Thursday, 13 October 2011

                  एक मुक्तक 
यूँ तो सब कुछ है मकाँ  में, पर वो आँगन खो गया
सब से आगे है वो बच्चा जिस का बचपन खो गया
नीति कुछ  ऐसी फंसी इस   राजनीति  के  भंवर  में 
गांधियों की   भीड़ में  बेचारा  मोहन  खो  गया  


             २ रुबाइयां
     

                  1

कोसो किस्मत को, तीरगी  से डरो
या जलाओ दिए  उजाला करो 
सूनी  आँखे भली नहीं लगतीं 
इन में सपने  या नींद कुछ तो भरो
                 २
सपने हों अगर आँख में तो कम बरसे 
दुनिया उसे मिलती है जो निकले घर से
या उड़ के झपट लाओ वो काले बादल 
या घर में ही बैठे रहो प्यासे तरसे
    ( akhtar kidwai )

Wednesday, 12 October 2011

           जिंदगी 

आज फिर तेरे एक शुष्क पहलु को देखा जिंदगी!
अश्रु जल आँखों में था, बहने से रोका जिंदगी !!
क्यूँ हर इन्सान तुझे अच्छा लगे है रोता, जिंदगी !
देती क्यूँ हर इंसा की उम्मीद को तू धोखा ,जिंदगी!!
क्यों तू इतनी कठोर है ,पत्थर  सी  है  तू   जिंदगी!
क्यों कोई सनेह अंकुर तुझ में ना फुटा    जिंदगी!!
हर पल हर छन दर्द तू सबको ही देती जा रही!
काश के तेरा कोई अपना भी रोता,  जिंदगी!!
बन कर कराल कालिका,तू  मौत का नृत्य करे!
कोई शिव आकर ,काश तुझे रोक लेता जिंदगी !! 
वे आँखे महागाथा सी ,लम्बी कथा सुनती 
निशब्द, किताबी आँखे वे,कितना कुछ कह जाती 

उलझे विचारों सी लगती, कभी सवेदना बन जाती 
कभी बादल की तरह उमड़ती ,कभी चिंगारी हो जाती 
वे आँखे महागाथा सी , लम्बी कथा सुनती......

कभी किलकती शिशु सी,कभी यौवन  सी इठलाती 
जीवन संध्या जीने वालों सी, कभी एकाकी  हो जाती
वे आँखे महा गाथा सी ..............

कभी कथानक, कभी संवाद ,अनगिनत  चरित्रों का संसार
ख़ामोशी से कहती कुछ कुछ ,रिश्तों की बुनियाद बनती 
वे आँखे महा गाथा सी .............
उठती ,झुकती,मुस्काती कभी इन्द्रधनुष  बन जाती
छुपाये नव  रस रस  कोरों  में, दर्द के   कतरे  छलकती 
वे आँखे महा गाथा सी .............

 ( shankar meena  )

Tuesday, 11 October 2011

मित्रता
आओ आकर मिल बैठे हम,शिकवे गिले भूल जाए हम
आत्मीयता का वरण करे,देहाभिमान को भुलाए हम
ये सनेह की डोरी,प्रेम के बंधन, क्या इन का कुछ मोल नहीं?
मेत्रि और मित्रता जैसा जग मे होता कुछ और नहीं
हे मित्र मित्रता मे होता, कुछ भी अनमेल,बेमेल नहीं
ये सनेह और आत्ममीयता,सच मे है,ये कोई खेल नहीं
नाराज़गी के इस हिम गिरी को, उश्मित सनेह से पिघलाए हम
हम मित्र थे मित्र रहेगे सदा, आओ ये कसम उठाए हम
आत्मीयता का वरण करे,देहाभिमान को भुलाए हम
             मुख़्तसर नज्में 

                      १

हाँ तुम एक मंदिर बनवा लो 
और तुम एक मस्जिद बनवा लो 
क्यूंकि तुम्हारे दिल  के अंधेरों से
अल्लाह , भगवान्  वो  जो  है 
ऊब   चूका है .........
उस को नया मकान चाहिए

                     २

बंदूकों, तलवारों, छुरियों को 
कुछ दिन की छुट्टी दे दें 
बारूदों के ढेर छुपा  दें 
दूर  कहीं तहखानो में
मुस्कानों  के गहने
फिर एक बार निकाले
शायद लौट ही 
आयें बहारें 
क्या ख्याल है?
करके देखें?
( अख्तर किदवई  ) 

  

Sunday, 9 October 2011

फितरत

कई बार देखा है के कुछ लोग हर बात में है चीज़ में सिर्फ दुःख और दर्द ही नज़र आता है
बहुत ही नकारात्मक तरह का जीवन जीने की आदत हो जाती है,हमे क्या क्या मिला ये
सोचने की बजाए,सिर्फ ये सोचते है के हमे क्या नहीं मिला,ऐसे  ही लोगों के लिए कुछ लाइन 
लिख रही हूँ इस दुआ के साथ के ,वो जीवन के प्रति अपना नजरिया बदल ले और खुश रहना
सीख जाये!

कुछ लोगों को गम सहने की इतनी आदत होती है
खुशियाँ आकर दस्तक दें तो उनको दिक्कत होती है
आँसूं आहें और तड़प ये उनके साथी होते है 
इन को पाल पोस कर रखना उनकी फितरत होती है
खुशियों के चंद पल भी उनको होते बर्दाश्त  नहीं 
ये सोच के भी वो रो लेते, के हम क्यूँ उदास नहीं
ऐसे लोगों के संग रहना किसी के बस की बात नहीं 
वो जीवन बस कटा करते ,जीने में विश्वास नहीं 
खुशियों की अमृत वर्षा , ईश्वर तो हर दम करते है
समझदार उसे पीते रहते और मुर्ख कहते, अभी प्यास नहीं.

   

Friday, 7 October 2011

छोड़ो जाने दो

कुछ खुशियाँ दे सकता था, लेकिन छोड़ो  जाने दो!
क्या क्या कुछ हो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
महफ़िल-ऐ-कफ-ओ-मस्ती  थी ,एक सपनो की बस्ती थी!
दिल उसमे खो सकता था, लेकिन छोड़ो जाने दो!!
रोते रोते रात गयी, रात गयी सो बात गयी!
सोने को सो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
वो चेहरे के दाग नहीं थे,दामन पर कुछ धब्बे थे!
छुप के कहीं धो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
जो खुद भी मासूम हो  वो, मुझ पे पहला वार करे!
इतना कह भी सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
कुछ खुशियाँ दे भी सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!
क्या क्या कुछ  हो  सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
 ( AKHTAR ANSAR KIDWAI )