Friday, 6 January 2012

बैठे है

खुद को जाने कितने ही पर्दों में वो  छुपाये बैठे है 
और फिर चेहरे पर एक मुखौटा भी लगाये बैठे है  

कैसे समझेगे और कैसे जानेगे हम,के क्या है वो 
झांकती  हैं जो मुखौटे से,वो आँखें भी झुकाए बैठे है 

हाथों के  इशारे  से  भी  तो कुछ   समझाते  नहीं है 
और  होठों   पर    भी   चुप के  ताले  लगाये  बैठे है 

कब तलग न खोलेगे वो राज़ अपना ,कभी तो हद होगी 
उसी हद की आस में ,सर को उनके दर पे झुकाए बैठे है


Thursday, 5 January 2012

नौ महीने तक गर्भ में माँ बच्चे का बोझ उठती है 
अपनी छाती से चिपका कर अमृत पान कराती  है 


खुद   गीले    सोती   है ,   सूखे   में  उसे   सुलाती   है
उस की सुविधा की खातिर सब दुविधाएं सह जाती है


पर बेटे जब बूढी माँ  संग चल  ना  पायें  चार कदम
अक्षर के आदेशों को करती जब   अस्वीकार कलम 


तब खुलते है गाँव ,गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम 
तब खुलते है गाँव ..........


बाप पकड  कर ऊँगली, बेटे को चलना सिखलाता है 
जब बेटा थक जाये तो  झट   काँधे  पर उसे उठता है 


भालू घोड़ा बंदर बन कर उस का  मन  बहलाता है
और बेटे का बाप कहा कर , मन ही मन इठलाता है 


वही बाप जब बुढ़ापे में लगता  है   नाकारा  बेदम 
आधुनिकता ढक देती है जब आँखों की लाज शर्म

तब खुलते है गाँव गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम 
तब खुलते है......


बेटी पर दामाद का हक़ है ,और बेटों  पर   बहुओं  का 
अपनी पूंजी अपनी सम्पत्ति पर अधिकार है गैरों का 


पौधों को पानी देना   है,   क्या   अपराध   बुजुर्गों    का
आखिर क्या उपचार     ऐसे    माँ     बापों    के दर्दों का 


पथ्थर को पिघला ना पाए जब दो  जोड़ी   आँखें   नम
आशीर्वादों की धरती  पर   तब    लेते   है    श्राप जन्म 

तब खुलते है गाँव ,गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम 
तब खुलते है गाँव गली और नगर नगर में........

जिन के खातिर माँ ने  मंदिर मंदिर मन्नत मांगी थी 
जिस को गोदी में लेकर वो रात रात   भर जागी थी 


पढ़ा लिख कर पिता ने जिससे कुछ आशाएं बाँधी थी 
जिस पर अंध भरोसा कर के हाथ की लकड़ी त्यागी थी 


जीवन संध्या में जब   वो   ही   दे   दें   तन्हाई का गम 
तानपुरे को बोझ लगे जब उखड़ी   साँसों   को   सरगम
तब खुलते है गाँव गली .........

यौवन के मद में जो भी माँ बाप के   मन  को  दुखायेगे
वो   खुद   भी    अपनी   संतानों    से  ठुकराए   जायेगे 

अलग पेड़  से   होकर,   दम्भी    फूल    सभी   मुर्झायेगे 
एक दिन आएगा वो   अपनी   करनी   पर    पछतायेगे


सूरज को पी जाने को   जब   आतुर   हो   जाता  है तम 
तिनके को जब हो जाता  है   ताकतवर   होने   का भ्रम

जब  फूलों   में   हो   जाता   है  डाली के  प्रति आदर कम
गुलशन की आँखों में खटके  जब जब पतझड़ के मौसम 
तब खुलते है गाँव ,गली और नगर नगर में वृद्धाश्रम ......
( Dr. कविता किरण )


 



 









Tuesday, 3 January 2012

नई भोर

फिर एक नई  भोर  में ,  हे   दिवाकर  तुम्हारा   स्वागत है
स्वागत है आदित्य तुम्हारा ,हे भास्कर तुम्हारा स्वागत है 
हे प्रभाकर, हे विभावशु,  हे दिनकर तुम्हारा    स्वागत   है  
हे सह्स्त्रांशु , हे त्रयोमुर्ती,    हे  सूर्य  ,  तुम्हारा  स्वागत है 
तुम अपनी सौम्य रश्मियों से हमे सौम्यता,शान्ति प्रदान करो 
भर दो उर्जा मन में अद्धभुत,   हमे  अपने   तेज  का दान करो 
आकर पावन दर्श  तुम्हारा  खुद  को   पावन   कर   जाये हम
ज्योतिर्मय करे तन को मन को ,तिमिर  को    दूर   भगाए   हम 
अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करो ,खुद   प्रकाशित   हों ,जग प्रकाशित कर 
 जाये हम, करें  नमन तुम्हे  बार   बार, श्रद्धा    से     शीश    झुकाएं    हम
 






Sunday, 1 January 2012

नव वर्ष 2012

हे नवजात शिशु ,हे अबोध बालक ....
इस सृष्टि में है तुम्हारा स्वागत 

अभी नन्हे से तुम बालक हो 
आओ   तुम्हे   दुलार   दूँ  मैं

भर   दूँ    झोली उपहारों से 
माथा स्नेह से पुचकार दूँ मैं 

सृष्टि  की बगिया में तुम फूलो -फलों
 सुख पाकर विकसित  हो जाओ 

सब की झोली भरो खुशियों से 
सब   का    प्रेम   पा मुस्काओ 


सब शांत सुखी सम्पन्न  रहे 
तुम पर भी होगी ये जिम्मेदारी 

आओ हम सब मिल जुल कर 
नए  साल का आदर सत्कार करें 


दुःख अपनों के हम  सारे ले लें और 
सब के मन में स्नेह  और प्यार भरे 








 

Friday, 30 December 2011

आप को मुझ से बहुत प्यार है .....

आप ने मुझे बनाया है ,आप को तो पता है मेरी पसंद और नापसंद के बारे में 
पर ऐसा क्यूँ है के कुछ चीजे ऐसी बनाई आप ने जो मुझे पसंद नहीं ?
आप ने खुशियाँ बनाई मेरे लिए ,पर दुःख किस के लिए बनाये थे ?
आप ने हंसी तो बनाई मेरे लिए ,पर आंसू किस लिए बनाये थे 
आप ने प्यार बनाया मेरे लिए ,पर नफरत किस लिए बनाई?
आप ने फूल बनाते हुए मेरे ही बारे में सोचा होगा,पर कांटे तो नहीं चाहिए मुझे 
आप ने मिलन बनाया वो सुखद लगता है,पर जुदाई के पल नहीं सहने है मुझे 
आप ने जीवन बनाया उस से मुझे बेहद प्यार है,पर डर लगता है मरने के ख्याल से
किस लिए ,किस लिए बनाईआप ने वो चीजे जो मुझे   पसंद ही  नहीं  है ?
सोचती रही ,हर दिन हर पल ,सताता   रहा   ये  सवाल  मुझे  हमेशा  ही 
जीवन के दिन, महीने, साल बीतते ही रहे इस सवाल के बोझ को ढ़ोते हुए 
फिर जीवन के अनुभव इन सवालों के जवाब चुपके से में कान में बता गए 
खुशियों की कीमत दुःख के बाद ही समझ आती है 
जुदाई ही मिलन का महत्व समझाती है 
फूलों को   कांटे  ही   सम्भाले   रखते  है 
जीवन की थकन को  मृत्यु ही उतार पाती है
समझ गयी हूँ भगवन अब मैं समझ गयी हूँ 
आप ने सब कुछ मेरे ही लिए बनाया ,मुझे  हर   चीज  की  जरूरत  है 
पर मैं से सब अपनी नजर से देखा ,काश आप  की  नजर से देख पाती 
तो ये पंक्ति मैं पहले ही दोहराती ,आप कभी कुछ गलत नहीं कर सकते 
आप को मुझ से  बहुत प्यार है ,आप  को मुझ से   बहुत  प्यार है .....

Wednesday, 28 December 2011

घुमती है जिंदगी

मुस्कराहट उधार की, ओढ़े  घुमती  है जिंदगी 
झूठ के आईने में सच   को  ढूँढती है   जिंदगी 

पाँव में छाले हजारों, दर्द से कराहती  है,और 
 रोजाना  ही  नए नृत्य में झूमती है   जिंदगी 

दिल की गहराई में सन्नाटा है और  तन्हाई  है 
और बन कर महफिले बहार घुमती है जिंदगी 

सांस थम जाये तो आ जाये  इस   को  भी करार 
पूरी उम्र से यूँ ही बेचैन ,बेकरार घुमती है जिंदगी  

Tuesday, 27 December 2011

ख़त एक तुम को लिखने का मन है

ख़त एक  तुम को लिखने का मन है  भगवन
क्या पता  है     तुम्हारा? किस   धाम   लिखूं ?
मन्दिर  में हो?गिरिजा  में हो? या मस्जिद में पैगाम लिखूं ?
तुम नाम भी अपना बतला दो ,राम लिखूं या रहमान लिखूं?

धरती, अम्बर सूरज लिख दूँ या सुबह लिखूं या शाम लिखूं ?
कह कर तुम को अल्लाह पुकारूँ या जगन्नाथ भगवान लिखूं 

तुम महावीर हो या नानक हो तुम? पर हम सब के पालक हो तुम 
निवास निर्धारित है क्या तुम्हारा? गीता में हो? या  कुरान  लिखूं? 
किस देश में हो?किस   वेश में हो?  किस   हाल     में?   परिवेश     में    हो ?
किसी पथ्थर की मूर्त में हो या काबे की सुरत में हो?या गुरुग्रंथ स्थान लिखूं?
तुम निराकार  हो या साकार हो तुम ? एक हो  या  अनेक  प्रकार  हो तुम ?  
रुक्मणी के   महल   में   रहते हो? या   मीरा   का   ग्राम     स्थान   लिखूं?
ख़त     एक    तुम      को     लिखने     का     मन     है     भगवन

क्या पता  है     तुम्हारा? किस   धाम   लिखूं ?..............