Tuesday, 6 December 2011

करके  अहसान  किसी  पर,  अगर  जता  भी   दिया
तो फिर वो अहसान  कैसा, किया, किया,  ना  किया

रहो   खामोश,   अगर        दर्द   किसी    का     बांटो 
करोगे चर्चे तो फिर गम हल्का,किया,किया ना किया 


तजुर्बे,    जिन्दगी   की   राह   में   गर  काम  ना  आये 
तो फिर वो खाक तजुर्बा   था,किया,  किया,   ना किया

तुम्हारी    हसरतों    पर  गर   पकड रही   ना तुम्हारी
जिया तो जीवन तुम ने,मगर जिया, जिया,  ना जिया


किसी   की   आँख   के आंसू ,  अगर  तुम पौंछ ना पाए 
सजदे   में  सर   खुदा   के ,   दिया,   दिया,    ना   दिया 


सफाई    दिल   की कालिख की अगर तुम कर नहीं पाए
स्नान  गंगा      में   जाकर,  किया,   किया,   ना   किया 


तुम्हारे    घर   में   ही   गर  तुम  पे  उठ  रही है उंगलियाँ
सलाम  दुनिया   ने   तुम   को,  किया,   किया,  ना किया 


पुकारे  जब   भी   धरती   माँ,  तो   उठ  चलना   हुंकार  के
कहेगी  वरना  ये धरा,  जन्म इस ने लिया,लिया,ना लिया

Monday, 5 December 2011

अखतर जी की ४ कविताओं की अनोखी श्रृंखला

                    
    असतो  मा

  निर्बंध कुछ भी नहीं है शायद.
एक व्याकरण है
तुम्हारी भावनाओं में भी !
कभी कभी तो,
कारण-कार्य सम्बन्ध से अधिक शक्तिशाली  लगता है
आवश्यकता और आविष्कार का सीकरण,
हमारे संबंधों में भी.
और फिर,
दर्द भी तो नहीं होता है
कभी
खाल के नीचे
हम दोनों में से किसी को.
आओ, हम भी
अपनी खालें बदलना सीख लें.
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                                       मृत्योर्मा

छोड़ो भी,
अब तो वह बात पुरानी है.
हाँ था,
वह भी एक समय था अपने जीवन में .
तब मैं मैं था,
तब तुम तूम थे .
और हम दोनों,
एक अनूठे 'हम' के भाग बने रहते थे.
लगता था बस यह जीवन है,
लगता था बस स्वर्ग यही है.
लेकिन छोड़ो
 यह बातें तो
गुज़रे बीते उस कल की हैं
जिसका परमानेंट एड्रेस
कभी किसी के हाथ न आया.
आज तो मैं भी
उस 'मैं' से बिलकुल ही अलग कोई सा मैं हूँ,
जिसके जाने कितने क़िस्से,
कितने   'हम' का भाग बने बिखरे से पड़े हैं.
और तुम भी तो,
जाने कौन सा 'मैं' बन कर अब
जाने किस या कितने 'हम' में जुड़ से गए हो.
छोड़ो अब वोह पुरानी बातें.
अब तो वोह कल बीत चुका है.
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                                                जाड्यो मा
मैं क्या जानूं उपवन में,
कलियों के चटखने की भाषा को,
दूर पहाड़ों के झरनों की गति जैसा संगीत कभी
मेरे कानों में कब घोल सकी
 मादक मुस्कान किसी की.
समीकरण मधुभरे तुम्हारे नयनों की चंचल चितवन का,
घर की अंगनाई में उतरती,
पौषप्रात की धूप की गर्म उजियारी से क्या है,
मैं क्या जानूं.
मेरे घर के गंदे से गुलदान में ठूंसे
फूल प्लास्टिक के,
खा रहे धुल न जाने कब से .
मेरे घर में कभी कभी ही तो नल में पानी आता है.
मेरे कमरे में एक अंधा बल्ब जला करता है दिन भर.
(दिन भर तो क्या,
दिन भर में जब भी बिजली आती है)
मेरे घर में तो गर्मी होती है,
बस चूल्हे से या ग़ुस्से से.
मैं न समझ पाऊँगा यह उपमाएं .
इस भाषा को सीख सकूं
इतना मेरा सामर्थ्य कहाँ  है.
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                      तमसो  मा

अन्धकार,
घोर गहन और निस्सीम,
क्रूर भयानक अन्धकार.
अट्टहास में डूबी हुई है जिसकी नीरवता,
अन्तास्राल में खो सा गया है जिसका हर छोर.
सब कहते हैं ,
मई ही हूँ यह अन्धकार -
यही है मेरा अस्तित्व,
मेरी पहचान,
मेरी परिभाषा.
पर,
लोक वाणी के देवत्व पर
उलाहने  की रोली लगा   की
इस तमसागर की कुंठित गहराइयों में
किसी निश्छल निष्पाप श्वेतात्मा की तलाश में मग्न
तुम्हारा थका थका सा अजेय विश्वास
मुझे आस्तिक बना देता है.

         अखतर किदवाई

Saturday, 3 December 2011

हम को खूब आता है

  गम  पी    कर    मुस्काते    जाना,  हम    को      खूब        आता  है
आग    हथेली         पर   सुलगाना,    हम     को    खूब    आता      है


दिल  में    घाव  छुपे   है   उतने,        जितने    तारे       आसमान      में
और्रों के   घाव  भर     देना,    खुशियाँ  बिखराना हम  को   खूब आता है


आह    उठे   जब    भी     दिल  में,      हम     हंस  कर    उसे   छुपा  जाते  
अरे ये   तो  ख़ुशी  के  आंसू   है,  ये  बहाना,   हम   को      खूब   आता   है


गम     और      तनहाइयाँ        ही   तो       अपने     सच्चे     साथी   है
और      साथियों    का  साथ    निभाना,   हम   को   खूब    आता      है  


ईश्वर   ने    जो   हमे    दिया   वो    सिर्फ   हमारा    ही   तो    नहीं   है 
मिल   बाँट   कर    सब   संग    खाना ,  हम    को    खूब      आता    है 

 

Thursday, 1 December 2011

बातें करतें है

वो जब मुझ को ना देखें तब  भी  , नजर क्यूँ   बार   बार   झुकती है ?
ह्या की लाली आके गालों  पर ,उनके    तकनें    की   राह  तकती  है

दिल में तो लाखों बातें चलती है ,जुबां तक आ  के फिर  क्यूँ रूकती है
धडकने तेज होती जाती है ,दिल     में   एक पीर   सी   भी   उठती  है

होठ थरथराते है, चुप ही  रहतें है ,उन के आगे हम 'बुत' ही रहते है
साँसें  चलना भी भूल जाती है ,नज़रें  धरती में   गड सी   जाती   है

मैं उन की खामोशियों को सुनती हूँ,वो मेरी खामोशियों को   सुनते है
रात भर नींद अब आती ही नहीं, दिन भर अब ख्वाब ,ख्वाब बुनते है

बात गर हम शुरू कर भी दें तो , दुनिया, जहाँ   की  बातें    करते  है
कौन कैसा है ,वो तो वैसा है, जाने कहाँ   कहाँ   की   बातें    करते है

अपनी बातों की बात छोड़ कर हम , धरती आसमाँ की बातें करते है
जो जरूरी है वो तो रह ही जाता है ,और हम यहाँ वहां की बातें करते है

अब जो मिलना हुआ तो कह देगें ,आओ   अब   अपनी  बातें   करते है
कैसे कटते  है दिन तुम्हारे बिन,उन , सुबह-शामों  की  बाते   करते  है......
 







Wednesday, 30 November 2011

एक वोह ज़िन्दगी से प्यारा जो

एक वोह ज़िन्दगी से प्यारा जो
एक  मैं  ज़िन्दगी  से   हारा   जो.

तुम हो जो ख्वाब ख्वाब जीते हो
मैं तो वोह, सारे ख्वाब हारा जो.

ले   गया  लुट कर     मेरा   सूरज
नाकसो कस  का था सहारा जो.

वोह भी अब रौशनी से डरता है
था कभी सुब्ह का सितारा  जो.

आज भी उसके आसरे हैं आप
आज भी    बेकसों    बेचारा जो.

मैं न कहता था वोह किसी का नहीं
कभी    मेरा   कभी   तुम्हारा   जो.

(नाकसो  कस = each and every body)

   --------- akhtar किदवाई

Tuesday, 29 November 2011

तुम को ढूंढा है

हर      सुबह     हर    शाम    तुम   को   ढूंढा है 
 हमने,  उम्र     तमाम      तुम   को     ढूंढा    है 



हर   शहर    की      ख़ाक      छान     मारी     है 
कभी छुप के ,कभी सरे आम   तुम   को  ढूंढा है 



हर फूल,हर कली ,को  बताया  है   हुलिया    तुम्हारा  
चेहरे का हर एक निशाँ ,करके ब्यान ,तुम को ढूंढा है

  

छुपे हो जरुर तुम  किसी  और लोक में, वरना   तो 
ज़मी सारी छानी ,फिर  आसमान पे, तुम को ढूंढा है 

Monday, 28 November 2011

कविता


कविता, ये    कविता   आखिर  क्या  होती  है !

तेरे और मेरे जीवन की इसमें छुपी व्यथा होती है!!

कभी तो हंसती, मुस्काती, कभी ये बार बार रोती है!

पावँ में  इस के कभी है छाले,कभी रिसते घाव  धोती है!!

कविता, ये  कविता आखिर क्या होती है .............. 

मन की तड़प  छुपा लेती और बीज ख़ुशी के ये बोती है!

सपन सलोने हम को देती,पर क्या कभी खुद भी सोती है!!

कविता,  ये  कविता आखिर क्या  होती है............ 

उम्मीदे न टूटे हमारी, सदा ये यत्न प्रयत्न करती  है !

न उम्मीदी की कई गठरियाँ, ये चुपके चुपके  ढ़ोती है!! 

 कविता, ये  कविता आखिर  क्या होती है....