Tuesday, 11 October 2011
मुख़्तसर नज्में
१
हाँ तुम एक मंदिर बनवा लो
और तुम एक मस्जिद बनवा लो
क्यूंकि तुम्हारे दिल के अंधेरों से
अल्लाह , भगवान् वो जो है
ऊब चूका है .........
उस को नया मकान चाहिए
२
बंदूकों, तलवारों, छुरियों को
कुछ दिन की छुट्टी दे दें
बारूदों के ढेर छुपा दें
दूर कहीं तहखानो में
मुस्कानों के गहने
फिर एक बार निकाले
शायद लौट ही
आयें बहारें
क्या ख्याल है?
करके देखें?
( अख्तर किदवई )
Sunday, 9 October 2011
फितरत
कई बार देखा है के कुछ लोग हर बात में है चीज़ में सिर्फ दुःख और दर्द ही नज़र आता है
बहुत ही नकारात्मक तरह का जीवन जीने की आदत हो जाती है,हमे क्या क्या मिला ये
सोचने की बजाए,सिर्फ ये सोचते है के हमे क्या नहीं मिला,ऐसे ही लोगों के लिए कुछ लाइन
लिख रही हूँ इस दुआ के साथ के ,वो जीवन के प्रति अपना नजरिया बदल ले और खुश रहना
सीख जाये!
कुछ लोगों को गम सहने की इतनी आदत होती है
खुशियाँ आकर दस्तक दें तो उनको दिक्कत होती है
आँसूं आहें और तड़प ये उनके साथी होते है
इन को पाल पोस कर रखना उनकी फितरत होती है
खुशियों के चंद पल भी उनको होते बर्दाश्त नहीं
ये सोच के भी वो रो लेते, के हम क्यूँ उदास नहीं
ऐसे लोगों के संग रहना किसी के बस की बात नहीं
वो जीवन बस कटा करते ,जीने में विश्वास नहीं
खुशियों की अमृत वर्षा , ईश्वर तो हर दम करते है
समझदार उसे पीते रहते और मुर्ख कहते, अभी प्यास नहीं.
Friday, 7 October 2011
छोड़ो जाने दो
कुछ खुशियाँ दे सकता था, लेकिन छोड़ो जाने दो!
क्या क्या कुछ हो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
महफ़िल-ऐ-कफ-ओ-मस्ती थी ,एक सपनो की बस्ती थी!
दिल उसमे खो सकता था, लेकिन छोड़ो जाने दो!!
रोते रोते रात गयी, रात गयी सो बात गयी!
सोने को सो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
वो चेहरे के दाग नहीं थे,दामन पर कुछ धब्बे थे!
छुप के कहीं धो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
जो खुद भी मासूम हो वो, मुझ पे पहला वार करे!
इतना कह भी सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
कुछ खुशियाँ दे भी सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!
क्या क्या कुछ हो सकता था,लेकिन छोड़ो जाने दो!!
Thursday, 6 October 2011
दिवाली
दिवाली की पावन बेला एक सहेली सी लगती है!
दिए की लौ देखो तो अधखिली कलि सी लगती है!!
बल्बों की सुंदर लड़ियाँ दिवाली के गजरे जैसे!
और लटकी कंदीलें, उसके माथे की बिंदियाँ लगती है!!
रंग बिरंगी रंगोली, उसकी चुनर के फूल हो जैसे!
छुटे जब फुलझड़िया, मुझको दिवाली हँसती लगती है!!
दिवाली की पावन बेला एक सहेली सी लगती है....
दिए की लौ देखो तो अधखिली कलि सी लगती है!!
लक्ष्मी पूजन जब होता तो, जैसे नमन करे दिवाली!
धृत क्रीडा होते देखे तो उसकी आँखें नम सी होती है!!
पीकर मदिरा कोई गिरे तो, चिंतित हो जाती दिवाली!
हाथ जले गर किसी बच्चे का, दिवाली रोती लगती है!!
खील-पताशे और मिठाई, उपहार दिवाली के लगते है!
स्नेह से सब मिल बैठे तो, दिवाली सजती लगती है!!
दिवाली की पावन बेला एक सहेली सी लगती है....
दिए की लौ देखो तो अधखिली कलि सी लगती है!!
अवन्ती सिंह
Wednesday, 5 October 2011
कभी हम ध्यान से शितिज की तरफ देखे तो धरती आकाश
मिलते हुए प्रतीत होते है और कोई कवि-मन तो उनके बीच के
वार्तालाप को भी सुन पता है,इसी तरह की एक वार्ता को कुछ
पंक्तियों मे सजा कर आप की नज़र कर रही हूँ.
रोज सुबह की तरह मैं आज भी उगते सुरज को निहार रही थी!
अचानक लगा ऐसे जैसे धरती आकाश को पुकार रही थी!!
हे! गगन हे! आकाश,फिर से अपनी बादल रुपी बाहें फैलाओ ना!
कई दिन से हो दूर दूर,आज फिर हृदय से लगाओ ना!!
जब तुम अपना स्नेह,जल के रूप मे बरसते हो!
तब तुम नव जीवन का मुझ मे संचार कर जाते हो!!
फिर मैं हरीतिमा की चुनर औड कर,करके फूलों से शृंगार!
अपने बालक रुपी जीवों मे बाँट देती हूँ, तुम्हारे सनेह से उपजे उपहार!!
हमारे इसी मिलन से निरंतर,चलता रहता है सृष्टि का कारोबार!!!
मिलते हुए प्रतीत होते है और कोई कवि-मन तो उनके बीच के
वार्तालाप को भी सुन पता है,इसी तरह की एक वार्ता को कुछ
पंक्तियों मे सजा कर आप की नज़र कर रही हूँ.
रोज सुबह की तरह मैं आज भी उगते सुरज को निहार रही थी!
अचानक लगा ऐसे जैसे धरती आकाश को पुकार रही थी!!
हे! गगन हे! आकाश,फिर से अपनी बादल रुपी बाहें फैलाओ ना!
कई दिन से हो दूर दूर,आज फिर हृदय से लगाओ ना!!
जब तुम अपना स्नेह,जल के रूप मे बरसते हो!
तब तुम नव जीवन का मुझ मे संचार कर जाते हो!!
फिर मैं हरीतिमा की चुनर औड कर,करके फूलों से शृंगार!
अपने बालक रुपी जीवों मे बाँट देती हूँ, तुम्हारे सनेह से उपजे उपहार!!
हमारे इसी मिलन से निरंतर,चलता रहता है सृष्टि का कारोबार!!!
Tuesday, 4 October 2011
मेरे बच्चे मेरे क्रिटिक्स
मैं जब भी कोई कविता लिखती हूँ तो वो ठीक बनी या नहीं ये जानने के लिए बच्चों को कविता सुना कर उनकी
प्रतिक्रिया से अंदाजा लगाने की कोशिश करती हूँ के सब को पसंद आएगी या नहीं,सच जानियेगा वो बड़ी जांच -परख करते है और काफी दोष निकलते है,कई सलाह भी देते है यहाँ ये ठीक नहीं,ऐसे लिखो,ये हटा दो,उनकी
मुझे दी जाने वाली सलाह और कुछ अपनी कल्पना से मैं ये ये कविता लिखने की कोशिश की है,कविता का शीर्षक है.
मेरे बच्चे मेरे क्रिटिक्स
हर कविता में एक नयापन चाहते है श्रोता,फिर हृदय-पटल पर उसे स्थान दे पाते है श्रोता!
कहा कवि ने एक ताज़ी कविता को लिखकर, अभी-२ लिखी है जरा डालिए तो एक नज़र !!
काम अभी तो बहुत है, कल परसों सुन लेगे,कम करते हो गलतियां अब तो,उँगलियों पर गिन देगे!
फिर बैठ कर आराम से गलतियां सुधर लेना,जहाँ -२ हम कहे दो चार नए शब्द भी ड़ाल देना!!
एक कमी और है आप में, कोमा, फुलस्टाप कम लगते हो जो मन में आये बस लिखते ही जाते हो!
जरा तो पढने वालों के बारे में सोचा कीजिये, कविता पढने वालों पर प्लीज़ इतना जुल्म न कीजिये!!
कविता पढने में हमे आनन्द भी तो आना चाहिए,जो रोचक/मनभावन हो वहीँ विषय उठाना चाहिए!
कविता अगर न भाये तो आखिर कब तक सुन पायेगे,बना कोई न कोई बहाना इधर-उधर हो जायेगे!!
अरे अधिक निराश नहीं होना,कभी-2 ठीक भी लिखते हो,कुछ कविताएं उम्दा है कुछ अच्छे गीत भी लिखते हो
कुछ कथा/साहित्य रोज पढ़ा कीजिये उससे बढ़ता ज्ञान है,करत करत अभ्यास के ही जड़मति होत सुजान है!!
लिखते हुए आप को अभी तो दिन हुये ४ है,व्यर्थ की चिन्ता करो नहीं चिन्ता करना बेकार है!
आगे अब क्या कहे आप खुद ही समझदार है,आप ने पूछा इस लिए हम ने किये व्यक्त विचार है!!
प्रतिक्रिया से अंदाजा लगाने की कोशिश करती हूँ के सब को पसंद आएगी या नहीं,सच जानियेगा वो बड़ी जांच -परख करते है और काफी दोष निकलते है,कई सलाह भी देते है यहाँ ये ठीक नहीं,ऐसे लिखो,ये हटा दो,उनकी
मुझे दी जाने वाली सलाह और कुछ अपनी कल्पना से मैं ये ये कविता लिखने की कोशिश की है,कविता का शीर्षक है.
मेरे बच्चे मेरे क्रिटिक्स
कहा कवि ने एक ताज़ी कविता को लिखकर, अभी-२ लिखी है जरा डालिए तो एक नज़र !!
काम अभी तो बहुत है, कल परसों सुन लेगे,कम करते हो गलतियां अब तो,उँगलियों पर गिन देगे!
फिर बैठ कर आराम से गलतियां सुधर लेना,जहाँ -२ हम कहे दो चार नए शब्द भी ड़ाल देना!!
एक कमी और है आप में, कोमा, फुलस्टाप कम लगते हो जो मन में आये बस लिखते ही जाते हो!
जरा तो पढने वालों के बारे में सोचा कीजिये, कविता पढने वालों पर प्लीज़ इतना जुल्म न कीजिये!!
कविता पढने में हमे आनन्द भी तो आना चाहिए,जो रोचक/मनभावन हो वहीँ विषय उठाना चाहिए!
कविता अगर न भाये तो आखिर कब तक सुन पायेगे,बना कोई न कोई बहाना इधर-उधर हो जायेगे!!
अरे अधिक निराश नहीं होना,कभी-2 ठीक भी लिखते हो,कुछ कविताएं उम्दा है कुछ अच्छे गीत भी लिखते हो
कुछ कथा/साहित्य रोज पढ़ा कीजिये उससे बढ़ता ज्ञान है,करत करत अभ्यास के ही जड़मति होत सुजान है!!
लिखते हुए आप को अभी तो दिन हुये ४ है,व्यर्थ की चिन्ता करो नहीं चिन्ता करना बेकार है!
आगे अब क्या कहे आप खुद ही समझदार है,आप ने पूछा इस लिए हम ने किये व्यक्त विचार है!!
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