तुम कब तक नकारते रहोगे मुझे
मेरे उस अस्तित्व को ,जो कब का
तुम में विलीन हो चूका है ......
और तुम मेरे होने ,न होने को सिर्फ
मेरे जिस्म की उपस्तिथि से आँक रहे हो
झांको खुद में ,और देखो ,मैं तो तुम्हारे
हृदय के सिघासन पर विराजमान हूँ
और तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व ने स्वीकार
कर लिया है मेरे साम्राज्य को ....
सिवा तुम्हारे..........
(अवन्ती सिंह)
अभी तीर और चला ऐ जिंदगी
अभी सांस मेरी थमी नहीं
लडखडा तो गए है कदम मगर
अभी पाँव ने छोड़ी जमी नहीं
अभी मेरी पीठ में, खंज़र कुछ
और समा सकते है, ना रुक
कहर और बरपा ऐ जिंदगी
मुझ में हौसलों की कमी नहीं
(अवन्ती सिंह)
जिंदगी आ तुझे शब्दों में आज ढाला जाये
दिल की हसरतों को सभी, आज निकला जाये
आसूं पौंछ दिए जाएँ हर नम आँख से और
हर एक भूखे के पेट तक आज निवाला जाये
दिल और जिस्म के हर ज़ख्म पर लगे मरहम आज
दुःख और दर्द को दे दिया आज देश निकला जाये
दी जाये एक मुस्कान ,तोहफे में किसी मायूस को
बन के हमदर्द, किसी बेबस को सम्भाला जाये
कभी ना देखी हो खुशियों की रौशनी जिस ने ,उस के लिए
सूरज की किरणों से आज लिया छीन, उजाला जाये
आओ खोलें आज मिल कर , हम सब मधुशाला स्नेह की
जहाँ से हर एक प्यासे के होठो तक, पंहुचा दिया एक प्याला जाये
(अवन्ती सिंह)
तमाम उम्र ढूंढे उसके कदमो के निशां,दश्त -ओ-सहरा में
पर वक्त की तेज आंधी ने तो वो सब मिटा दिए थे ......
मर ही जाते हम,मगर बड़ा हौसला दिया उन्होंने
तेरे दिए कुछ फूल जो किताबों में छुपा दिए थे .........
(दश्त -ओ-सहरा= मैदान और मरुस्थल )
(अवन्ती सिंह )
मेरे हरीफ़ों ने कोशिश तो लाख की मगर
मैं एक दीया था खुदा का जलाया हुआ
कितने उठाये तूफ़ान ,पर मेरी लौ भी ना हिली
मुझ में था नूर किसी और का समाया हुआ
हरीफ़ों =विरोधियों
=============
(अवन्ती सिंह)
शाम को आज अलाव जला कर , सब इर्दगिर्द बैठ जायेगे
रेवड़ियां,मूंगफली और मक्की के फुल्ले,बांटेगे और खायेगे
मकर संक्रांति का ये पर्व मन में नव उत्साह भर जाता है
कोई सजाये रंगोली से घर ,तो कोई पतंग उडाता है
उत्तर भारत में इस पर्व को कुछ इस अंदाज से मनाते है
बहन बेटियों के घर ,खिचड़ी,पकवान और नव वस्त्र पहुचाते है
करके पवित्र नदियों में स्नान ,सूर्य के आगे नत मस्तक हो जाते है
कहीं -2 ,घर के बुजुर्गों को नव वस्त्र के दे उपहार आदर सम्मान जताते है
रात को बैठ अलाव की आग के आगे , सब संग हँसते बतियाते है
आपस के मन मुटाव को अग्नि की भेट चढाते , खुशियाँ मनाते है
तुम्हारे सूखे,प्यास से भरे हुए होंठ ,मैं देख नहीं पाती हूँ
मैं पी जो रही हूँ जिंदगी के जाम भर भर के .........
तुम्हारे पेट की भूख का अहसास भी नहीं हो पाता मुझ को
मेरे फ्रिज में भरा रहता है सामान ,मेरी शाही भूख को मिटने के लिए
तुम्हारे जिस्म की हड्डियां कैसे कांप जाती होगी तेज़ ठंड से ये मैं क्या जानू
सर्दियां मुझे तो एक उत्सव सी प्रतीत होती है ,महंगे और गर्म कपडे खरीदने
और रोजाना उन्हें बदल बदल कर पहनने का उत्सव .............
हाँ कभी कभी खुद को अच्छा इंसान साबित करने की होड़ में ,मैं भी आती हूँ तुम्हारी
गन्दी बस्ती में. कुछ पुराने कपडे, कुछ पैसे और कुछ ब्रेड के पैकेट लेकर
वो सामान तुम्हारे लोगों में बांटे हुए मैं फोटो खिचवाना कभी नहीं भूलती हूँ ..........
आखिर वो फोटों ही तो प्रमाणपत्र होते है ,मेरे सवेदनशील होना का .................
और फिर , पार्टीस में उन कपड़ों और ब्रेड के पैकेटों की संख्या से भी अधिक बार, मैं दिखाती हूँ
वो फोटो ,जिन में मैं करुणा की देवी नजर आती हूँ , मन ही मन खुद को खूब सराहती हूँ ......
रात को अपने नर्म मुलायम बिस्तर में लेटते हुए मैं गहरी साँसें लेते हुए सोचती हूँ,इन गरीब लोगों
की गरीबी का अहसास भले ही मुझे ना हो ,नहीं पता ये कितनी तकलीफ में जिंदगी गुज़ार रहे है
पर हम भी रहम दिल लोग है ,सवेद्नाएं है हमारे पास भी ...................
आज इंसान होने का फर्ज़ तो पूरा किया है मैं ने,सब ने कितना सराहा मुझे.....