Friday, 14 October 2011

मिर्ज़ा ग़ालिब

दर्द से मेरे है ,तुझे को     बेकरारी हाय हाय!
 क्या हुई जालिम तेरी गफलत सआरी हाय हाय!! 
क्यूँ मेरी गम खारगी का तुझ को आया था ख्याल!
दुश्मनी अपनी  थी मेरी दोस्तदारी हाय हाय !!
उम्र भर का तू ने पयमाने वफा बंधा तो क्या !
उम्र को भी तो नहीं है  पायेदारी  हाय  हाय !!
जहर लगती है  मुझे,  आबो  हवाए   जिन्दगी!
यानि तुझ से थी इसे नासाजदारी  हाय हाय!!
शर्मे रुसवाई से जा छुपना जाकर नकाबे ख़ाक में !
खत्म है  उल्फत की तुझ पर पर्दादारी हाय हाय!!
ख़ाक में नामुसे पयमाने मोहोब्बत मिल गए!
उठ गयी दुनिया से राहो रस्मेदारी हाय हाय!!
इश्क ने पकड़ा न था ग़ालिब अभी वहशत का रंग!
रह गया जो दिल में कुछ  सोकेखारी   हाय हाय !!
( मिर्ज़ा ग़ालिब ) 



 

पतझड़

क्यूँ हर तरफ  अब पतझड़ ही पतझड़ है !
आवाजें सब खामोश है,हर पंछी अब बेपर है !! 
क्यूँ ये ज़मीं इतनी शुष्क और बंज़र है !
जाये नज़र जहाँ तक भी, वीरान सारा मंज़र है!!
कसमसा कर टहनियां, टूटती है,गिर जाती है!
देख कर भी ये तमाशा ,पेड़ खामोश  है,बेबस है !!
एक डगर से कोई राहगीर अब गुज़रता ही नहीं!
छावं बची नहीं जरा भी,बस तपिश है जैसे खंज़र है!!
एक हरा तिनका भी उम्मीद का दीखता नहीं!
करे कैसे सब्र जब छाया हर तरफ ही कहर है !!
ओ खुदा अब तो लौटा दो ,मौसम ऐ बहार को !
हर दर से मायूस है हम, बस अब तुझ पे नज़र है!!
अवन्ती सिंह

Thursday, 13 October 2011

                  एक मुक्तक 
यूँ तो सब कुछ है मकाँ  में, पर वो आँगन खो गया
सब से आगे है वो बच्चा जिस का बचपन खो गया
नीति कुछ  ऐसी फंसी इस   राजनीति  के  भंवर  में 
गांधियों की   भीड़ में  बेचारा  मोहन  खो  गया  


             २ रुबाइयां
     

                  1

कोसो किस्मत को, तीरगी  से डरो
या जलाओ दिए  उजाला करो 
सूनी  आँखे भली नहीं लगतीं 
इन में सपने  या नींद कुछ तो भरो
                 २
सपने हों अगर आँख में तो कम बरसे 
दुनिया उसे मिलती है जो निकले घर से
या उड़ के झपट लाओ वो काले बादल 
या घर में ही बैठे रहो प्यासे तरसे
    ( akhtar kidwai )

Wednesday, 12 October 2011

           जिंदगी 

आज फिर तेरे एक शुष्क पहलु को देखा जिंदगी!
अश्रु जल आँखों में था, बहने से रोका जिंदगी !!
क्यूँ हर इन्सान तुझे अच्छा लगे है रोता, जिंदगी !
देती क्यूँ हर इंसा की उम्मीद को तू धोखा ,जिंदगी!!
क्यों तू इतनी कठोर है ,पत्थर  सी  है  तू   जिंदगी!
क्यों कोई सनेह अंकुर तुझ में ना फुटा    जिंदगी!!
हर पल हर छन दर्द तू सबको ही देती जा रही!
काश के तेरा कोई अपना भी रोता,  जिंदगी!!
बन कर कराल कालिका,तू  मौत का नृत्य करे!
कोई शिव आकर ,काश तुझे रोक लेता जिंदगी !! 
वे आँखे महागाथा सी ,लम्बी कथा सुनती 
निशब्द, किताबी आँखे वे,कितना कुछ कह जाती 

उलझे विचारों सी लगती, कभी सवेदना बन जाती 
कभी बादल की तरह उमड़ती ,कभी चिंगारी हो जाती 
वे आँखे महागाथा सी , लम्बी कथा सुनती......

कभी किलकती शिशु सी,कभी यौवन  सी इठलाती 
जीवन संध्या जीने वालों सी, कभी एकाकी  हो जाती
वे आँखे महा गाथा सी ..............

कभी कथानक, कभी संवाद ,अनगिनत  चरित्रों का संसार
ख़ामोशी से कहती कुछ कुछ ,रिश्तों की बुनियाद बनती 
वे आँखे महा गाथा सी .............
उठती ,झुकती,मुस्काती कभी इन्द्रधनुष  बन जाती
छुपाये नव  रस रस  कोरों  में, दर्द के   कतरे  छलकती 
वे आँखे महा गाथा सी .............

 ( shankar meena  )

Tuesday, 11 October 2011

मित्रता
आओ आकर मिल बैठे हम,शिकवे गिले भूल जाए हम
आत्मीयता का वरण करे,देहाभिमान को भुलाए हम
ये सनेह की डोरी,प्रेम के बंधन, क्या इन का कुछ मोल नहीं?
मेत्रि और मित्रता जैसा जग मे होता कुछ और नहीं
हे मित्र मित्रता मे होता, कुछ भी अनमेल,बेमेल नहीं
ये सनेह और आत्ममीयता,सच मे है,ये कोई खेल नहीं
नाराज़गी के इस हिम गिरी को, उश्मित सनेह से पिघलाए हम
हम मित्र थे मित्र रहेगे सदा, आओ ये कसम उठाए हम
आत्मीयता का वरण करे,देहाभिमान को भुलाए हम
             मुख़्तसर नज्में 

                      १

हाँ तुम एक मंदिर बनवा लो 
और तुम एक मस्जिद बनवा लो 
क्यूंकि तुम्हारे दिल  के अंधेरों से
अल्लाह , भगवान्  वो  जो  है 
ऊब   चूका है .........
उस को नया मकान चाहिए

                     २

बंदूकों, तलवारों, छुरियों को 
कुछ दिन की छुट्टी दे दें 
बारूदों के ढेर छुपा  दें 
दूर  कहीं तहखानो में
मुस्कानों  के गहने
फिर एक बार निकाले
शायद लौट ही 
आयें बहारें 
क्या ख्याल है?
करके देखें?
( अख्तर किदवई  )