Thursday, 15 December 2011

इन गीली गीली राहों पर, मैं कभी-2 यूँ ही दूर तलक चला जाता हूँ

बीते वक्त के पन्नों  को,   खोलता हूँ,   पढ़ता   हूँ,   मुस्कराता   हूँ


जब तुम मेरे साथ इन राहों पर चली थी, तो हवाएँ, फिजायँ अलग
थी, भली थी.............


वो मेरे  साथ   तुम्हारा   यूँ   ही चलते जाना, हँसना  ,खिलखिलाना
रूठ जाना और फिर से मुस्कराना....


वो पेड़ों की डाली  से   अठखेलियाँ    करना, कुछ   कलियाँ   चुनना
बालों में सजाना....


लगती हो सुंदर   अगर   मैं   ये   कह   दूं     तो   हया   की लाली का
गालों पर आना.....


वो सारे    पल,     इन    राहों   ने   अपने   दिल  मे   छुपा कर रखे हैं


सुकून     और    शांति के वो   पल,  कुछ और   नहीं,  आलेख रखे हैं


मैं दूर    तक    जाकर      उन   पन्नों    को    पढ़    कर     आता   हूँ


आश्चर्य     है!   उन   पन्नों   की   स्याही      को        मैं   आज    भी
गीली और ताज़ा पाता हूँ.......


(avanti singh )

Sunday, 11 December 2011

मिल कर ढूंढे

मिल कर ढूंढे  वो   सूरज   जो,   अंतस     में     उजियारा     भर   दे 
अँधियारा  मन का  हर ले  जो,   आत्मा  को  पूर्ण   प्रकाशित  कर दे 


लायें   ढूंढ़  कर   वो   बहारें   जो ,हर  एक   डाली    को      हरित  करें
हर डाली पर सुख  की कलियाँ  हो,   हर   पेड़    संतोष    के    फल  दे 


सागर से कहें ,वो बादल गढ़,  जो   स्नेह    का   जल    बरसा     जाये 
वो स्नेह  बहें   हर  एक  मन में  और   कटुता    को    पिघला    जाये


एक नया चाँद   भी    लाना   है   जो, नव-रश्मियाँ   हम  तक  पहुचाये 
हर मन   में   प्रीत   का   ज्वार   उठे , जग   प्रीत   भवर   में  खो  जाये 













Friday, 9 December 2011

ग़ज़ल



ज़िन्दगी तेरी तल्खी गर शराब जैसी है ,
प्यास मेरी कब कम है, बेहिसाब जैसी है .

सच तो ये है जानेमन हम भी एक हस्ती हैं ,
हाँ मगर यह हस्ती भी बस हबाब  जैसी  है .

होश में या नश्शे में कर तो ली थी कल तौबा,
आज फिर मेरी नीयत  क्यूं  खराब जैसी है ?

प्यास है या बेजारी क्या है जो उन आँखों में
अब सवाल  जैसी है , अब  जवाब  जैसी  है .

फिर वह आग सी ख्वाहिश , फिर तड़प वह मीठी सी
वह    जो   रेग   लगती   है ,वह   जो   आब   जैसी  है .
    
सर्वक़द      इरादे    भी       इससे     हार     जाते    हैं
प्यास   मेरी    आँखों   की       शहरेख्वाब    जैसी   है
              ( हबाब = बुलबुला )    .
            
                ( रेग = गर्म   रेत)
                    ( आब = शीतल  पानी ) 
   (सर्व्काद = बहुत ऊंचे ; शःरेख्वाब =सपनों का नगर )

                  अखतर किदवई

Wednesday, 7 December 2011

नव गीत का निर्माण

तुम   यूँ     ही   मुस्कराते     रहो     मेरे     सामने    बैठ कर 
मैं   प्रीत    से   भरे     नव    गीत      का       निर्माण      करूँ  

तुम  अपने   मन   की    मधुरता    बिखरते   रहो       यूँ    ही
मैं   उस    मधुरता    से     अपने     गीतों    में      प्रेम     भरूं

अपनी आँखों  की  चमक   मुझ      तक    ऐसे   ही   पहुचने  दो
समेट कर उसे ,उस से मैं शब्दों   के  लिए    कुछ      गहने   गढ़ूं   


तुम्हारे  प्रेम   की   महक,  जो घेर रही  है  मुझे   चारों   और  से 
इस से   ही  तो   महकेगी   मेरी   ये बिना   सुगंध   की   कविता

अभी मत उठो यहाँ  से, रुको  क्या   तुम     अब   तक   नहीं समझे , 
तुम्हारे होने से ही तो बह रही है मुझ में से छन्द और बंधों की सरिता  


लो तुम हो जाने को  बेकरार  इतना ,तो   मैं   कविता   को   पूर्ण   करती   हूँ
तुम्हारे होने से इसे लिख पाई हूँ सो इस का पूरा श्रेय तुम्हे समर्पित करती हूँ 










खुदा ने जब तुम्हे बनाया होगा ...

चाँद   से  नूर    थोडा,  खुदा   ने     उठाया   होगा 
जब तुम्हारे जिस्म की   रंगत  को  बनाया होगा  

टिमटिमाते दो तारे  रख दिए  आँखों में तुम्हारी 
और काली घटाओं से, बालों को   बनाया   होगा 


होठ  ऐसे  के,  लगे   नाजुक  पंखुड़ी कमल  की हो 
कमल की पखुडिया वो    कैसे   तराश  पाया होगा 


इतने  तीखे  नयन -नक्श  बनाये   होगे   जिससे 
उस  औजार को वो जाने  कहाँ    से    लाया   होगा 


जिस्म   ऐसा,  जैसे   नदी  गिरती हो उठ जाती हो 
नदी   को   सांचे   में,  वो   कैसे ढाल   पाया   होगा


चाँद   से     नूर    थोडा,    खुदा   ने   उठाया   होगा 

जब तुम्हारे जिस्म की रंगत   को   बनाया   होगा 



( चित्र साभार -गूगल इमैज )
















Tuesday, 6 December 2011

करके  अहसान  किसी  पर,  अगर  जता  भी   दिया
तो फिर वो अहसान  कैसा, किया, किया,  ना  किया

रहो   खामोश,   अगर        दर्द   किसी    का     बांटो 
करोगे चर्चे तो फिर गम हल्का,किया,किया ना किया 


तजुर्बे,    जिन्दगी   की   राह   में   गर  काम  ना  आये 
तो फिर वो खाक तजुर्बा   था,किया,  किया,   ना किया

तुम्हारी    हसरतों    पर  गर   पकड रही   ना तुम्हारी
जिया तो जीवन तुम ने,मगर जिया, जिया,  ना जिया


किसी   की   आँख   के आंसू ,  अगर  तुम पौंछ ना पाए 
सजदे   में  सर   खुदा   के ,   दिया,   दिया,    ना   दिया 


सफाई    दिल   की कालिख की अगर तुम कर नहीं पाए
स्नान  गंगा      में   जाकर,  किया,   किया,   ना   किया 


तुम्हारे    घर   में   ही   गर  तुम  पे  उठ  रही है उंगलियाँ
सलाम  दुनिया   ने   तुम   को,  किया,   किया,  ना किया 


पुकारे  जब   भी   धरती   माँ,  तो   उठ  चलना   हुंकार  के
कहेगी  वरना  ये धरा,  जन्म इस ने लिया,लिया,ना लिया

Monday, 5 December 2011

अखतर जी की ४ कविताओं की अनोखी श्रृंखला

                    
    असतो  मा

  निर्बंध कुछ भी नहीं है शायद.
एक व्याकरण है
तुम्हारी भावनाओं में भी !
कभी कभी तो,
कारण-कार्य सम्बन्ध से अधिक शक्तिशाली  लगता है
आवश्यकता और आविष्कार का सीकरण,
हमारे संबंधों में भी.
और फिर,
दर्द भी तो नहीं होता है
कभी
खाल के नीचे
हम दोनों में से किसी को.
आओ, हम भी
अपनी खालें बदलना सीख लें.
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                                       मृत्योर्मा

छोड़ो भी,
अब तो वह बात पुरानी है.
हाँ था,
वह भी एक समय था अपने जीवन में .
तब मैं मैं था,
तब तुम तूम थे .
और हम दोनों,
एक अनूठे 'हम' के भाग बने रहते थे.
लगता था बस यह जीवन है,
लगता था बस स्वर्ग यही है.
लेकिन छोड़ो
 यह बातें तो
गुज़रे बीते उस कल की हैं
जिसका परमानेंट एड्रेस
कभी किसी के हाथ न आया.
आज तो मैं भी
उस 'मैं' से बिलकुल ही अलग कोई सा मैं हूँ,
जिसके जाने कितने क़िस्से,
कितने   'हम' का भाग बने बिखरे से पड़े हैं.
और तुम भी तो,
जाने कौन सा 'मैं' बन कर अब
जाने किस या कितने 'हम' में जुड़ से गए हो.
छोड़ो अब वोह पुरानी बातें.
अब तो वोह कल बीत चुका है.
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                                                जाड्यो मा
मैं क्या जानूं उपवन में,
कलियों के चटखने की भाषा को,
दूर पहाड़ों के झरनों की गति जैसा संगीत कभी
मेरे कानों में कब घोल सकी
 मादक मुस्कान किसी की.
समीकरण मधुभरे तुम्हारे नयनों की चंचल चितवन का,
घर की अंगनाई में उतरती,
पौषप्रात की धूप की गर्म उजियारी से क्या है,
मैं क्या जानूं.
मेरे घर के गंदे से गुलदान में ठूंसे
फूल प्लास्टिक के,
खा रहे धुल न जाने कब से .
मेरे घर में कभी कभी ही तो नल में पानी आता है.
मेरे कमरे में एक अंधा बल्ब जला करता है दिन भर.
(दिन भर तो क्या,
दिन भर में जब भी बिजली आती है)
मेरे घर में तो गर्मी होती है,
बस चूल्हे से या ग़ुस्से से.
मैं न समझ पाऊँगा यह उपमाएं .
इस भाषा को सीख सकूं
इतना मेरा सामर्थ्य कहाँ  है.
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                      तमसो  मा

अन्धकार,
घोर गहन और निस्सीम,
क्रूर भयानक अन्धकार.
अट्टहास में डूबी हुई है जिसकी नीरवता,
अन्तास्राल में खो सा गया है जिसका हर छोर.
सब कहते हैं ,
मई ही हूँ यह अन्धकार -
यही है मेरा अस्तित्व,
मेरी पहचान,
मेरी परिभाषा.
पर,
लोक वाणी के देवत्व पर
उलाहने  की रोली लगा   की
इस तमसागर की कुंठित गहराइयों में
किसी निश्छल निष्पाप श्वेतात्मा की तलाश में मग्न
तुम्हारा थका थका सा अजेय विश्वास
मुझे आस्तिक बना देता है.

         अखतर किदवाई