Tuesday, 29 November 2011

तुम को ढूंढा है

हर      सुबह     हर    शाम    तुम   को   ढूंढा है 
 हमने,  उम्र     तमाम      तुम   को     ढूंढा    है 



हर   शहर    की      ख़ाक      छान     मारी     है 
कभी छुप के ,कभी सरे आम   तुम   को  ढूंढा है 



हर फूल,हर कली ,को  बताया  है   हुलिया    तुम्हारा  
चेहरे का हर एक निशाँ ,करके ब्यान ,तुम को ढूंढा है

  

छुपे हो जरुर तुम  किसी  और लोक में, वरना   तो 
ज़मी सारी छानी ,फिर  आसमान पे, तुम को ढूंढा है 

Monday, 28 November 2011

कविता


कविता, ये    कविता   आखिर  क्या  होती  है !

तेरे और मेरे जीवन की इसमें छुपी व्यथा होती है!!

कभी तो हंसती, मुस्काती, कभी ये बार बार रोती है!

पावँ में  इस के कभी है छाले,कभी रिसते घाव  धोती है!!

कविता, ये  कविता आखिर क्या होती है .............. 

मन की तड़प  छुपा लेती और बीज ख़ुशी के ये बोती है!

सपन सलोने हम को देती,पर क्या कभी खुद भी सोती है!!

कविता,  ये  कविता आखिर क्या  होती है............ 

उम्मीदे न टूटे हमारी, सदा ये यत्न प्रयत्न करती  है !

न उम्मीदी की कई गठरियाँ, ये चुपके चुपके  ढ़ोती है!! 

 कविता, ये  कविता आखिर  क्या होती है....



Saturday, 26 November 2011

जिंदगी

आज फिर तेरे एक शुष्क पहलु  को देखा जिंदगी 
अश्रु-जल आँखों में   थे, बहने  से  रोका  जिंदगी  

हर इंसान की उम्मीद को, तू क्यूँ देती धोका जिंदगी?
क्यूँ  तुझे  हर कोई,  अच्छा   लगे   है रोता,  जिंदगी ?

क्यूँ तू  इतनी कठोर   है,पत्थर  सी  लगती जिंदगी ?
क्यूँ कोई   स्नेह -अंकुर  तुझ  में   ना  फुटा जिंदगी ?

हर  क्षण    ,हर   पल   तू   दर्द   सब     को   दे   रही
काश ,कभी   कोई तेरा   अपना    भी  रोता   जिंदगी 

सदा बन ,कराल-कालिका तू मृत्यु   का    नर्तन   करे
काश  कोई  शिव आ  के तुझ   को  रोक   लेता जिंदगी

 

 

Friday, 25 November 2011

तैयार रहो




बहुत   कठिन    सफ़र   पे   जाना   है ,    तैयार    रहो  
कई पथ्थरों   ने   राह    में    आना   है    तैयार    रहो

 अभी    चाहो   तो   कदम   पीछे  हटा   भी सकते    हो 
चल      पड़ोगे तो    मंजिल  को  पाना   है    तैयार  रहो

रुके  तो   मन  पछतायेगा,  कोसोगे    सदा    खुद    को  
मंजिल   पर पहुचे  तो ठोकर में जमाना  है   तैयार  रहो 




              नव-जीवन 

इन    सूखे      पत्तों      की    हरियाली      अब     खो   चुकी    है 
अब     कुछ      दिन    और      बचे      है     इन       के         पास

कुछ      दिनों     में       ये     सुखेगे    ,   टूटेगे  ,   गिर      जायेगे 
क्या      फिर      ये    परम        शांति           को       पा       जायेगे?

या  जमीन के किसी   कोने   में    पड़े      चिखेगें  ,    चिल्लायेगे   के  
हमे   तो   अभी     भी   पेड    की   वो    कोमल      डाली      भाती   है

डाल   पर   वापस  जा  लगें  ,  ये   इच्छा    रोज   बढती   जाती   है\
अब कौन समझाये  इन   पत्तों को, के   सृष्टि के   नियम   से चलो

टूटने के बाद ,पहले धरती में मिलो,गलों और फिर किसी नव-अंकुर 
की नसों में  बनके  उर्जा बहों , उस   के प्राणों  का  एक  हिस्सा  बनो

तब कहीं  तुम   दोबारा  पत्ते    बनने     का  अवसर   पा    सकते    हो 
वरना तो यूँ ही इस  कोने  में पड़े पड़े बस  रो सकते हो चिल्ला सकते हो. 

Wednesday, 23 November 2011

बादल

ये    बादल   क्यूँ   यूँ    आवारा    फिरते    है?  क्या   इनका   कभी,  कहीं 
 ठहरने का  मन नहीं  करता?  कोई   घर  नहीं  जंचता  इन्हें  अपने   लिए 


किसी   पहाड़    की  कन्दरा   में    कुछ   दिन    रुक   कर या  किसी आंचल 
की छाँव में ठहर ,अंतहीन सफर की थकान मिटाने की  इच्छा  नहीं   जगी ?


शायद ये   इच्छा   तो  जरुर  जागी   होगी   इन   के  मन   में , लेकिन
पता भी  है  अपनी  मज़बूरी  का , के  कहीं  पर   अधिक   ठहरने    की

इजाजत नहीं है ,मोह के बन्धन   बाँध  कर   अपने    कर्म  का  निर्वाह 
करना कितना मुश्किल होगा ,ये   समझ   आता   है   शायद   इन  को 


अपने   अरमानों   की   लाश   उठाये   ये  निरंतर   चलते  रहते  होगें
ताकि   किसी   के  सूखते   अरमानों   को   अपनी   नमी से सींच सके 

"आवारा बादल"  कह    कर  कोई   भी   ना   करे    अपमान    इनका 
ये तो कर्म योगी है जो खुद को तप की  अग्नि  में तपा कर,सब के जीवन 
 में प्राणों का   संचार करते   है ,खुद को मिटा,  हम सब का उद्धार करते है







Monday, 21 November 2011

प्रकृति और नारी

मैं हवा हूँ ,मुझे बाँध सके कोई 
इतनी बिसात कहाँ है किसी में 
बाँधने वाले को भी साथ उड़ा कर ले
ले जा  सकती    हूँ  मैं  .......

दहकती  ज्वाला हूँ   मैं......
मेरा   सम्मान करने वाले
मुझ    से   जीवन  पाते  है
बाकि सब मेरी धधकती लपटों 
 में जल कर खो  जाते   है  ...

कल कल कर बहता नीर भी मैं  हूँ
चाहूँ तो प्यास बुझा  दूँ ,जग की
चाहूँ  तो सब को  बहा  ले  जाऊं  
जीवन और मृत्य ,मेरे ही पहलु है



धैर्य   से   टिकी    धरा   हूँ   मैं 
तुम्हारे हर   कर्म को,  व्यवहार को  
चुपचाप  सहती हूँ ,शांत     रह  कर
पर मेरी जरा सी कसमसाहट 
तुम्हारे  मन  और जीवन में 
भूचाल भी    ला  सकती   है  

अपनी   विशालता   में   सब    को 
समेटे ,आकाश हूँ, सब पर स्नेह -जल
बरसा कर नव-जीवन का संचार करूँ
अत्याचार  अधिक  बढ़े   तो  ,प्रकोपित
बिजलियाँ   गिरा, विनाश   भी  करूँ 

मेरा नाम प्रकृति है या नारी, ये आप ही
निर्णय कीजिये ,हम जुड़वाँ बहनों सी ही 
तो है ,बहुत अधिक अंतर नहीं होगा शायद 
हम दोनों में ,क्या  ख्याल  है इस बारे में ??