Sunday, 1 January 2012

नव वर्ष 2012

हे नवजात शिशु ,हे अबोध बालक ....
इस सृष्टि में है तुम्हारा स्वागत 

अभी नन्हे से तुम बालक हो 
आओ   तुम्हे   दुलार   दूँ  मैं

भर   दूँ    झोली उपहारों से 
माथा स्नेह से पुचकार दूँ मैं 

सृष्टि  की बगिया में तुम फूलो -फलों
 सुख पाकर विकसित  हो जाओ 

सब की झोली भरो खुशियों से 
सब   का    प्रेम   पा मुस्काओ 


सब शांत सुखी सम्पन्न  रहे 
तुम पर भी होगी ये जिम्मेदारी 

आओ हम सब मिल जुल कर 
नए  साल का आदर सत्कार करें 


दुःख अपनों के हम  सारे ले लें और 
सब के मन में स्नेह  और प्यार भरे 








 

Friday, 30 December 2011

आप को मुझ से बहुत प्यार है .....

आप ने मुझे बनाया है ,आप को तो पता है मेरी पसंद और नापसंद के बारे में 
पर ऐसा क्यूँ है के कुछ चीजे ऐसी बनाई आप ने जो मुझे पसंद नहीं ?
आप ने खुशियाँ बनाई मेरे लिए ,पर दुःख किस के लिए बनाये थे ?
आप ने हंसी तो बनाई मेरे लिए ,पर आंसू किस लिए बनाये थे 
आप ने प्यार बनाया मेरे लिए ,पर नफरत किस लिए बनाई?
आप ने फूल बनाते हुए मेरे ही बारे में सोचा होगा,पर कांटे तो नहीं चाहिए मुझे 
आप ने मिलन बनाया वो सुखद लगता है,पर जुदाई के पल नहीं सहने है मुझे 
आप ने जीवन बनाया उस से मुझे बेहद प्यार है,पर डर लगता है मरने के ख्याल से
किस लिए ,किस लिए बनाईआप ने वो चीजे जो मुझे   पसंद ही  नहीं  है ?
सोचती रही ,हर दिन हर पल ,सताता   रहा   ये  सवाल  मुझे  हमेशा  ही 
जीवन के दिन, महीने, साल बीतते ही रहे इस सवाल के बोझ को ढ़ोते हुए 
फिर जीवन के अनुभव इन सवालों के जवाब चुपके से में कान में बता गए 
खुशियों की कीमत दुःख के बाद ही समझ आती है 
जुदाई ही मिलन का महत्व समझाती है 
फूलों को   कांटे  ही   सम्भाले   रखते  है 
जीवन की थकन को  मृत्यु ही उतार पाती है
समझ गयी हूँ भगवन अब मैं समझ गयी हूँ 
आप ने सब कुछ मेरे ही लिए बनाया ,मुझे  हर   चीज  की  जरूरत  है 
पर मैं से सब अपनी नजर से देखा ,काश आप  की  नजर से देख पाती 
तो ये पंक्ति मैं पहले ही दोहराती ,आप कभी कुछ गलत नहीं कर सकते 
आप को मुझ से  बहुत प्यार है ,आप  को मुझ से   बहुत  प्यार है .....

Wednesday, 28 December 2011

घुमती है जिंदगी

मुस्कराहट उधार की, ओढ़े  घुमती  है जिंदगी 
झूठ के आईने में सच   को  ढूँढती है   जिंदगी 

पाँव में छाले हजारों, दर्द से कराहती  है,और 
 रोजाना  ही  नए नृत्य में झूमती है   जिंदगी 

दिल की गहराई में सन्नाटा है और  तन्हाई  है 
और बन कर महफिले बहार घुमती है जिंदगी 

सांस थम जाये तो आ जाये  इस   को  भी करार 
पूरी उम्र से यूँ ही बेचैन ,बेकरार घुमती है जिंदगी  

Tuesday, 27 December 2011

ख़त एक तुम को लिखने का मन है

ख़त एक  तुम को लिखने का मन है  भगवन
क्या पता  है     तुम्हारा? किस   धाम   लिखूं ?
मन्दिर  में हो?गिरिजा  में हो? या मस्जिद में पैगाम लिखूं ?
तुम नाम भी अपना बतला दो ,राम लिखूं या रहमान लिखूं?

धरती, अम्बर सूरज लिख दूँ या सुबह लिखूं या शाम लिखूं ?
कह कर तुम को अल्लाह पुकारूँ या जगन्नाथ भगवान लिखूं 

तुम महावीर हो या नानक हो तुम? पर हम सब के पालक हो तुम 
निवास निर्धारित है क्या तुम्हारा? गीता में हो? या  कुरान  लिखूं? 
किस देश में हो?किस   वेश में हो?  किस   हाल     में?   परिवेश     में    हो ?
किसी पथ्थर की मूर्त में हो या काबे की सुरत में हो?या गुरुग्रंथ स्थान लिखूं?
तुम निराकार  हो या साकार हो तुम ? एक हो  या  अनेक  प्रकार  हो तुम ?  
रुक्मणी के   महल   में   रहते हो? या   मीरा   का   ग्राम     स्थान   लिखूं?
ख़त     एक    तुम      को     लिखने     का     मन     है     भगवन

क्या पता  है     तुम्हारा? किस   धाम   लिखूं ?..............

Monday, 26 December 2011

नव गीत का निर्माण

तुम   यूँ     ही   मुस्कराते     रहो     मेरे     सामने    बैठ कर 
मैं   प्रीत    से   भरे     नव    गीत      का       निर्माण      करूँ  

तुम  अपने   मन   की    मधुरता    बिखरते   रहो       यूँ    ही
मैं   उस    मधुरता    से     अपने     गीतों    में      प्रेम     भरूं

अपनी आँखों  की  चमक   मुझ      तक    ऐसे   ही   पहुचने  दो
समेट कर उसे ,उस से मैं शब्दों   के  लिए    कुछ      गहने   गढ़ूं   


तुम्हारे  प्रेम   की   महक,  जो घेर रही  है  मुझे   चारों   और  से 
इस से   ही  तो   महकेगी   मेरी   ये बिना   सुगंध   की   कविता

अभी मत उठो यहाँ  से, रुको  क्या   तुम     अब   तक   नहीं समझे , 
तुम्हारे होने से ही तो बह रही है मुझ में से छन्द और बंधों की सरिता  


लो तुम हो जाने को  बेकरार  इतना ,तो   मैं   कविता   को   पूर्ण   करती   हूँ
तुम्हारे होने से इसे लिख पाई हूँ सो इस का पूरा श्रेय तुम्हे समर्पित करती हूँ 

ख़त एक तुम को लिखने का मन है

ख़त एक  तुम को लिखने का मन है  भगवन
क्या पता  है     तुम्हारा? किस   धाम   लिखूं ?
मन्दिर  में हो?गिरिजा  में हो? या मस्जिद में पैगाम लिखूं ?
तुम नाम भी अपना बतला दो ,राम लिखूं या रहमान लिखूं?

धरती, अम्बर सूरज लिख दूँ या सुबह लिखूं या शाम लिखूं ?
कह कर तुम को अल्लाह पुकारूँ या जगन्नाथ भगवान लिखूं 

तुम महावीर हो या नानक हो तुम? पर हम सब के पालक हो तुम 
निवास निर्धारित है क्या तुम्हारा? गीता में हो? या  कुरान  लिखूं? 
किस देश में हो?किस   वेश में हो?  किस   हाल     में?   परिवेश     में    हो ?
किसी पथ्थर की मूर्त में हो या काबे की सुरत में हो?या गुरुग्रंथ स्थान लिखूं?
तुम निराकार  हो या साकार हो तुम ? एक हो  या  अनेक  प्रकार  हो तुम ?  
रुक्मणी के   महल   में   रहते हो? या   मीरा   का   ग्राम     स्थान   लिखूं?
ख़त     एक    तुम      को     लिखने     का     मन     है     भगवन

क्या पता  है     तुम्हारा? किस   धाम   लिखूं ?..............







Friday, 23 December 2011

कल आधी रात के बाद

कल आधी रात के बाद एक कविता ने मुझे झन्झोर कर जगा दिया
पहले     तुम     मुझे     लिख     तो    तब    ही    तुम्हे   सोने   दूँगी
ये कह कर मुझे डरा दिया ...................
समझाया मैं ने उसे ,तुम क्यूँ हो रही  हो बेकरार
ज़रा    तो    करो    सुबह    होने    का    इंतजार
उठते ही सबसे पहले   मैं करूँगी  तुम्हारा शृंगार
सज़ा-धजा,नव वस्त्र पहनाकर, दूँगी  तुम्हे  काग़ज़  पे   उतार
हंस कर बोली कविता,   पागल   नहीं    हूँ,  मुझे   है  सब  पता
२  गीत  और १  ग़ज़ल  मुझ  से आगे   वाली    पंक्ति मे खड़े है
उतरेगे काग़ज़   पर   मुझ   से  पहले,इस   ज़िद्द   पर    अड़े   है
अगर   मैं   सो   गई,  या मष्तिश्क  की गलियों मे कहीं खो गई
मुझे आने मे देर हुई ज़रा भी तो   बाज़ी मार ले जाएगे वो ज़िद्दी
नहीं पता मुझे कुछ भी,अभी करो मेरा शृंगार ...............
पहनाओ मोतियन के हार,सज़ा-धज़ा कर,दो मुझे काग़ज़ पे उतार
फिर तुम भी  सो जाना  पल दो चार....................
आख़िर मैं गई कविता से हार,शीघ्र किया उसका शृंगार
किया नया  कलेवर तैयार,दिया   उसे   काग़ज़ पे उतार
काश! मेरी नींद ना   करने लगे अब   कोई   ज़िद्द बेकार
वो आ ही जाए पल दो चार.....