Friday, 25 November 2011
नव-जीवन
इन सूखे पत्तों की हरियाली अब खो चुकी है
अब कुछ दिन और बचे है इन के पास
कुछ दिनों में ये सुखेगे , टूटेगे , गिर जायेगे
क्या फिर ये परम शांति को पा जायेगे?
या जमीन के किसी कोने में पड़े चिखेगें , चिल्लायेगे के
हमे तो अभी भी पेड की वो कोमल डाली भाती है
डाल पर वापस जा लगें , ये इच्छा रोज बढती जाती है\
अब कौन समझाये इन पत्तों को, के सृष्टि के नियम से चलो
टूटने के बाद ,पहले धरती में मिलो,गलों और फिर किसी नव-अंकुर
की नसों में बनके उर्जा बहों , उस के प्राणों का एक हिस्सा बनो
तब कहीं तुम दोबारा पत्ते बनने का अवसर पा सकते हो
वरना तो यूँ ही इस कोने में पड़े पड़े बस रो सकते हो चिल्ला सकते हो.
Wednesday, 23 November 2011
बादल
ये बादल क्यूँ यूँ आवारा फिरते है? क्या इनका कभी, कहीं
ठहरने का मन नहीं करता? कोई घर नहीं जंचता इन्हें अपने लिए
किसी पहाड़ की कन्दरा में कुछ दिन रुक कर या किसी आंचल
की छाँव में ठहर ,अंतहीन सफर की थकान मिटाने की इच्छा नहीं जगी ?
शायद ये इच्छा तो जरुर जागी होगी इन के मन में , लेकिन
पता भी है अपनी मज़बूरी का , के कहीं पर अधिक ठहरने की
इजाजत नहीं है ,मोह के बन्धन बाँध कर अपने कर्म का निर्वाह
करना कितना मुश्किल होगा ,ये समझ आता है शायद इन को
अपने अरमानों की लाश उठाये ये निरंतर चलते रहते होगें
ताकि किसी के सूखते अरमानों को अपनी नमी से सींच सके
"आवारा बादल" कह कर कोई भी ना करे अपमान इनका
ये तो कर्म योगी है जो खुद को तप की अग्नि में तपा कर,सब के जीवन
में प्राणों का संचार करते है ,खुद को मिटा, हम सब का उद्धार करते है
ठहरने का मन नहीं करता? कोई घर नहीं जंचता इन्हें अपने लिए
किसी पहाड़ की कन्दरा में कुछ दिन रुक कर या किसी आंचल
की छाँव में ठहर ,अंतहीन सफर की थकान मिटाने की इच्छा नहीं जगी ?
शायद ये इच्छा तो जरुर जागी होगी इन के मन में , लेकिन
पता भी है अपनी मज़बूरी का , के कहीं पर अधिक ठहरने की
इजाजत नहीं है ,मोह के बन्धन बाँध कर अपने कर्म का निर्वाह
करना कितना मुश्किल होगा ,ये समझ आता है शायद इन को
अपने अरमानों की लाश उठाये ये निरंतर चलते रहते होगें
ताकि किसी के सूखते अरमानों को अपनी नमी से सींच सके
"आवारा बादल" कह कर कोई भी ना करे अपमान इनका
ये तो कर्म योगी है जो खुद को तप की अग्नि में तपा कर,सब के जीवन
में प्राणों का संचार करते है ,खुद को मिटा, हम सब का उद्धार करते है
Monday, 21 November 2011
प्रकृति और नारी
मैं हवा हूँ ,मुझे बाँध सके कोई इतनी बिसात कहाँ है किसी में
बाँधने वाले को भी साथ उड़ा कर ले
ले जा सकती हूँ मैं .......
दहकती ज्वाला हूँ मैं......
मेरा सम्मान करने वाले
मुझ से जीवन पाते है
बाकि सब मेरी धधकती लपटों
में जल कर खो जाते है ...
कल कल कर बहता नीर भी मैं हूँ
चाहूँ तो प्यास बुझा दूँ ,जग की
चाहूँ तो सब को बहा ले जाऊं
जीवन और मृत्य ,मेरे ही पहलु है
धैर्य से टिकी धरा हूँ मैं
तुम्हारे हर कर्म को, व्यवहार को
चुपचाप सहती हूँ ,शांत रह कर
पर मेरी जरा सी कसमसाहट
तुम्हारे मन और जीवन में
भूचाल भी ला सकती है
अपनी विशालता में सब को
समेटे ,आकाश हूँ, सब पर स्नेह -जल
बरसा कर नव-जीवन का संचार करूँ
अत्याचार अधिक बढ़े तो ,प्रकोपित
बिजलियाँ गिरा, विनाश भी करूँ
मेरा नाम प्रकृति है या नारी, ये आप ही
निर्णय कीजिये ,हम जुड़वाँ बहनों सी ही
तो है ,बहुत अधिक अंतर नहीं होगा शायद
हम दोनों में ,क्या ख्याल है इस बारे में ??
Sunday, 20 November 2011
ये एक अच्छी बात हुई
सब कुछ खो कर खुद को पाया ये एक अच्छी बात हुईगयी रात्री,प्रभात नव छाया , ये एक अच्छी बात हुई
गिरे पुराने पात वृक्ष से, नव पल्लव अब फुटेगे
फूल खिलेगे हर डाली पर , पंछी चहकेगे /कुकेंगें
हरीतिमा का अब राज्य है आया,ये एक अच्छी बात हुई
उर्जा मन में बढती जाती कुछ करके दिखलाने की
पीकर दर्द जहां के सारे, खुशियों के गीत सुनाने की
आज फिर गीत ख़ुशी का गाया ये एक अच्छी बात हुई
दीप जला कर खुशियों के, अब हम सब में खुशियाँ बाँट रहें
क्यूंकि ,अन्धकार में जो पल काटे वो अब तक हम को याद रहें
पर अन्धकार हमे छु भी ना पाया ये एक अच्छी बात हुई
( अवन्ती सिंह )
Saturday, 19 November 2011
नारी
रामायण से महाभारत तक
हर युग में नारी की एक ही कहानी है,
विचित्र उसकी व्यथा,
विचित्र उसकी जिंदगानी है |
कभी खेल में जीती जाती है.
कभी जुए में हारी जाती है |
निज स्वाभिमान को खोजती,
अनल सी जलती जाती है,
पृथा सी हर कष्ट झेले जाती है|
क्यूँ नारी को ही अग्नि-परीक्षा देनी है पड़ती,
क्यूँ नारी ही प्रश्न चिन्ह पर पाई जाती है |
दुर्गा सी पूजी जाने वाली, लक्ष्मी सी मर्यादित,
लहू ह्रदय का दे संतानों को पोषा नारी ने,
नर से बढ़ कर कार्य किये नारी ने
फिर भी क्यूँ हाशिये पे पाई जाती है |
नर जब होता हतास
स्त्री ही पूर्णता लाती जीवन में,
नर हो जब निराश
स्त्री ही आत्मीयता दर्शाती जीवन में,
फिर भी सामग्री यह विलाशिता की क्यूँ समझी जाती है |
जाग रहा अब समाज,
मानसिकता पुरुषों को भी बदलनी होगी,
सहचरी वो जीवन की,
सन्मान दे स्तिथियाँ भी बदलनी होंगी,
चरितार्थ करना होगा,
यामा की परिभाषा कैसे नयी बनाई जाती है |
( सुरेश चौधरी )
हर युग में नारी की एक ही कहानी है,
विचित्र उसकी व्यथा,
विचित्र उसकी जिंदगानी है |
कभी खेल में जीती जाती है.
कभी जुए में हारी जाती है |
निज स्वाभिमान को खोजती,
अनल सी जलती जाती है,
पृथा सी हर कष्ट झेले जाती है|
क्यूँ नारी को ही अग्नि-परीक्षा देनी है पड़ती,
क्यूँ नारी ही प्रश्न चिन्ह पर पाई जाती है |
दुर्गा सी पूजी जाने वाली, लक्ष्मी सी मर्यादित,
लहू ह्रदय का दे संतानों को पोषा नारी ने,
नर से बढ़ कर कार्य किये नारी ने
फिर भी क्यूँ हाशिये पे पाई जाती है |
नर जब होता हतास
स्त्री ही पूर्णता लाती जीवन में,
नर हो जब निराश
स्त्री ही आत्मीयता दर्शाती जीवन में,
फिर भी सामग्री यह विलाशिता की क्यूँ समझी जाती है |
जाग रहा अब समाज,
मानसिकता पुरुषों को भी बदलनी होगी,
सहचरी वो जीवन की,
सन्मान दे स्तिथियाँ भी बदलनी होंगी,
चरितार्थ करना होगा,
यामा की परिभाषा कैसे नयी बनाई जाती है |
( सुरेश चौधरी )
Thursday, 17 November 2011
मुद्दतों पहले जो डूबी थी वो पूंजी मिल गयी
जो कभी दरिया में फेंकी थी वो नेकी मिल गयी
ख़ुदकुशी करने पे आमादा थी नाकामी मेरी
फिर मुझे दिवार पर चढ़ती ये चीटी मिल गयी
मैं इसी मिटटी से उठ्ठा था बबूले की तरह,और
फिर एक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गयी
मैं इसे इनाम समझूँ या सज़ा का नाम दूँ
उंगलियाँ कटते ही तोहफे में अंगूठी मिल गयी
फिर किसी ने लक्ष्मी देवी को ठोकर मार दी
आज कूड़ेदान में फिर एक बच्ची मिल गयी
(मुनव्वर राना)
जो कभी दरिया में फेंकी थी वो नेकी मिल गयी
ख़ुदकुशी करने पे आमादा थी नाकामी मेरी
फिर मुझे दिवार पर चढ़ती ये चीटी मिल गयी
मैं इसी मिटटी से उठ्ठा था बबूले की तरह,और
फिर एक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गयी
मैं इसे इनाम समझूँ या सज़ा का नाम दूँ
उंगलियाँ कटते ही तोहफे में अंगूठी मिल गयी
फिर किसी ने लक्ष्मी देवी को ठोकर मार दी
आज कूड़ेदान में फिर एक बच्ची मिल गयी
(मुनव्वर राना)
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