शाम को आज अलाव जला कर , सब इर्दगिर्द बैठ जायेगे
रेवड़ियां,मूंगफली और मक्की के फुल्ले,बांटेगे और खायेगे
मकर संक्रांति का ये पर्व मन में नव उत्साह भर जाता है
कोई सजाये रंगोली से घर ,तो कोई पतंग उडाता है
उत्तर भारत में इस पर्व को कुछ इस अंदाज से मनाते है
बहन बेटियों के घर ,खिचड़ी,पकवान और नव वस्त्र पहुचाते है
करके पवित्र नदियों में स्नान ,सूर्य के आगे नत मस्तक हो जाते है
कहीं -2 ,घर के बुजुर्गों को नव वस्त्र के दे उपहार आदर सम्मान जताते है
रात को बैठ अलाव की आग के आगे , सब संग हँसते बतियाते है
आपस के मन मुटाव को अग्नि की भेट चढाते , खुशियाँ मनाते है
तुम्हारे सूखे,प्यास से भरे हुए होंठ ,मैं देख नहीं पाती हूँ
मैं पी जो रही हूँ जिंदगी के जाम भर भर के .........
तुम्हारे पेट की भूख का अहसास भी नहीं हो पाता मुझ को
मेरे फ्रिज में भरा रहता है सामान ,मेरी शाही भूख को मिटने के लिए
तुम्हारे जिस्म की हड्डियां कैसे कांप जाती होगी तेज़ ठंड से ये मैं क्या जानू
सर्दियां मुझे तो एक उत्सव सी प्रतीत होती है ,महंगे और गर्म कपडे खरीदने
और रोजाना उन्हें बदल बदल कर पहनने का उत्सव .............
हाँ कभी कभी खुद को अच्छा इंसान साबित करने की होड़ में ,मैं भी आती हूँ तुम्हारी
गन्दी बस्ती में. कुछ पुराने कपडे, कुछ पैसे और कुछ ब्रेड के पैकेट लेकर
वो सामान तुम्हारे लोगों में बांटे हुए मैं फोटो खिचवाना कभी नहीं भूलती हूँ ..........
आखिर वो फोटों ही तो प्रमाणपत्र होते है ,मेरे सवेदनशील होना का .................
और फिर , पार्टीस में उन कपड़ों और ब्रेड के पैकेटों की संख्या से भी अधिक बार, मैं दिखाती हूँ
वो फोटो ,जिन में मैं करुणा की देवी नजर आती हूँ , मन ही मन खुद को खूब सराहती हूँ ......
रात को अपने नर्म मुलायम बिस्तर में लेटते हुए मैं गहरी साँसें लेते हुए सोचती हूँ,इन गरीब लोगों
की गरीबी का अहसास भले ही मुझे ना हो ,नहीं पता ये कितनी तकलीफ में जिंदगी गुज़ार रहे है
पर हम भी रहम दिल लोग है ,सवेद्नाएं है हमारे पास भी ...................
आज इंसान होने का फर्ज़ तो पूरा किया है मैं ने,सब ने कितना सराहा मुझे.....
मेरी आँखों में पड़े हुए है संकीर्णता के जाले
जो मुझे देखने नहीं देते प्रेम की व्यापक परिभाषा
मुझे अभी ये ही लगता है के ,प्रेम स्त्री और पुरुष
के आपसी लगाव तक ही सीमित है,अभी ये ही है
प्रेम की परिभाषा मेरे लिए ........
अभी मैं नहीं सोच पाती के प्रेम तो सार्वभौमिक
सत्य है ,सृष्टि के कण कण में व्याप्त है प्रेम
प्रेम ही सृष्टि के सर्जन का कारण है और प्रेम की हर
पल खोज ही हमारे जीवन का उदेश्य है
जिसे हम अनजाने में नाम दे देते है सुख की खोज का
पर अभी मुझे नहीं पता है ये सब .........
अभी तो मुझे ये ही लगता है के किसी को पा जाने का
नाम ही प्रेम है ,अभी कहाँ पता है मुझे के किसी को
सुख और शान्ति देने के लिए खुद को मिटा देने ,अपने आप को किसी के
अस्तित्व में विलीन कर देना ही सही मायने में प्रेम होता है .........
अभी कहाँ पता है मुझे के जीव मात्र से ही प्रेम नहीं होता,प्रेम तो ईश्वर
से भी होता है ,और ईश्वर से प्रेम के बाद ही तो उस की निर्मित सृष्टि
के कण कण से ,हर जीव से सही अर्थ में प्रेम कर पाते है हम,कोई पराया नहीं
रहता ,सब अपने हो जाते है ,दुश्मन पर भी क्रोध नहीं करूणा भाव उमड़ता है
उस का भी हित हो ये ही प्रयत्न रहता है ......
काश मैं जान पाती इस सत्य को ,तो मैं अपनी आँखों पर पड़े संकीर्णता के
जाले को नोच देती अपने ही नाखुनो से ,और अपनी आँखों के नए उजाले से
देख पाती प्रेम की व्यापकता हो ,फिर प्रेम की परिधि बहुत छोटी नहीं रह जाती मेरे लिए.
काश मैं जान पाती, पर अभी मुझे नहीं पता ..................
खुद को जाने कितने ही पर्दों में वो छुपाये बैठे है
और फिर चेहरे पर एक मुखौटा भी लगाये बैठे है
कैसे समझेगे और कैसे जानेगे हम,के क्या है वो
झांकती हैं जो मुखौटे से,वो आँखें भी झुकाए बैठे है
हाथों के इशारे से भी तो कुछ समझाते नहीं है
और होठों पर भी चुप के ताले लगाये बैठे है
कब तलग न खोलेगे वो राज़ अपना ,कभी तो हद होगी
उसी हद की आस में ,सर को उनके दर पे झुकाए बैठे है
नौ महीने तक गर्भ में माँ बच्चे का बोझ उठती है
अपनी छाती से चिपका कर अमृत पान कराती है
खुद गीले सोती है , सूखे में उसे सुलाती है
उस की सुविधा की खातिर सब दुविधाएं सह जाती है
पर बेटे जब बूढी माँ संग चल ना पायें चार कदम
अक्षर के आदेशों को करती जब अस्वीकार कलम
तब खुलते है गाँव ,गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम
तब खुलते है गाँव ..........
बाप पकड कर ऊँगली, बेटे को चलना सिखलाता है
जब बेटा थक जाये तो झट काँधे पर उसे उठता है
भालू घोड़ा बंदर बन कर उस का मन बहलाता है
और बेटे का बाप कहा कर , मन ही मन इठलाता है
वही बाप जब बुढ़ापे में लगता है नाकारा बेदम
आधुनिकता ढक देती है जब आँखों की लाज शर्म
तब खुलते है गाँव गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम
तब खुलते है......
बेटी पर दामाद का हक़ है ,और बेटों पर बहुओं का
अपनी पूंजी अपनी सम्पत्ति पर अधिकार है गैरों का
पौधों को पानी देना है, क्या अपराध बुजुर्गों का
आखिर क्या उपचार ऐसे माँ बापों के दर्दों का
पथ्थर को पिघला ना पाए जब दो जोड़ी आँखें नम
आशीर्वादों की धरती पर तब लेते है श्राप जन्म
तब खुलते है गाँव ,गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम
तब खुलते है गाँव गली और नगर नगर में........
जिन के खातिर माँ ने मंदिर मंदिर मन्नत मांगी थी
जिस को गोदी में लेकर वो रात रात भर जागी थी
पढ़ा लिख कर पिता ने जिससे कुछ आशाएं बाँधी थी
जिस पर अंध भरोसा कर के हाथ की लकड़ी त्यागी थी
जीवन संध्या में जब वो ही दे दें तन्हाई का गम
तानपुरे को बोझ लगे जब उखड़ी साँसों को सरगम
तब खुलते है गाँव गली .........
यौवन के मद में जो भी माँ बाप के मन को दुखायेगे
वो खुद भी अपनी संतानों से ठुकराए जायेगे
अलग पेड़ से होकर, दम्भी फूल सभी मुर्झायेगे
एक दिन आएगा वो अपनी करनी पर पछतायेगे
सूरज को पी जाने को जब आतुर हो जाता है तम
तिनके को जब हो जाता है ताकतवर होने का भ्रम
जब फूलों में हो जाता है डाली के प्रति आदर कम
गुलशन की आँखों में खटके जब जब पतझड़ के मौसम
तब खुलते है गाँव ,गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम ......
( Dr. कविता किरण )
फिर एक नई भोर में , हे दिवाकर तुम्हारा स्वागत है
स्वागत है आदित्य तुम्हारा ,हे भास्कर तुम्हारा स्वागत है
हे प्रभाकर, हे विभावशु, हे दिनकर तुम्हारा स्वागत है
हे सह्स्त्रांशु , हे त्रयोमुर्ती, हे सूर्य , तुम्हारा स्वागत है
तुम अपनी सौम्य रश्मियों से हमे सौम्यता,शान्ति प्रदान करो
भर दो उर्जा मन में अद्धभुत, हमे अपने तेज का दान करो
आकर पावन दर्श तुम्हारा खुद को पावन कर जाये हम
ज्योतिर्मय करे तन को मन को ,तिमिर को दूर भगाए हम
अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करो ,खुद प्रकाशित हों ,जग प्रकाशित कर
जाये हम, करें नमन तुम्हे बार बार, श्रद्धा से शीश झुकाएं हम
हे नवजात शिशु ,हे अबोध बालक ....
इस सृष्टि में है तुम्हारा स्वागत
अभी नन्हे से तुम बालक हो
आओ तुम्हे दुलार दूँ मैं
भर दूँ झोली उपहारों से
माथा स्नेह से पुचकार दूँ मैं
सृष्टि की बगिया में तुम फूलो -फलों
सुख पाकर विकसित हो जाओ
सब की झोली भरो खुशियों से
सब का प्रेम पा मुस्काओ
सब शांत सुखी सम्पन्न रहे
तुम पर भी होगी ये जिम्मेदारी
आओ हम सब मिल जुल कर
नए साल का आदर सत्कार करें
दुःख अपनों के हम सारे ले लें और
सब के मन में स्नेह और प्यार भरे