Saturday, 5 November 2011

एक वृक्ष को माध्यम बना कर मैं उन लोगों का दर्द आप सब तक पहुचाना चाहती हूँ जिनकी उंगली पकड़ कर हम चलते है और जब उन्हें हमारे सहारे की जरूरत होती है तो हम अपनी अलग दुनिया बना उस में खो जाते है ,अपनी जड़ों को भूल जाते है हम........


 मैं एक सुखा वृक्ष  हूँ,कई जगह से टुटा वृक्ष  हूँ
लेकिन मेरी शाखाएं  इतनी विशाल है के अभी भी 
 कई राहगीरों को  धुप से बचाता हूँ , छुपाता  हूँ   

मैं तडपता हूँ, रोता हूँ खून के आंसू  लेकिन जला  कर खुद को 
दुनिया वालो को अभी भी  ठण्ड  से  बचाता  हूँ  ,हंसाता  हूँ 

मुझ में अब एक भी अंकुर न फूटेगा ये  तय  है  लेकिन
कई नए  पौधों  के  अभी   भी  मैं घर- बार   चलाता    हूँ 

हुजूम चारों  तरफ  है मेरे, घिरा   हूँ वृक्षों   से  लेकिन,  
अकेला हूँ अभी भी ,अकेलेपन से मैं आज भी घबराता हूँ 

Friday, 4 November 2011

दिल के करीब

ये कविता मैं ने लगभग २ महीने पहले लिखी थी पर अभी तक मैं ने इसे किसी को सुनाया या लिखा  नहीं है,
ये कविता मेरे दिल के बहुत करीब है, अजीज है मुझे ,उम्मीद है  आप सब  को  भी पसंद आएगी..... 

अब मैं  कविताओ  के  प्रकार  बदलने   लगी  हूँ 
आकर  बदलने  लगी  हूँ,  व्यव्हार  बदले  लगी हूँ  

कब तक कवितायेँ सावन की   फुहारें  लाती जाएगी 
कब तक मेघा  बन  बरसेगी,मल्हार  गाती  जाएगी
इन भीगी कविताओ के वस्त्र ,इस बार बदलने लगी हूँ 
अब   मैं  कविताओं  के  प्रकार   बदलने    लगी   हूँ 

कब तक श्रृंगार -रस  में डूबी  रास रचाएगी   कवितायें  
कब तक नृत्य करेगीं  कब तक मन बहलाएगी कवितायेँ 
मैं  अब  इनके  सारे  हार   श्रृंगार  बदलने   लगी   हूँ 
अब  मैं  कविताओं   के   प्रकार   बदलने   लगी   हूँ   

कब तक वीर-रस के  ढोल  नगाड़े   पीटेगी कवितायेँ 
कब तक इन्कलाब के नारे ,चिल्लाएगी , चीखेगी कविताये
अब  इनके  हाथों  की  मैं,  तलवार    बदलने  लगी   हूँ   
अब  मैं   कविताओं  के   प्रकार  बदलने   लगी   हूँ 

कब तक सब की आँखों में अश्रु-जल छलकाएगी कविताये 
कब  तक  रोयेगीं,    तरसेगीं,    तड़पायेगी   कवितायेँ 
इन की  सृष्टी  और  इनका   संसार  बदलने  लगी   हूँ
अब   मैं   कविताओ   के  प्रकार   बदलने     लगी     हूँ 

Thursday, 3 November 2011

सूरज ,सितारे,चाँद मेरे  साथ  में रहे !
जब तक तुमारे हाथ  मेरे हाथ  में रहे!!

शाखों से टूट जाये वो पत्ते नहीं है हम!
आंधी से कोई कह दे  के औकात  में रहे!!

कभी महक की तरह हम गुलो से उड़ते है!
कभी  धुएं  की तरह  पर्वतों से  उड़ते है!!

ये कैचियां हमे उड़ने से  खाक  रोकेगी !
हम परों  से नहीं,  हौसलों  से  उड़ते है !!

( राहत इन्दोरी )
 

Wednesday, 2 November 2011

उंगलियाँ यूँ ना सब पर उठाया करो 
खर्च करने से पहले कमाया करो

जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे 
बारिशों  में  पतंगें   उड़ाया   करो 

शाम के बाद,   तुम जब सहर देखो 
कुछ फकीरों को खाना खिलाया करो

दोस्तों से  मुलाकात  के नाम पर 
नीम की पत्तियों को  चबाया करो 

घर उसी का सही तुम भी हक़ दार हो 
रोज आया करो ,रोज  जाया  करो
  ( राहत इन्दौरी  )
 
        ग़ज़ल 

जो मुश्किल में शरीके गम नहीं है !
मेरे  साथी  मेरे  हमदम  नहीं   है !!

ये  माना  एक  से  है  एक   बेहतर!
मगर हम भी किसी से कम नहीं है!! 

तेरे जलवो में जिस ने होश खोये
वो कोई  और  होगा  हम   नहीं  है

(अनजान शायर )







एक खुबसूरत गजल

कितनी पलकों की नमी मांग के लाई होगी 
प्यास तब फूल  की शबनम  ने बुझाई होगी 

एक  सितारा जो   गिरा टूट  के  ऊचाई    से 
किसी  जर्रे  की  हंसी  उसने   उड़ाई   होगी

आंधियां  है के मचलती  है चली  आती  है 
किसी मुफ्लिश ने कहीं शम्मा  जलाई होती

मैं ने कुछ तुम से कहा हो तो ज़बां जल जाए 
किसी दुश्मन  ने ये  अफवाह  उड़ाई  होगी 

हम को आहट  के भरोसे पे सहर तक पहुंचे 
रात भर आप  को  भी  नींद न  आई   होगी

( एक अनजान शायर )

Tuesday, 1 November 2011

तुम

तुम  जीवन  उर्जा हो प्रियतम!
तुम  ही  तो  मेरे   प्राण     हो !!
तुम ही मेरी साँसों की डोरी !
तुम  ही  मेरी  पहचान   हो!!
तुम बिन जीवन कैसा जीवन!
तुम जीवन का संज्ञान हो  !!
तुम   ही    मेरी   प्यास    हो!
और तुम ही अमृत जाम हो!!
तुम बन कर ओस बरसते जब !
मैं जवा-कुसुम सी खिल जाती!!
तुम हास्य-परिहास्य मेरे जीवन का !
तुम  ही  मेरा  आत्म   सम्मान हो !!
तुम  जीवन  उर्जा हो प्रियतम!
तुम  ही  तो  मेरे   प्राण     हो !!
 
(अवन्ती सिंह )