Thursday, 1 December 2011

बातें करतें है

वो जब मुझ को ना देखें तब  भी  , नजर क्यूँ   बार   बार   झुकती है ?
ह्या की लाली आके गालों  पर ,उनके    तकनें    की   राह  तकती  है

दिल में तो लाखों बातें चलती है ,जुबां तक आ  के फिर  क्यूँ रूकती है
धडकने तेज होती जाती है ,दिल     में   एक पीर   सी   भी   उठती  है

होठ थरथराते है, चुप ही  रहतें है ,उन के आगे हम 'बुत' ही रहते है
साँसें  चलना भी भूल जाती है ,नज़रें  धरती में   गड सी   जाती   है

मैं उन की खामोशियों को सुनती हूँ,वो मेरी खामोशियों को   सुनते है
रात भर नींद अब आती ही नहीं, दिन भर अब ख्वाब ,ख्वाब बुनते है

बात गर हम शुरू कर भी दें तो , दुनिया, जहाँ   की  बातें    करते  है
कौन कैसा है ,वो तो वैसा है, जाने कहाँ   कहाँ   की   बातें    करते है

अपनी बातों की बात छोड़ कर हम , धरती आसमाँ की बातें करते है
जो जरूरी है वो तो रह ही जाता है ,और हम यहाँ वहां की बातें करते है

अब जो मिलना हुआ तो कह देगें ,आओ   अब   अपनी  बातें   करते है
कैसे कटते  है दिन तुम्हारे बिन,उन , सुबह-शामों  की  बाते   करते  है......
 







Wednesday, 30 November 2011

एक वोह ज़िन्दगी से प्यारा जो

एक वोह ज़िन्दगी से प्यारा जो
एक  मैं  ज़िन्दगी  से   हारा   जो.

तुम हो जो ख्वाब ख्वाब जीते हो
मैं तो वोह, सारे ख्वाब हारा जो.

ले   गया  लुट कर     मेरा   सूरज
नाकसो कस  का था सहारा जो.

वोह भी अब रौशनी से डरता है
था कभी सुब्ह का सितारा  जो.

आज भी उसके आसरे हैं आप
आज भी    बेकसों    बेचारा जो.

मैं न कहता था वोह किसी का नहीं
कभी    मेरा   कभी   तुम्हारा   जो.

(नाकसो  कस = each and every body)

   --------- akhtar किदवाई

Tuesday, 29 November 2011

तुम को ढूंढा है

हर      सुबह     हर    शाम    तुम   को   ढूंढा है 
 हमने,  उम्र     तमाम      तुम   को     ढूंढा    है 



हर   शहर    की      ख़ाक      छान     मारी     है 
कभी छुप के ,कभी सरे आम   तुम   को  ढूंढा है 



हर फूल,हर कली ,को  बताया  है   हुलिया    तुम्हारा  
चेहरे का हर एक निशाँ ,करके ब्यान ,तुम को ढूंढा है

  

छुपे हो जरुर तुम  किसी  और लोक में, वरना   तो 
ज़मी सारी छानी ,फिर  आसमान पे, तुम को ढूंढा है 

Monday, 28 November 2011

कविता


कविता, ये    कविता   आखिर  क्या  होती  है !

तेरे और मेरे जीवन की इसमें छुपी व्यथा होती है!!

कभी तो हंसती, मुस्काती, कभी ये बार बार रोती है!

पावँ में  इस के कभी है छाले,कभी रिसते घाव  धोती है!!

कविता, ये  कविता आखिर क्या होती है .............. 

मन की तड़प  छुपा लेती और बीज ख़ुशी के ये बोती है!

सपन सलोने हम को देती,पर क्या कभी खुद भी सोती है!!

कविता,  ये  कविता आखिर क्या  होती है............ 

उम्मीदे न टूटे हमारी, सदा ये यत्न प्रयत्न करती  है !

न उम्मीदी की कई गठरियाँ, ये चुपके चुपके  ढ़ोती है!! 

 कविता, ये  कविता आखिर  क्या होती है....



Saturday, 26 November 2011

जिंदगी

आज फिर तेरे एक शुष्क पहलु  को देखा जिंदगी 
अश्रु-जल आँखों में   थे, बहने  से  रोका  जिंदगी  

हर इंसान की उम्मीद को, तू क्यूँ देती धोका जिंदगी?
क्यूँ  तुझे  हर कोई,  अच्छा   लगे   है रोता,  जिंदगी ?

क्यूँ तू  इतनी कठोर   है,पत्थर  सी  लगती जिंदगी ?
क्यूँ कोई   स्नेह -अंकुर  तुझ  में   ना  फुटा जिंदगी ?

हर  क्षण    ,हर   पल   तू   दर्द   सब     को   दे   रही
काश ,कभी   कोई तेरा   अपना    भी  रोता   जिंदगी 

सदा बन ,कराल-कालिका तू मृत्यु   का    नर्तन   करे
काश  कोई  शिव आ  के तुझ   को  रोक   लेता जिंदगी

 

 

Friday, 25 November 2011

तैयार रहो




बहुत   कठिन    सफ़र   पे   जाना   है ,    तैयार    रहो  
कई पथ्थरों   ने   राह    में    आना   है    तैयार    रहो

 अभी    चाहो   तो   कदम   पीछे  हटा   भी सकते    हो 
चल      पड़ोगे तो    मंजिल  को  पाना   है    तैयार  रहो

रुके  तो   मन  पछतायेगा,  कोसोगे    सदा    खुद    को  
मंजिल   पर पहुचे  तो ठोकर में जमाना  है   तैयार  रहो 




              नव-जीवन 

इन    सूखे      पत्तों      की    हरियाली      अब     खो   चुकी    है 
अब     कुछ      दिन    और      बचे      है     इन       के         पास

कुछ      दिनों     में       ये     सुखेगे    ,   टूटेगे  ,   गिर      जायेगे 
क्या      फिर      ये    परम        शांति           को       पा       जायेगे?

या  जमीन के किसी   कोने   में    पड़े      चिखेगें  ,    चिल्लायेगे   के  
हमे   तो   अभी     भी   पेड    की   वो    कोमल      डाली      भाती   है

डाल   पर   वापस  जा  लगें  ,  ये   इच्छा    रोज   बढती   जाती   है\
अब कौन समझाये  इन   पत्तों को, के   सृष्टि के   नियम   से चलो

टूटने के बाद ,पहले धरती में मिलो,गलों और फिर किसी नव-अंकुर 
की नसों में  बनके  उर्जा बहों , उस   के प्राणों  का  एक  हिस्सा  बनो

तब कहीं  तुम   दोबारा  पत्ते    बनने     का  अवसर   पा    सकते    हो 
वरना तो यूँ ही इस  कोने  में पड़े पड़े बस  रो सकते हो चिल्ला सकते हो.