February 2012

मन चंचल है

मन चंचल है ,  चपल है,   चलायमान है,   अधीर है 
जीत जाता अधिकाँश  युद्ध ,  ये   ऐसा   रणवीर  है 

रोज नया कुछ पाने की इच्छाए इसकी बढती जाती है 
बुद्धि, इसकी  देख हरकतें ,कसमसाती है  चिल्लाती है

पर ये है स्वार्थ का पुतला,इस को किसी की पीर नहीं है 
जीत इसे काबू में  कर ले ,  कोई भी  ऐसा  वीर  नहीं  है 

बड़े बड़े योगी  जनों   को ये ऊँगली   पर  नाच नचाता है 
तोड़  के   लोगों   के  व्रत -संकल्प  ये अट्टहास लगता है 

जो कहे के मन को जीत लिया, ये उसी  को  मुंह की खिलाता है 
महाविजय्यी ,महा योद्धाओं को ये चारों खाने चित कर जाता है 

इसे पराजित  कर   लेने   का   कभी   भी   करो   गुमान   नहीं 
ये काम असम्भव है बिलकुल ,   हम   इन्सां है,  भगवान नहीं 

जीत नहीं सकते गर इस को, तो परिवर्तित कर दें इसकी  राहें 
इच्छाएं मारे से मरे ना तो आओ बदल दें हम   मन  की   चाहें 

हे मन तू   ईश्वर   में खो जा,    तू    उस   का   रूप निहारा कर 
तू उस के आगे    नाचा  कर,    और  हर  दम  उसे   पुकारा  कर 

कर के पुण्य कार्य,सद्कार्य तू ,   दुखियों   के   दुःख   निवारा   कर 
सब व्यसन त्याग दे,आज अभी ,बस प्रभु प्रेम का नशा गवांरा कर.

पुरानी कविता
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(अवन्ती सिंह)


Friday, 10 February 2012

वो कभी






वो कभी अपना ,कभी अजनबी सा लगा 
लगा ख्वाब कभी,तो कभी यकीं सा लगा

उस को  देखते  ही  मर  मिटे  थे  हम तो 
हद है के वो  फिर  भी  जिंदगी  सा  लगा

कभी लगा के सागर हो वो गम्भीरता का 
और   कभी    सिर्फ  दिल्लगी  सा   लगा  

कभी    तो     सांस    सांस    जीया   उसे 
और    कभी    बीती  जिंदगी   सा   लगा  

उस   के  साए  में  सो   गए    हम  कभी 
और   कभी  धुप  वो  तीखी   सा    लगा 

कभी पाकर लगा उसे, पा ली कायनात सारी
और कभी वो हाथ से रेत फिसलती सा लगा

उस की आँखों में उतर कर गुम हो गए हम 
कभी वो झील सा  तो  कभी  नदी  सा लगा

(अवन्ती सिंह)


Wednesday, 8 February 2012

प्रेम जब अनंत हो गया,रोम रोम संत हो गया ...







                                                         (  माँ आनन्दमयी )


माँ आनन्दमयी का व्यक्तित्व मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा ,मेरा मानना है उन की तस्वीर को कोई कुछ देर निहार ले तो आनन्द से भर जाता है ,सच्चे संत की ये ही पहचान होती है ,उन को देखने भर से शान्ति मिल जाती है !
माँ का जन्म,  त्रिपूरा के खेडा नाम के गाँव में एक बंगाली परिवार में  ३० अप्रैल १८९६ को हुआ था ,१२ वर्ष की आयु में उनका विवाह भोलानाथ जी के साथ हुआ,बचपन से ही कृष्ण की आराधना  में  लीन रहने  वाली माँ आनन्दमयी की भक्ति  ,उम्र के साथ -२ परवान चढने लगी ,कृष्ण प्रेम में आकंठ डूब जाने के बाद २६ वर्ष की उम्र में उन्होंने प्रवचन के माध्यम से ये प्रेम रस  जन सामान्य  में वितरित करना शुरू किया , उन का शरीर 
१९८३ में पञ्च तत्व में विलीन हो गया पर माँ का प्रेम आज भी महसूस किया जा सकता है .

Tuesday, 7 February 2012


एक अंतराल के बाद देखा...
मांग के करीब सफेदी उभर आई है
आँखें गहरा गयी हैं,
दिखाई भी कम देने लगा है...
कल अचानक हाथ कापें ..
दाल का दोना बिखर गया-
थोड़ी दूर चली ,
और पैर थक गए .
अब तो तुम भी देर से आने लगे हो..
देहलीज़ से पुकारना ,अक्सर भूल जाते हो
याद है पहले हम हर  रात पान दबाये,
घंटों घूमते रहते...
..अब तुम यूहीं टाल जाते हो...
कुछ चटख उठता है-
आवाज़ नहीं होती ...
पर कुछ साबुत  नहीं रह जाता.....
और यह कमजोरी,
यह गड्ढे,
यह अवशेष
जब सतह पर उभरे ...
एक चटखन उस शीशे में बिंध गयी ..
..और तुम उस शीशे को...
.. फिर कभी न देख सके!




(Saras Darbari )

Sunday, 5 February 2012






क्या कहिये ऐसी हालत में कौन समझने वाला है 
सब की आँखों  पे  पर्दा है हर एक जुबां पर ताला है 

किस के आगे सर पटकें और चिल्लाये किस के आगे 
एक हाथ में छुपा है खंज़र ,   एक   से  जपते माला है 


करनी और कथनी में अंतर ,आसमाँ और ज़मीं का है 
कहते थे क्या क्या कर देगें,पर बस बातों   में  टाला है 





 (इस रचना की पहली पंक्ति किसी ब्लॉग पर मुशायरे में  ग़ज़ल लिखने
के लिए रखी गयी ,मैं ने कोशिश की पर क्यूकि मुझे ग़ज़ल के नियम पता नहीं 
है के कैसे लिखते है ,तो ये उस मुशायरे के नाकाबिल साबित हुई,यहाँ में इसे ग़ज़ल 
के रूप में नहीं सिर्फ अपनी एक रचना के रूप में रख रही हूँ )
(अवन्ती सिंह)