Friday, 23 December 2011

जीवन चक्र

बहारों के आने  मे   वक़्त  तो लगता है
खिज़ाओं के जाने मे वक़्त तो लगता है
मगर अब   तो ज़िंदगी गुलज़ार है  मेरी
सारे जहाँ   की  खुशियाँ ताबेदार है मेरी
ना जाए यह  खुशिया ,यहीं थम सी जाए
अब तो यही  चाहत,लगातार   है     मेरी
मगर यह है चाहत ,नियम तो  नही यह
बहारों को एक दिन तो जाना    ही  होगा
खिज़ाओं को वापस तो आना ही    होगा
यह चक्र तो    यूँ    ही    चलता   है सदा
एक    आता    है    तो एक लेता है विदा
तो फिर क्यू ना खुद को नियती चक्र के लायक बना लूँ मैं
दुख और    सुख    के   मध्य    की   अवस्था  को पा लूँ मैं 



(एक पुरानी रचना)
          

Thursday, 22 December 2011

खुदा ने जब तुम्हे बनाया होगा ...

चाँद   से  नूर    थोडा,  खुदा   ने     उठाया   होगा 
जब तुम्हारे जिस्म की   रंगत  को  बनाया होगा  

टिमटिमाते दो तारे  रख दिए  आँखों में तुम्हारी 
और काली घटाओं से, बालों को   बनाया   होगा 


होठ  ऐसे  के,  लगे   नाजुक  पंखुड़ी कमल  की हो 
कमल की पखुडिया वो    कैसे   तराश  पाया होगा 


इतने  तीखे  नयन -नक्श  बनाये   होगे   जिससे 
उस  औजार को वो जाने  कहाँ    से    लाया   होगा 


जिस्म   ऐसा,  जैसे   नदी  गिरती हो उठ जाती हो 
नदी   को   सांचे   में,  वो   कैसे ढाल   पाया   होगा


चाँद   से     नूर    थोडा,    खुदा   ने   उठाया   होगा 

जब तुम्हारे जिस्म की रंगत   को   बनाया   होगा 


( चित्र साभार -गूगल इमैज )

Tuesday, 20 December 2011

जश्ने बहार


फूलों से भर गयी है डालियाँ सारी
कोयलें  कुहुक   कुहुक   जाती  है 

भंवरों  ने  डेरे  डाले  कलियों पर
कोपलें  , देख  ये  जल  जाती  है

नदी में थिरकती है मछलियां खूब 
कौन   सा   नृत्य    ये   दिखाती है

घटाए बावरी हुई देखो ,बिन मौसम 
भी    उमड़ी      घुमड़ी     आती   है 


बजाके तालियाँ ,ये पत्तियाँ शरारती 
क्यूँ  दांतों  तले  उंगलियाँ   दबती  है 


पेड़ों    से   लिपटी   है    लताये   जो
पलक  क्यूँ   शर्म  से  वो झुकाती   है

तितलियाँ  पहन  के   लिबास   नए
आज कुछ    अलग   ही   इतराती है 

उन  के आने  से   जश्न   हुआ   है ये  
बहारें    ऐसी    कम    ही    आती   है






 


 

ग़ज़ल

कर    लो   अपने   दर्द   को  दूकान कर सको
तुम मीर कब हो जम्मा  जो दीवान कर सको


कद शहर तो क्या घर में भी ऊँचा ना हो सका
बस है जो सर के रहने का सामान कर सको

हर शौक  ही  जुनूँ   था ये    कैसी   बसर    हुई
अब दिल कहाँ जो दर्द को मेहमान   कर  सको


हम तो  हुसूल-ऐ-गम   में भी   सरशार   ही रहे
तुम ऐसी  जिंदगी   ना     मेरी   जान कर सको



ऐ दाई-ऐ-हयाते-ऐ-दवाम एक तुम ही  तो  हो
जो सारी मुश्किलें   मेरी   आसान   कर  सको

(अखतर किदवई )

deewan =collection of poems

husool-e-ghum= collecting sorrows;

sarshaar= Happy

daai -e-hayaat-e-dawaam= one who invites to eternal life (death)


Monday, 19 December 2011

अभिलाषा

गर      प्राण ,देह    को    असमय    त्याग   दें 
तो हे भगवन,  करना   मुझ पे   इतनी    कृपा  

एक नव देह देना मुझ  को ,कुछ दिन  को सही ,
सभी अधूरे कार्य कर सकूँ ,कुछ    अभिलाषाए 
पूर्ण कर सकूँ ......

कुछ  और    देर   मुंडेर    पर   बैठी  चिड़ियों  के 
कलरव     गीत        का   रस   पान   कर   सकूँ 



एक और    बार    सींच   सकूँ   उन    पौधों    को 
जो मेरे   अकस्मात   जाने  के  बाद  सूख चले है

कुछ और देर बच्चों  की   निर्दोष   हँसीं   सुन  लूँ 
समेट लूँ ,अपने अंतर में ,उन की सुन्दर छवियाँ  



कुछ    और    देर    आत्मीय       जनों    को   अपनी
 मुस्कान    से    सुख     शांति     प्रदान    कर    सकूँ  

कुछ  और  देर   बैठ   सकूँ  प्रीतम के   पास, कह   दूँ वो 
सब जो कभी  कहा ही नहीं,   प्रकट  कर दूँ  विशुद्ध   प्रेम

जिसके  सहारे  वो    अपने      अकेलेपन   से  जूझ  पाए 
कर पाए जीवन की हर  कठिनाई का  सामना ,बिना  थके . 


बूढी माँ को कह  तो सकूँ के, दवा    टाइम    से खाना ,अब 
मेरी तरह रोज दवा टाइम से   देने शायद कोई न भी आ पाए 

प्राणों ने देह ही तो   छोड़ी    है ,पर   उन    अभिलाषाओं को 
कहाँ    छोड़    पाए   है   जो ,   अभी    तक    पल    रही   है
इस अमर मन में.... 
(स्व. संध्या गुप्ता को विनम्र श्रद्धांजलि..  )

  

Sunday, 18 December 2011

बताये कोई तो

 बताये कोई तो ये क्यूँ  इन्सां   का  दिल,    दिन     बदिन      छोटा       हुआ      जाता     है
खुदा ने  बनाया तो  खरे  सोने  का था,मिलावट  तुम ने की है, जो   ये खोटा  हुआ    जाता है 

ये तेरा   ये  मेरा ,  ये   अपना     पराया,   बच्चों    को    हम     ने    बस     ये    ही  सिखाया
बचपन में फ़रिश्ते सा था,   उम्र   बढ़ते-2 , वो  वहशी   हुआ  जाता है ,दरिंदा   हुआ   जाता  है 


अब मेरे    शहर की   गलियाँ  सूनी  हो  जाती    है शाम ढलती  ही,खामोशी सी   छा जाती है
कभी अंगीठियाँ जला के तापते थे देर रात तक गलियों में,वो सब,अब    सपना हुआ जाता है  

सांझे चूल्हे  ,  कुवे,  तालाब,आम के बाग़,  हम ने देखे है, उन्हें रूह से   महसूस   भी   किया  है
बच्चों को किस्से भी सुनाये तो, ये सब क्या चीजे होती है ये समझाना , मुश्किल हुआ  जाता है  



ठहर जा  ऐ  इन्सां  रुक जा ,   बस कर ,   इतनी    तरक्की   तो   काफी  है   ना    जीने    के लिए 
ऐसा ना हो तू इतना पा जाये के घुटे दम,कहे इन सब के बीच सांस ले पाना मुश्किल हुआ  जाता है 

(अवन्ती सिंह )
 

Friday, 16 December 2011

अत्याचार

जब मैं ने रचनाये लिखना शुरू नहीं किया था ,उससे पहले भी मन में कविताये नृत्य किया करती थी पर काम में इतना व्यस्त रहती थी के खुद के लिए भी वक्त नहीं निकाल पाती थी ,फिर कविताये लिखना तो बड़ी दूर की कोडी थी,पर जब ये अहसास हुआ के इन्हें यूँ ही बेकार नहीं जाने देना चाहिए लिखना शुरू करना चाहिए तो उस वक्त की अपनी भावनाओ को आप सब के साथ एक कविता के माध्यम से बाँट रही हूँ ......

                      
अब मैं इन कविताओ पर अत्याचार नहीं कर सकती हूँ 
इन को ऐसे व्यर्थ  और  बेकार नहीं  कर  सकती  हूँ
कई वर्षो तक मैं ने इन्हें कागज़ नसीब होने न दिया
क्रमबद्ध इन्हें किया नहीं,सपना कोई संजोने न दिया 
लेकिन अब मैं ये सौतेला व्यवहार नहीं कर सकती हूँ 
अब मैं इन  कविताओ पर.................
नव जीवन के अंकुर अब इन कविताओ से फुटेगे
छंद -बंध की परिधि में,शब्दों का नृत्य चलेगा अब 
भावनाओ के रंगों  से  हर पन्ना   खूब   सजेगा     अब 
इन्तजार कुछ दिन तो क्या,पल दो चार नहीं कर सकती हूँ  
अब मैं इन  कविताओ पर................
हृदय -वीणा की  धुन  पर अब   कविता  मल्हार    सुनायेंगी
गीत  ख़ुशी  से  नाचेगे, गजले  थम    थम    मुस्कायेगीं 
अब अपने मन  से,  मैं  अधिक तकरार नहीं कर सकती हूँ 
अब मैं इन कविताओ पर ...............